जलझूलनी एकादशी यानी डोल ग्यारस इस साल 22 सितंबर को मनाई जाएगी। जानिए भगवान विष्णु के जल विहार, डोल यात्रा और परिवर्तिनी एकादशी से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं।
Ekadashi
- Published: 20 Sep 2026, 10:35 AM IST
- Last Updated: 20 Sep 2026, 10:35 AM IST
Jal Jhulni Gyaras 2026: हिंदू पंचांग में एकादशी तिथि का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। देश के कई हिस्सों में इसे जलझूलनी एकादशी, डोल ग्यारस, वामन एकादशी, पद्मा एकादशी और पार्श्व एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और व्रत के साथ कई जगहों पर भगवान की प्रतिमा को डोले या पालकी में विराजमान कर जल स्रोत तक ले जाने की परंपरा है।
22 सितंबर को मनाई जाएगी जलझूलनी एकादशी
साल 2026 में जलझूलनी एकादशी यानी डोल ग्यारस का पर्व मंगलवार, 22 सितंबर को मनाया जाएगा। यह भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को पड़ता है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा करने की परंपरा भी बताई जाती है।
दी गई तिथि के अनुसार एकादशी तिथि 21 सितंबर की रात 8 बजे शुरू होकर 22 सितंबर की रात 9:43 बजे समाप्त होगी। व्रत पारण 23 सितंबर को सुबह करीब 6:09 बजे से 10:04 बजे के बीच बताया गया है।
परिवर्तिनी एकादशी को जलझूलनी एकादशी क्यों कहते हैं?
परिवर्तिनी एकादशी को जलझूलनी एकादशी कहने के पीछे कई क्षेत्रों में प्रचलित जल विहार और डोल यात्रा की परंपरा जुड़ी हुई है। इस दिन मंदिरों में भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा को विशेष रूप से सजाकर डोले या पालकी में विराजमान किया जाता है। इसके बाद भक्त भजन-कीर्तन और शोभायात्रा के साथ भगवान की प्रतिमा को नदी, तालाब या किसी अन्य जल स्रोत के किनारे ले जाते हैं।
वहां भगवान का जल विहार कराया जाता है और पूजा-अर्चना की जाती है। इसी परंपरा के कारण इसे जलझूलनी एकादशी और डोल ग्यारस कहा जाता है।
क्या है भगवान के जल विहार की परंपरा?
जलझूलनी एकादशी के दिन कई स्थानों पर मंदिरों से भगवान की प्रतिमा को फूलों और अन्य पूजन सामग्री से सजाकर पालकी में विराजमान किया जाता है। इसके बाद श्रद्धालु गाजे-बाजे और भक्ति भाव के साथ डोल यात्रा निकालते हैं।
शोभायात्रा जल स्रोत तक पहुंचने के बाद भगवान की पूजा की जाती है। कुछ क्षेत्रों में भगवान को जल स्नान या जल विहार कराने की परंपरा है। हालांकि, इस परंपरा का स्वरूप अलग-अलग क्षेत्रों और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार अलग हो सकता है।
माता यशोदा और बाल कृष्ण से जुड़ी लोक मान्यता
जलझूलनी एकादशी से जुड़ी एक लोक मान्यता माता यशोदा और बाल कृष्ण से भी संबंधित है। मान्यता के अनुसार, जन्माष्टमी के कुछ दिनों बाद माता यशोदा ने बाल गोपाल का जलवा पूजन किया था और उनके वस्त्र धोए थे।
इसी लोक परंपरा को कई जगहों पर जलझूलनी एकादशी से जोड़ा जाता है। हालांकि, यह मान्यता और इससे जुड़ी रस्में अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रूपों में देखने को मिलती हैं।
परिवर्तिनी एकादशी का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, परिवर्तिनी एकादशी भगवान विष्णु की आराधना के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा करने की परंपरा भी है।
भक्त इस दिन एकादशी व्रत रखते हैं और भगवान विष्णु की पूजा, ध्यान तथा भजन-कीर्तन करते हैं। इसके अलावा दान-पुण्य और धार्मिक कार्य करने की परंपरा भी कई स्थानों पर प्रचलित है।
भगवान विष्णु के करवट बदलने से जुड़ी मान्यता
परिवर्तिनी एकादशी के नाम के पीछे भगवान विष्णु के करवट बदलने की धार्मिक मान्यता बताई जाती है। मान्यता है कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी यानी देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु क्षीर सागर में योग निद्रा में चले जाते हैं। इसके बाद भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन भगवान विष्णु करवट बदलते हैं। इसी वजह से इस एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है।
कैसे निकाली जाती है डोल यात्रा?
जलझूलनी एकादशी के अवसर पर कई मंदिरों में भगवान की प्रतिमा को विशेष रूप से सजाकर डोले में विराजमान किया जाता है। श्रद्धालु भगवान की पालकी लेकर शोभायात्रा के रूप में जल स्रोत तक पहुंचते हैं।
इस दौरान भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। जल स्रोत के पास भगवान की पूजा के बाद जल विहार या स्नान की परंपरा निभाई जाती है। इसके बाद प्रतिमा को वापस मंदिर लाया जाता है।