KGMU के क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग (CCM) में हर साल 40 से 45 बेहद गंभीर मरीजों की जान बचाई जा रही। ये वो मरीज है, जो वेंटिलेटर पर जाकर मौत को मात देने में कामयाब हो रहे है। मेडिकल साइंस का ये चमत्कार डॉक्टर, प्रेसिजन मेडिसिन की बदौलत करने में कामयाब
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दैनिक भास्कर ने 3 साल में 135 से ज्यादा मरीजों की जान बचाकर उन्हें नई जिंदगी देने वाले CCM विभाग के प्रमुख डॉ. अविनाश अग्रवाल से बात कर इसकीं खूबियों के बारे में समझा। डॉ.अविनाश अग्रवाल कहते है कि कल्चर-बेस्ड एंटीबायोटिक के मुकाबले प्रेसिजन मेडिसिन के आधार पर इलाज करने से मरीजों के बेहतर होने में मदद मिली।
इसी काम के लिए KGMU के CCM विभाग में प्रेसिजन सेंटर इन प्रिवेंटिव क्योर को देश का पहला सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाने की मंजूरी मिली है। उनके विभाग में हर साल करीब 1,400 मरीज भर्ती होते हैं। ये वो मरीज होते है जो जीवन की अंतिम सांसें गिन रहे होते है। इनमें लगभग सभी मरीजों को वेंटिलेटर सपोर्ट पर भी कई दिनों तक रखा जाता है।
बावजूद इसके लगभग 25% मरीजों की मृत्यु हो जाती है। सालों से यही विभाग में मोर्टेलिटी रेट यानी मृत्यु दर रही। हमारा फोकस इसमें और कमी लाने पर था। कई प्रयास किए गए पर राहत हमें प्रेसिजन मेडिसिन की मदद से मिली। प्रेसिजन मेडिसिन से मृत्यु दर में 10% की कमी आई। पिछले 3 सालों में कम से कम हर साल करीब 40 से 45 मरीजों की जान बचाने में कामयाब रहे। यह व्यवस्था वर्ष 2023 से लगातार इस्तेमाल की जा रही है। और अब इसे उत्तर प्रदेश सरकार से भी मान्यता मिल चुकी है।

डॉ. अविनाश अग्रवाल, HOD, CCM विभाग, KGMU
मरीज की प्रोफाइल के हिसाब से तय होता है इलाज
डॉ. अविनाश अग्रवाल कहते है कि प्रेसिजन मेडिसिन में मरीज की जेनेटिक प्रोफाइल, शरीर में मौजूद बैक्टीरिया, खानपान और दूसरी स्थितियों को ध्यान में रखकर इलाज किया जाता है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि किस मरीज को कौन-सी दवा और कितनी डोज देनी चाहिए। अगर दवा असर नहीं कर रही है, तो उसके पीछे की वजह जानने में भी मदद मिलती है।
बेल्जियम के संस्थान में ही इस विधा से मिल रहा इलाज
डॉ.अविनाश अग्रवाल कहते है कि भारत में सरकारी संस्थानों में ही नहीं प्राइवेट और कॉरपोरेट सेक्टर के हॉस्पिटल में भी अभी ऐसा प्रयोग इस विभाग में नहीं हो रहा। कुछ संस्थानों ने जो शुरू किया है, वो सिर्फ कैंसर के मरीजों के लिए प्रयोग में ला रहे है। पर हमारे विभाग में हर तरह से मरीजों का इस विधा से इलाज हो रहा। यहां तक विदेशों में भी सिर्फ चुनिंदा संस्थान है, जहां रिसर्च बेस ऐसे ट्रीटमेंट से वेंटिलेटर के मरीजों की जान बचाई जा रही है। इनमें यूरोप के बेल्जियम के एक संस्थान का नाम है।
3 साल की कड़ी मेहनत का मिला फल
डॉ.अविनाश अग्रवाल के मुताबिक KGMU में अभी 34 बेड के ICU में इस व्यवस्था का इस्तेमाल किया जा रहा है। विभाग अस्पताल के दूसरे विभागों के मरीजों को भी जरूरत के अनुसार जांच और इलाज में मदद दे रहा। दूसरे संस्थान भी इस तकनीक से जुड़ी सलाह और सहयोग ले सकते हैं। वर्ष 2023 से 2026 तक इस दिशा में लगातार काम किया गया। इसके बाद सरकार ने 13 अक्टूबर 2026 को इस पहल को सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के रूप में नामित किया।

13 अक्टूबर 2026 को यूपी सरकार ने KGMU के CCM विभाग को 'सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन प्रेसिजन मेडिसिन एक्यूट केयर' की मान्यता दी।
कोविड के दौरान 2021 में रखी गई थी नींव
डॉ.अविनाश अग्रवाल ने बताया कि इस पहल की शुरुआत कोविड के दौरान वर्ष 2021 में हुई थी। उस समय एक जैसे ट्रीटमेंट के बावजूद कुछ मरीज ठीक हो जाते थे, जबकि कुछ की हालत में सुधार नहीं होता था। इससे मरीजों की बायोलॉजिकल प्रोफाइल में अंतर और दवाओं के अलग-अलग असर को समझने की जरूरत महसूस हुई।
वर्ष 2022 में इस प्रोजेक्ट को कॉलेज में प्रेजेंट किया गया। इसके बाद एग्जीक्यूटिव काउंसिल से इसे मंजूरी मिली। वर्ष 2023 में सरकार ने इसके लिए तीन पद मंजूर किए। इनमें एक मॉलिक्यूलर बायोलॉजिस्ट और दो माइक्रोबायोलॉजिस्ट के पद शामिल हैं।
डॉ. शांतनु प्रकाश ने बताया कि प्रेसिजन मेडिसिन की वर्किंग क्यों जरूरी…
KGMU के CCM विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. शांतनु कहते है कि सरल भाषा मे प्रेसिजन मेडिसिन को समझने के लिए ये समझना होगा। बीमारी में अभी मरीज को दवा दी जाती है। अगर बीमारी ठीक हो जाती है तो इलाज सफल माना जाता है। अगर सुधार नहीं होता तो दवा की डोज बढ़ाई जाती है या दूसरी दवा दी जाती है। पर यह जानने की कोशिश नहीं हो पाती कि पहली दवा ने काम क्यों नहीं किया।
दवा के कारगर न होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। हर मरीज का जेनेटिक प्रोफाइल अलग होता है। पेट में मौजूद बैक्टीरिया, खानपान और रहने की जगह भी दवा के असर को प्रभावित कर सकते हैं। इन सभी फैक्टर्स को मिलाकर तय होता है कि किसी मरीज पर कौन-सी दवा कितनी असरदार होगी।

डॉ. शांतनु प्रकाश, CCM विभाग, KGMU
प्रेसिजन मेडिसिन में कम खर्च
प्रेसिजन मेडिसिन में इन सभी फैक्टर्स को ध्यान में रखकर इलाज करने की कोशिश की जाती है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि मरीज को किस दवा की कितनी डोज देनी चाहिए। दवा का असर हो रहा है या नहीं, डोज कम या ज्यादा तो नहीं है और शरीर दवा का इस्तेमाल किस तरह कर रहा है, इन सभी बातों का आकलन किया जाता है। और फिर जब इसके लिहाज से ट्रीटमेंट होता गया तो मरीज जल्द रिकवर हो जाता है। और इलाज में खर्चा भी कम आता है। पर सबसे अहम है कि वेंटिलेटर में जाने के बाद भी मरीज स्वास्थ्य होकर घर लौटते है।
कॉरपोरेट हॉस्पिटल से 8 गुना सस्ते टेस्ट
डॉ.शांतनु ने कहा कि KGMU में जो टेस्ट करीब 2,000 रुपये में हो जाता है, वही बाहर बड़े कॉरपोरेट हॉस्पिटल में कराने पर 15 से 20 हजार तक खर्च आता है। इन-हाउस टेस्टिंग से मरीजों को काफी कम खर्च में जांच की सुविधा मिलती है। टेस्ट की क्वालिटी भी अच्छी है, इस तरह की जांच के लिए खास एक्सपर्टाइज की जरूरत होती है। हर कोई इसे नहीं कर सकता। इसके लिए ट्रेनिंग और ओरिएंटेशन जरूरी है। पर राहत की बात ये है कि इन टेस्ट के आधार पर जब इलाज होता है तो फिर मोर्टेलिटी में 10 से 20% तक कमी आती है।
सेंटर ऑफ एक्सीलेंस से कई विभागों में भर्ती मरीजों को मिलेगा फायदा
एक सवाल के जवाब में डॉ. शांतनु ने बताया कि CCM विभाग में अभी हमारे पास 34 बेड का ICU है, जहां प्रेसिजन मेडिसिन की व्यवस्था लागू है। वहां हर मरीज की जरूरत के हिसाब से जांच की जाती है। हालांकि, सेंटर का काम सिर्फ इन 34 बेड तक सीमित नहीं है। अस्पताल के दूसरे विभागों के मरीजों को भी जरूरत पड़ने पर मदद दी जाती है। अगर किसी विभाग में इलाज के दौरान कोई समस्या आती है तो हमारी टीम सपोर्ट करती है। दूसरे संस्थानों से भी कोई इस तकनीक से जुड़ी जानकारी या मदद मांगता है तो हम अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग करते हैं।
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