देश में बाघों की संख्या को लेकर पिछले दो दशकों के आंकड़ों से नई बहस छिड़ गई है। वर्ष 2010 में संसद में दिए गए एक जवाब में सरकार ने बताया था कि वर्ष 2001-02 में राज्यों की ओर से पगमार्क (पंजों के निशान) पद्धति के आधार पर देश में 3,642 और मध्य प्रदेश में 710 बाघ थे। वहीं, वर्ष 2022 की ऑल इंडिया टाइगर एस्टीमेशन में देश में बाघों की औसत संख्या 3,682 और मध्य प्रदेश में 785 दर्ज की गई। यह गणना कैमरा ट्रैप, डीएनए, साइन सर्वे और वैज्ञानिक विश्लेषण जैसी आधुनिक तकनीकों से की गई है। यानी 26 साल के अंतराल में देशभर में बाघों की संख्या में केवल 40 और मध्य प्रदेश में 75 का अंतर दिखाई देता है। हालांकि, दोनों आंकड़ों की गणना पद्धति अलग-अलग है, इसलिए इनकी सीधी तुलना करना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं माना जाता। 2006 से भारत में पगमार्क पद्धति की जगह वैज्ञानिक ऑल इंडिया टाइगर एस्टीमेशन लागू किया गया, जिसे अधिक विश्वसनीय माना जाता है। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि यह तुलना एक अहम सवाल जरूर खड़ा करती है कि क्या पगमार्क पद्धति से बाघों की संख्या का अनुमान वास्तविकता से अधिक था, या फिर आज भी संरक्षण की बड़ी चुनौतियों के कारण बाघों की संख्या अपेक्षित गति से नहीं बढ़ पा रही है।
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छह प्रतिशत वृद्धि मान रही सरकार
भारत सरकार बाघों की संख्या में छह प्रतिशत की हर साल वृद्धि मान कर चल रही है। ऐसे में बाघों की संख्या में बढ़ोतरी के बजाए कमी कई सवाल खड़े कर रही है। वहीं, यदि बाघों की मौत के एनटीसीए की वेबसाइट पर आंकड़े देखें तो 2012 से 2026 के बीच 1700 से ज्यादा मौत दर्ज की गई है। वहीं, बाघ प्रोजेक्ट पर सरकार हर साल औसत 100 करोड़ रुपये खर्च करना मानें तो यह आंकड़ा पिछले 26 साल में 2500 करोड़ रुपये से ज्यादा का हो जाता हैं।
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पगमार्क और कैमरा ट्रैप में यह है अंतर
पगमार्क पद्धति - पुरानी पद्धति में जंगल में मिले बाघ के पंजों के निशान देखकर उनकी संख्या का अनुमान लगाया जाता था। इसमें एक ही बाघ के निशान कई बार गिने जाने या अलग-अलग बाघों के निशान में भ्रम की संभावना रहती थी। कैमरा ट्रैप- इस आधुनिक पद्धति में जंगल में विशेष कैमरे लगाए जाते हैं, जो बाघ की तस्वीर अपने आप खींच लेते हैं। हर बाघ के शरीर पर बनी धारियां अलग होती हैं, इसलिए फोटो के आधार पर उसकी सही पहचान और गिनती करना अधिक सटीक माना जाता है।
बाघों की संख्या वर्षवार सरकार के जवाब और एनटीसीए की वेबसाइट के अनुसार
2001-02: 3642 (पगमार्क)
2006: 1411 (नई वैज्ञानिक पद्धति)
2010: 1706
2014: 2226
2018: 2967
2022: 3682
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सरकार को जवाब देना चाहिए
मध्य प्रदेश के वन्यजीव कार्यकर्ता अजय दुबे का कहना है कि इस सवाल का जवाब केवल एक विस्तृत वैज्ञानिक विश्लेषण से ही मिल सकता है। उन्होंने कहा कि स्पष्ट है कि बाघों के आंकड़े बताते हैं कि पहले और वर्तमान गणना की विश्वनीयता नहीं है। इसकी विश्वनीयता बताने के लिए उच्च स्तरीय मापदंड स्थापित होने चाहिए। साथ ही उन्होंने कहा कि यह लोकसभा प्रश्न का जवाब है, सरकार को जवाब देना चाहिए।
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हमारे आंकड़े गलत नहीं : वन मंत्रालय
वहीं, भारत सरकार के वन मंत्रालय के एडीजी वाइल्डलाइफ सुशील कुमार अवस्थी का कहना है कि हमारे आंकड़े गलत नहीं हैं। हम 2010 से बाघों की गणना कर रहे हैं। हमारे आंकड़े सेंट पीटरबर्ग डिक्लेरेशन के समय के हैं। 2001-02 के आंकड़े की जानकारी मुझे नहीं हैं।