September 18, 2026

Income Tax Rules Changed: CBDT ने इनकम टैक्स नियमों में किया चौथा बड़ा बदलाव! वैल्यूअर और टैक्स प्रैक्टिशनर्स के लिए नए फॉर्म जारी, जानें पूरी डिटेल

केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड यानी सीबीडीटी (Central Board of Direct Taxes) ने देश की कराधान प्रणाली को अधिक पारदर्शी, तकनीकी रूप से उन्नत और जवाबदेह बनाने के उद्देश्य से आयकर नियमों में एक और महत्वपूर्ण संशोधन अधिसूचित कर दिया है। सरकार द्वारा जारी किए गए 'इनकम-टैक्स (चौथा संशोधन) नियम' के तहत संपत्ति व संपत्तियों का मूल्यांकन करने वाले रजिस्टर्ड वैल्यूअर्स (Registered Valuers) और करदाताओं की ओर से विभागीय प्रक्रियाओं में उपस्थित होने वाले इनकम टैक्स प्रैक्टिशनर्स (Income Tax Practitioners) के पंजीकरण, कार्यप्रणाली और रिपोर्टिंग से जुड़े नियमों में दूरगामी बदलाव किए गए हैं। दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, अहमदाबाद, कोलकाता और चेन्नई जैसे प्रमुख वित्तीय केंद्रों में कार्यरत चार्टर्ड अकाउंटेंट्स, अधिवक्ताओं, टैक्स सलाहकारों और रजिस्टर्ड वैल्यूअर्स के लिए यह संशोधन सीधे तौर पर लागू हो चुका है। वित्त मंत्रालय के तहत राजस्व विभाग ने इस संबंध में विस्तृत आधिकारिक अधिसूचना जारी कर नए वैधानिक फॉर्म्स भी पेश कर दिए हैं।

रजिस्टर्ड वैल्यूअर्स के लिए नए नियम और फॉर्म्स का ढांचा

आयकर अधिनियम के तहत किसी भी प्रकार की संपत्ति, अचल जायदाद, आभूषण, शेयर, वर्चुअल डिजिटल एसेट्स या अनलिस्टेड इक्विटी के उचित बाजार मूल्य (Fair Market Value) के निर्धारण में वैल्यूअर्स की भूमिका सबसे संवेदनशील होती है। स्क्रूटनी, कैपिटल गेन असेसमेंट और सर्च-सर्वे की कार्रवाइयों में वैल्यूएशन रिपोर्ट ही कर निर्धारण का मुख्य आधार बनती है। नए संशोधन के अनुसार, बोर्ड ने वैल्यूअर्स के पंजीकरण, रिन्यूअल और उनकी वैल्यूएशन रिपोर्ट प्रस्तुत करने के प्रारूप को पूरी तरह डिजिटल और मानकीकृत कर दिया है।

अब किसी भी वैल्यूअर को मूल्यांकन कार्य के लिए आवेदन करते समय अपनी पेशेवर योग्यता, न्यूनतम कार्य अनुभव और काउंसिल ऑफ आर्किटेक्चर अथवा इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी बोर्ड ऑफ इंडिया (IBBI) जैसे अधिकृत निकायों में पंजीकरण का पूरा ब्योरा नए इलेक्ट्रॉनिक फॉर्म के जरिए देना अनिवार्य कर दिया गया है। इसके साथ ही, वैल्यूएशन रिपोर्ट के लिए भी विशिष्ट फॉर्म निर्धारित किए गए हैं, ताकि मूल्यांकन के दौरान अपनाई गई पद्धति (Methodology), बेंचमार्क दरें और गणना के आधार पूरी तरह स्पष्ट रहें और टैक्स असेसिंग ऑफिसर (AO) के सामने अनावश्यक विवाद की गुंजाइश न बचे।

इनकम टैक्स प्रैक्टिशनर्स (ITP) के लिए नए पंजीकरण प्रारूप

सीबीडीटी ने इनकम टैक्स प्रैक्टिशनर (ITP) के रूप में प्राधिकृत होने वाले पेशेवरों के लिए भी प्रक्रिया को सख्त और व्यवस्थित किया है। आयकर कानून के प्रावधानों के तहत करदाताओं का प्रतिनिधित्व करने वाले टैक्स प्रैक्टिशनर्स के लिए आवेदन का नया फॉर्म अधिसूचित किया गया है।

नए फॉर्म में प्रैक्टिशनर की शैक्षणिक पृष्ठभूमि, विधिक अर्हता, पैन (PAN), आधार (Aadhaar) और पेशेवर प्रमाण-पत्रों का डिजिटल सत्यापन शामिल किया गया है। पहले जहां कई प्रक्रियाओं में कागजी दस्तावेजों और मैन्युअल सर्टिफिकेट्स पर निर्भरता रहती थी, वहीं अब ई-फाइलिंग पोर्टल के साथ इन प्रोफेशनल्स का डेटा सीधे लिंक किया जाएगा। किसी भी करदाता का ई-कार्यवाही (Faceless Proceedings) में प्रतिनिधित्व करने से पूर्व प्रैक्टिशनर को सिस्टम में वैध रजिस्ट्रेशन नंबर और डिजिटल ऑथराइजेशन प्रस्तुत करना होगा, जिससे फर्जी या अप्रशिक्षित सलाहकारों द्वारा करदाताओं को गुमराह करने की आशंका पूरी तरह समाप्त हो सके।

फेसलेस असेसमेंट सिस्टम से जुड़ेगा नया सत्यापन तंत्र

इस चौथे संशोधन का सबसे बड़ा तकनीकी प्रभाव आयकर विभाग की 'फेसलेस असेसमेंट' (Faceless Assessment System) प्रणाली पर पड़ेगा। सीबीडीटी का उद्देश्य राष्ट्रीय ई-मूल्यांकन केंद्र (NeAC) के साथ सभी हितधारकों को एक ही निर्बाध डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाना है। जब किसी मामले में वैल्यूएशन ऑफिसर या स्वतंत्र वैल्यूअर से रिपोर्ट मांगी जाएगी, तो वह रिपोर्ट सीधे नए निर्धारित फॉर्म में सिस्टम पर ऑनलाइन अपलोड होगी, जिसमें टाइम-स्टैम्प और डिजिटल सिग्नेचर अनिवार्य होंगे।

इसी प्रकार टैक्स प्रैक्टिशनर्स द्वारा दाखिल किए गए जवाबों और दलीलों का सत्यापन भी नए डेटाबेस के माध्यम से होगा। इससे विभागीय अधिकारियों और कर सलाहकारों के बीच होने वाले व्यक्तिगत संपर्क की आवश्यकता समाप्त हो जाएगी और असेसमेंट की गति में तेजी आएगी।

पेशेवर बिरादरी और करदाताओं पर क्या होगा इसका सीधा असर?

टैक्स विशेषज्ञों और सीए प्रोफेशनल्स के अनुसार, सीबीडीटी के इस कदम से कराधान अनुपालन (Tax Compliance) का स्तर काफी ऊंचा उठेगा:

  • मानकीकरण और पारदर्शिता: नए फॉर्म्स के आने से देश भर में संपत्तियों के मूल्यांकन का एक समान मानक स्थापित होगा, जिससे राज्यों के हिसाब से होने वाले अलग-अलग विवेकाधीन आकलनों पर रोक लगेगी।

  • विवादों और मुकदमों में कमी: स्पष्ट मूल्यांकन पद्धतियों और मानकीकृत फॉर्म्स के चलते आईटीएटी (ITAT), उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट में लंबित पूंजीगत लाभ (Capital Gains) और फेयर मार्केट वैल्यू से जुड़े मुकदमों में भारी कमी आने की उम्मीद है।

  • करदाताओं की सुरक्षा: अनाधिकृत व्यक्तियों द्वारा टैक्स प्रैक्टिशनर बनकर नोटिसों के जवाब देने पर लगाम लगेगी और करदाताओं को केवल सत्यापित व योग्य पेशेवरों की ही सेवाएं मिल सकेंगी।

  • समयबद्ध निस्तारण: डिजिटल फॉर्म्स के सीधे ई-प्रोसीडिंग्स से जुड़ने के कारण लंबित अपीलों और असेसमेंट ऑर्डर्स का निस्तारण निर्धारित समय सीमा के भीतर पूरा हो सकेगा।