August 10, 2026

पश्चिम एशिया का NATO बना मक्का संधि, चीन के समीकरण बिगड़े, भारत पर कितना असर? - mecca pact emerges as west asias nato chinas equations disrupted does it impact india

मक्का में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्कीए ने एक नया रक्षा समझौता किया है, जिसे नाटो-शैली का माना जा रहा है। ...और पढ़ें

मक्का समझौते से भारत और चीन पर कितना असर?

मक्का समझौते से भारत और चीन पर कितना असर?

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। 7 अगस्त को मक्का में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्कीए ने अपने नए आपसी डिफेंस एग्रीमेंट पर साइन किया है। इस पैक्ट में कहा गया है कि तीनों देशों में से किसी एक पर हथियारों से हमला, उन सभी पर हमला माना जाएगा।

भारत के खिलाफ नहीं समझौता

तीनों देशों के बीच हुई इस संधि को नाटो-स्टाइल समझौता कहा जा रहा है। पहली नजर में यह भारत के खिलाफ सीधा समझोता नहीं है। सऊदी अरब के भारत से रिश्ते भी हाल में काफी मजबूत हुई है। लेकिन क्योंकि इसमें पाकिस्तान शामिल है, इसलिए भारत के लिए चिंता की बात कही जा रही है।

भारत को कितना नुकसान?

भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने इसे भारतीय हितों के लिए बहुत नेगेटिव डेवलपमेंट बताया है। उनकी दलील है कि इस पैक्ट से पाकिस्तान को भारत के प्रति और आक्रामक होने का हौसला मिल सकता है।

भले ही सऊदी अरब सीधे भारत-पाकिस्तान जंग में सैन्य मदद न करे, लेकिन पाकिस्तान को खुफिया जानकारी, हथियार, कूटनीतिक और आर्थिक मदद इस समझौते के जरिए मिल सकती है। खासकर पाकिस्तान और तुर्की के बीच डिफेंस सहयोग पहले से बढ़ रहा है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी यह दिखा था।

चीन के समीकरण बिगड़े

इस समझौते के बाद लग रहा है कि चीन इससे सबसे ज्यादा फायदे में है। क्योंकि चीन गल्फ में सभी से दोस्ती रखता है। वह पाकिस्तान को हथियार देता है, सऊदीसे तेल खरीदता है और तुर्की-UAE से बिजनेस करता है। इस नए पैक्ट से चीनी हथियार पाकिस्तान के जरिए गल्फ बाजार तक और आसानी से पहुंच सकते हैं।

लेकिन दूसरी तरफ चीन के लिए यह रणनीतिक झटका भी बन सकता है। अमेरिका लंबे समय से चाहता है कि उसके सहयोगी अपना डिफेंस का बोझ खुद उठाएं। अगर सऊदी, तुर्की और पाकिस्तान ज्यादा आत्मनिर्भर बनते हैं तो अमेरिका को वेस्ट एशिया में कम ध्यान देगा पड़ेगा।

इससे बची हुई ताकत और पैसे अमेरिका इंडो-पैसिफिक और चीन पर लगा सकता है। और अमेरिका चीन को ही अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी मानता है।

क्या रह सकती है भविष्य की स्थिति

तीनों देशों का यह समझौता सिर्फ कागत पर रहेगा या असल में सैन्य एकीकरण होगा, यह एक बड़ा सवाल है। संयुक्त सैन्य अभ्यास, खुफिया साझा करना, हथियारों की खरीद और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर ही तय करेंगे कि यह कितना असरदार है।

चीन के लिए परीक्षा यह है कि क्या यह समझौता अमेरिका को एशिया पर और ध्यान देने का मौका देगा।