August 7, 2026

कैसे बनी भारत की पहली MRI मशीन? रतन टाटा और श्रीधर वेम्बू के बिना नहीं था संभव

अब भारत में मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग (MRI) बननी शुरू हो चुकी है. भारत की बेंगलुरु स्थित एक कंपनी कीफायती एमआरआई मशीन बना रही है और‍ फिर इसे भारत के हर कोने तक पहुंचा रही है. लेकिन इसे  तैयार करना आसान नहीं था. ग्‍लोबल कंपनियों से इसे भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ा. ये कंपनियां अक्‍सर भारत की छोटी कंपनियों को खरीद लेती थीं, जो नई तकनीकें लाती थी. 

कुछ इसी तरह की समस्‍याओं का सामना भारत की पहली एमआरआई निर्माता, बेंगलुरु स्थित VoxelGrids को भी करनी पड़ी. हालांकि, टाटा ट्रस्‍ट और श्रीधर वेम्‍बू की Zoho से मिले फाइनेंशियल सपोर्ट ने इस कंपनी को एमआरआई मशीन बनाने और इसे भारत के हर कोने तक पहुंचाने में मदद की है.

दशकों से अमेरिका, जर्मनी, जापान, चीन, इटली और नीदरलैंड जैसे देशों ने MRI मशीनें बनाई हैं, जिनका उपयोग दुनिया भर के अस्‍पताल करते हैं और भारत उनके सबसे बड़े कस्‍टमर्स में से एक है. VoxelGrids के संस्थापक और CEO, अर्जुन अरुणाचलम, दुनिया के सबसे जटिल चिकित्सा उपकरणों में से एक का निर्माण करते हुए और अरबों डॉलर की कंपनियों से प्रतिस्पर्धा करते हुए पैसों की कमी से जूझ रहे थे. तब उन्‍हें विदेशी कंपनी से ऑफर आया था, लेकिन उन्‍होंन उसे ठुकरा दिया. 

टाटा और वेम्‍बू के सहयोग से बनी भारत की पहली एमआरआई मशीन 
उनका कहना था कि अगर विदेशी कंपनी का ऑफर एक्‍सेप्‍ट कर लेते तो नवाचार खत्‍म हो जाता और फिर विदेशी कंपनी ये सबकुछ हड़प लेती. हालांकि, इसके बाद टाटा ट्रस्‍ट और श्रीधर वेम्‍बू की फंडिंग से अरुणाचलम के स्टार्टअप्‍स को बड़ी मजबूती मिली. इस फंडिंग से स्टार्टअप को इतना समय मिल सका कि वह भारत का पहला स्वदेशी एमआरआई स्कैनर विकसित कर सके. 

साल 2015 के दौरान टाटा ट्रस्‍ट के अध्‍यक्ष रतन टाटा थे, जिनसे मिलने के बाद उन्‍हें फंडिंग मिली. इस कंपनी को पहली बार फंडिंग टाटा ट्रस्‍ट की ओर से ही मिला था. फिर साल 2021 में जोहो के फाउंडर की ओर से इस कंपनी को बड़ा सपोर्ट मिला.  

70 फीसदी तक कम होगी लागत 
अरुणाचलम ने इंडिया टुडे डिजिटल को बताया कि यह मशीन अंततः एमआरआई स्कैन की लागत को लगभग 70% तक कम कर सकती है और देश के हर कोने में सुविधाओं को सुलभ बना सकती है. VoxelGrids ने चिकित्सा क्षेत्र में एक चमत्कार कर दिखाया है. इसकी एमआरआई मशीनें 40% सस्ती और 50% हल्की होंगी, जिससे स्थापना लागत में और कमी आएगी. यह उस देश के लिए एक छोटी सी क्रांति होगी, जो हर साल 3,500 करोड़ रुपये के एमआरआई-संबंधित उत्पादों का आयात करता है.

क्‍यों MRI मशीन बनाना चाहते थे अरुणाचलम? 
अरुणाचलम ने इंडिया टुडे डिजिटल से बात करते हुए कहा कि एमआरआई स्कैनर बनाना अक्सर जेट इंजन या रॉकेट बनाने के समान माना जाता है. एमआरआई मशीनें अब तक निर्मित सबसे महंगी और तकनीकी रूप से जटिल चिकित्सा उपकरणों में से हैं, जिनके लिए सालों के रिसर्च, बड़ी पूंजी और भौतिकी, इलेक्ट्रॉनिक्स, सॉफ्टवेयर और सटीक इंजीनियरिंग में विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है.

अरुणाचलम को ठीक-ठीक पता था कि वह किस चुनौती का सामना करने जा रहे हैं. एमआरआई फिजिक्‍स में विशेषज्ञता रखने वाले अरुणाचलम ने अमेरिका में विस्कॉन्सिन-मैडिसन विश्वविद्यालय में पढ़ाई किया और उसके बाद लगभग 2008-09 के दौरान अमेरिका में जीई हेल्थकेयर के रिसर्च सेंटर में लगभग तीन साल बिताए. यही वह जगह थी, जहां उन्‍हें भारत में एमआरआई मशीनों के निर्माण में मदद करने का अनुभव मिला. 

इसके बाद अरुणाचलम सिंगापुर चले गए, और आईआईटी बॉम्बे में थोड़े समय के लिए पढ़ाने के बाद, उन्हें एहसास हुआ कि उन्हें क्या बात परेशान कर रही थी. अरुणाचलम ने कहा कि मैं भारत में कुछ सार्थक करना चाहता था और यहीं रहना चाहता था. 

कैसे तैयार हुई MRI मशीन? 
स्थापित निर्माताओं की नकल करने की कोशिश करने के बजाय, अरुणाचलम की वोक्सेलग्रिड्स ने बिल्कुल नए सिरे से शुरुआत की. उन्होंने कहा कि बड़ी-बड़ी कंपनियों पर प्रतिबंध हैं. नियामक ढांचों के कारण वे तेजी से नवाचार और बदलाव नहीं कर सकतीं. यह हम जैसे छोटे खिलाड़ियों के लिए एक अवसर है. अरुणाचलम के अनुसार, शुरुआत में उनकी कंपनी केवल एमआरआई इमेजिंग सॉफ्टवेयर और एआई डेवलप करना चाहती थी. लेकिन मौजूदा निर्माता बाहरी लोगों को अपने सिस्टम में एंट्री की अनुमति नहीं देना चाहते थे. ऐसे में अरुणाचलम ने अपनी खुद की एमआरआई मशीन बनाने का फैसला किया.

सॉफ्टवेयर से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स तक, सब कुछ कंपनी के भीतर ही एक ऐसी टीम द्वारा डिजाइन किया गया था, जो मात्र चार इंजीनियरों से बढ़कर अब 33 हो गई है. अरुणाचलम ने इंडिया टुडे डिजिटल को बताया कि हमारी इमेज क्वालिटी किसी भी एमआरआई के बराबर है. हमारा डिजाइन अलग है. 

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