July 15, 2026

Maharashtra: बॉम्बे हाई कोर्ट पहुंची 'पति-पत्नी और वो' की कहानी, बेटी के जन्म प्रमाण पत्र में बदला पिता का नाम

पति, पत्नी और 'वो' के रिश्ते से जुड़े एक असामान्य मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए एक बच्ची के जन्म प्रमाणपत्र में दर्ज पिता का नाम बदलने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि जब डीएनए जांच और दोनों जैविक  माता-पिता के हलफनामे से बच्ची के असली पिता की पहचान साबित हो चुकी है, तो जन्म प्रमाणपत्र में उसी व्यक्ति का नाम दर्ज होना चाहिए। अदालत ने बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) को निर्देश दिया कि वह जन्म प्रमाणपत्र में महिला के पूर्व पति का नाम हटाकर बच्ची के जैविक पिता (biological father) का नाम दर्ज करते हुए नया बर्थ सर्टिफिकेट जारी करें।



कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश रवींद्र घुगे और न्यायमूर्ति रंजीत सिंह भोंसले की खंडपीठ ने यह आदेश एक महिला की याचिका पर सुनवाई के बाद दिया। महिला ने अदालत से गुहार लगाई थी कि उसकी बेटी के जन्म प्रमाणपत्र में पिता के रूप में उसके पूर्व पति का नाम दर्ज है, जबकि बच्ची का जैविक पिता कोई दूसरा व्यक्ति है, जिससे बाद में उसने विवाह भी कर लिया। ऐसे में प्रमाणपत्र में वास्तविक पिता का नाम दर्ज किया जाना चाहिए।

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सुनवाई के दौरान अदालत के सामने डीएनए जांच रिपोर्ट पेश की गई, जिसमें बच्ची के जैविक पिता की पुष्टि हुई। इसके साथ ही बच्ची के जैविक माता-पिता की ओर से संयुक्त हलफनामा भी दाखिल किया गया, जिसमें दोनों ने स्वयं को बच्ची के वास्तविक माता-पिता बताया। इन दस्तावेजों के आधार पर अदालत ने माना कि जन्म प्रमाणपत्र में सही जानकारी दर्ज होना जरूरी है और इसी आधार पर बीएमसी को नया जन्म प्रमाणपत्र जारी करने का निर्देश दिया।

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याचिका के अनुसार, महिला की शादी फरवरी 2006 में हुई थी। इस विवाह से कोई संतान नहीं हुई। कुछ समय बाद पति-पत्नी के बीच मतभेद बढ़ गए और दोनों अलग-अलग रहने लगे। इसी दौरान, जबकि तलाक का मामला अदालत में लंबित था और तलाक का आदेश अभी नहीं हुआ था, महिला का एक अन्य व्यक्ति से संबंध बन गया। दिसंबर 2009 में उसने एक बच्ची को जन्म दिया।



बाद में वर्ष 2013 में अदालत ने पति-पत्नी के तलाक को मंजूरी दे दी। तलाक के बाद महिला ने उसी व्यक्ति से विवाह कर लिया, जो बच्ची का जैविक पिता था। हालांकि, बच्ची के जन्म के समय महिला कानूनी रूप से अपने पहले पति की पत्नी थी। इसी वजह से मार्च 2010 में जब बच्ची का जन्म प्रमाणपत्र बनवाया गया, तब पिता के कॉलम में तत्कालीन पति का नाम दर्ज करा दिया गया।



महिला ने पुनर्विवाह के बाद बीएमसी से जन्म प्रमाणपत्र में पिता का नाम बदलकर जैविक पिता का नाम दर्ज करने का अनुरोध किया, लेकिन बीएमसी ने नियमों का हवाला देते हुए यह मांग ठुकरा दी। इसके बाद महिला ने बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया।



अदालत ने मंगलवार को अपने आदेश में कहा कि जब डीएनए जांच और संबंधित पक्षों के दस्तावेज यह स्पष्ट कर रहे हैं कि बच्ची का जैविक पिता कौन है, तब जन्म प्रमाणपत्र में उसी व्यक्ति का नाम दर्ज किया जाना न्यायसंगत होगा। अदालत ने बीएमसी को निर्देश दिया कि वह पुराने प्रमाणपत्र में दर्ज पूर्व पति का नाम हटाकर जैविक पिता का नाम दर्ज करें और संशोधित जन्म प्रमाणपत्र जारी करें।