July 14, 2026

Jagannath Rath Yatra 2026: भगवान जगन्नाथ को क्यों लगाया जाता है 9वें दिन रसगुल्ले का भोग? जानिए वजह

Jagannath Rath Yatra 2026: भगवान जगन्नाथ को क्यों लगाया जाता है 9वें दिन रसगुल्ले का भोग? जानिए वजह

नीलाद्री बीजे की परंपरा क्या है?Image Credit source: PTI

Lord Jagannath Rasgulla Bhog Tradition: ओडिशा के पुरी में स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर को सनातन धर्म के सबसे पवित्र और रहस्यमयी तीर्थों में गिना जाता है. हर साल आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से शुरू होने वाली भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा को लेकर भक्तों में एक अलग ही उत्साह देखने को मिलता है. साल 2026 में यह भव्य रथयात्रा 16 जुलाई से शुरू होने जा रही है और 24 जुलाई को बहुदा यात्रा के साथ संपन्न होगी. इस 9 दिनों के उत्सव के कई रंग हैं, लेकिन रथयात्रा के आखिरी दिन एक बेहद अनूठी और मीठी परंपरा निभाई जाती है. इस दिन भगवान जगन्नाथ को विशेष रूप से रसगुल्ले का भोग लगाया जाता है. आखिर इसके पीछे क्या कहानी है और क्यों भगवान को मनाने के लिए रसगुल्ले की जरूरत पड़ती है?

क्या है नीलाद्री बीजे की परंपरा?

रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और माता सुभद्रा अपने मौसी घर यानी गुंडिचा मंदिर जाते हैं. वहां कुछ दिन प्रवास करने के बाद बहुदा यात्रा के जरिए वापस श्रीमंदिर लौटते हैं. जब भगवान जगन्नाथ मंदिर के मुख्य द्वार पर पहुंचते हैं, तब उनकी पत्नी माता लक्ष्मी उनसे नाराज हो जाती हैं. मान्यता है कि भगवान बिना उन्हें साथ लिए कई दिनों के लिए चले गए थे, इसलिए माता लक्ष्मी मंदिर का द्वार बंद कर देती हैं और तुरंत प्रवेश नहीं करने देतीं. इस पर भगवान जगन्नाथ उन्हें मनाने के लिए रसगुल्ले का भोग अर्पित करते हैं. इसके बाद माता लक्ष्मी प्रसन्न होकर मंदिर के द्वार खोल देती हैं और भगवान का फिर से स्वागत करती हैं. इसी परंपरा को नीलाद्री बीजे कहा जाता है.

9वें दिन ही क्यों चढ़ाया जाता है रसगुल्ला?

रथयात्रा की शुरुआत से लेकर भगवान के वापस श्रीमंदिर लौटने तक लगभग नौ दिन का समय पूरा होता है. अंतिम दिन जब भगवान अपने धाम लौटते हैं, तब माता लक्ष्मी को मनाने के लिए रसगुल्ले का भोग लगाया जाता है. इसलिए रथयात्रा के नौवें दिन रसगुल्ला अर्पित करने की परंपरा निभाई जाती है. यह केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि पति-पत्नी के प्रेम, सम्मान और रिश्तों में मनाने की सुंदर परंपरा का भी प्रतीक मानी जाती है.

रसगुल्ले की परंपरा का धार्मिक महत्व

मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ को रसगुल्ले का भोग अर्पित करने से घर-परिवार में प्रेम, सौहार्द और खुशहाली बनी रहती है. भक्त इस दिन भगवान को रसगुल्ले का भोग लगाकर सुख-समृद्धि और परिवार की मंगलकामना करते हैं. ओडिशा में इस अवसर को बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है. कई स्थानों पर इसे रसगुल्ला दिवस के रूप में भी विशेष महत्व दिया जाता है. मंदिरों और घरों में भगवान को रसगुल्ले का भोग अर्पित कर प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है.

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है. टीवी9 भारतवर्ष इसकी पुष्टि नहीं करता है.

वरुण चौहान

वरुण चौहान

इलेक्‍ट्रानिक और डिजिटल मीडिया में करीब एक दशक से ज्यादा का अनुभव. 2008 में एशियन एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन (AAFT) नोएडा से पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद कुछ अलग और नया करने की सोच के साथ मीडिया में अपने सफर की शुरुआत की. शुरुआत से ही मेरी रुचि उन विषयों को आम लोगों तक पहुंचाने में रही है, जो भारतीय संस्कृति, धार्मिक परंपराओं से जुड़े हैं. अपने करियर के दौरान Channel One News, Sahara Samay, A2Z News, News Express, National Voice और पंजाब केसरी डिजिटल जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला. इन संस्थानों में काम करते हुए समाचार लेखन, फील्ड रिपोर्टिंग,और डिजिटल कंटेंट को सीखने का अनुभव मिला. फिलहाल देश के सबसे बड़े न्यूज नेटवर्क TV9 भारतवर्ष में धर्म और आस्था से जुड़ी खबरों, धार्मिक आयोजनों, ज्योतिष, वास्तु, पौराणिक कथाओं, मंदिरों की परंपराओं और व्रत-त्योहारों से जुड़े विषयों को सरल, सहज और तथ्यपूर्ण भाषा में पाठकों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी निभा रहा हूं. महाकुंभ 2025 की कवरेज मेरे करियर के महत्वपूर्ण अनुभवों में शामिल है, जहां करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था, अखाड़ों की परंपराओं, संत समाज की गतिविधियों और कुंभ से जुड़े धार्मिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर विस्तार से लिखने का अवसर मिला. इसके अलावा चारधाम यात्रा, सावन, नवरात्रि, दीपावली, होली, छठ पूजा, अमरनाथ यात्रा, रमज़ान और अन्य प्रमुख धार्मिक आयोजनों पर भी लगातार लेखन किया है. भारतीय संस्कृति, धर्म-दर्शन, ज्योतिष, अंक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र, पुराणों और लोक आस्थाओं के अध्ययन में विशेष रुचि रखता हूं. मेरा प्रयास हमेशा यही रहता है कि धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों को सरल भाषा के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाया जाए, ताकि वे अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को बेहतर ढंग से समझ सकें.

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