
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का सेवन कम से कम करने की सलाह (सांकेतिक तस्वीर).
केंद्र सरकार ने शुक्रवार को लोकसभा में बताया कि इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने इस बात की जांच के लिए कोई स्टडी नहीं की है कि क्या अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड में तंबाकू और लत लगाने वाले अन्य नशीले पदार्थों की तरह व्यवहार संबंधी लत वाले गुण होते हैं या नहीं. लोकसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में, स्वास्थ्य राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने कहा कि उपलब्ध वैश्विक वैज्ञानिक सबूतों के आधार पर, ICMR ने संकेत दिया है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का ज़्यादा सेवन स्वास्थ्य पर बुरे असर, जैसे मोटापा, टाइप 2 डायबिटीज, दिल की बीमारियों और मानसिक विकारों के बढ़ते जोखिम से जुड़ा है.
हालांकि, इन स्थितियों के कई कारण होते हैं और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का ज्यादा सेवन कई ऐसे जोखिम कारकों में से एक माना जाता है, जिन्हें बदला जा सकता है. उपलब्ध सबूत मुख्य रूप से ऑब्जर्वेशनल (अवलोकन पर आधारित) हैं और वे अपने आप में कारण-प्रभाव का संबंध स्थापित नहीं करते हैं. जाधव ने कहा कि ICMR ने अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड के ज्यादा सेवन से जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए कई पहल की हैं.
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का सेवन कम से कम करने की सलाह
उन्होंने कहा कि ‘भारतीयों के लिए आहार संबंधी दिशानिर्देश, 2024’ में फ्री शुगर (अतिरिक्त चीनी) का सेवन सीमित करने, चीनी-युक्त पेय पदार्थों का बार-बार सेवन न करने और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का सेवन कम से कम करने की सलाह दी गई है. इन दिशानिर्देशों में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फ़ूड की पहचान करने और फूड लेबल पढ़ने की सलाह भी शामिल है ताकि उपभोक्ता सोच-समझकर चुनाव कर सकें.
‘लेट्स फिक्स अवर फूड’ पहल भी शुरू
मंत्री ने कहा कि ICMR ने बच्चों और किशोरों के लिए स्वस्थ भोजन का माहौल बनाने के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय भागीदारों के सहयोग से ‘लेट्स फिक्स अवर फूड’ (Let’s Fix Our Food) पहल भी शुरू की है. इस पहल का मकसद स्कूलों में खाने-पीने के माहौल को बेहतर बनाना, सबूतों पर आधारित जानकारी वाले मटीरियल तैयार करना, स्कूलों, माता-पिता, नीति बनाने वालों और सिविल सोसाइटी को शामिल करना और ज्यादा चीनी, फैट और नमक वाले खाने से बचने के लिए प्रोत्साहित करते हुए सेहतमंद खाने की आदतों को बढ़ावा देना है.
उन्होंने बताया कि इसके अलावा, ICMR पब्लिक लेक्चर, वर्कशॉप, ट्रेनिंग प्रोग्राम, ‘राष्ट्रीय पोषण माह’ और दूसरे हेल्थ कैंपेन के जरिए पोषण के बारे में जागरूकता फैलाने वाले प्रोग्राम चलाता है और साथ ही क्षेत्रीय भाषाओं में पोषण से जुड़ी जानकारी भी देता है.
सेहतमंद खाने की आदतों को बढ़ावा देने की पहल
जाधव ने बताया कि ‘फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया’ (FSSAI) ने भी सेहतमंद खाने की आदतों को बढ़ावा देने के लिए कई पहल की हैं, जिनमें ‘ईट राइट इंडिया’ मूवमेंट, फैट, नमक और चीनी का सेवन कम करने के लिए ‘आज से थोड़ा कम’ कैंपेन और मोटापे पर सोशल मीडिया कैंपेन शामिल हैं.
उन्होंने कहा कि FSSAI ने MyGov के साथ मिलकर ‘मोटापे पर ईट राइट क्विज’ शुरू किया है और खाने की चीजों के लेबल के बारे में ग्राहकों की समझ बेहतर बनाने के लिए ‘#HarLabelKuchKehtaHai’ कैंपेन भी चला रहा है. इसने खाने की अलग-अलग चीजों के लिए क्वालिटी और सेफ्टी स्टैंडर्ड भी तय किए हैं, जो कोडेक्स (Codex) जैसे इंटरनेशनल स्टैंडर्ड के मुताबिक हैं, और मौजूदा नियमों और कानूनों के तहत चीनी, नमक और फैट की मात्रा को रेगुलेट करता है.
झूठे या भ्रामक लेबलिंग पर रोक
खाद्य सुरक्षा एवं मानक (लेबलिंग एवं प्रदर्शन) विनियम, 2020 के तहत कुल वसा, अतिरिक्त शर्करा, कुल शर्करा, कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, ऊर्जा और सोडियम की मात्रा सहित पोषण संबंधी जानकारी, साथ ही सामग्री सूची का खुलासा करना अनिवार्य है, जबकि झूठे या भ्रामक लेबलिंग पर रोक लगाई गई है.
जाधव ने बताया कि खाद्य सुरक्षा एवं मानक (विज्ञापन एवं दावे) विनियम, 2018 के तहत विज्ञापनों और स्वास्थ्य संबंधी दावों का सत्य, वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित और भ्रामक न होना अनिवार्य है, जबकि यह दावा करना प्रतिबंधित है कि खाद्य पदार्थ बीमारियों को रोक सकते हैं, उनका इलाज कर सकते हैं या उन्हें ठीक कर सकते हैं, जब तक कि कानून द्वारा विशेष रूप से अनुमति न दी गई हो. जाधव ने कहा कि विनियमों के किसी भी उल्लंघन पर खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 के तहत गैर-अनुपालन करने वाले खाद्य व्यवसाय संचालकों के खिलाफ नियामक और दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी.

Amod Rai
21 सालों से राजनीतिक, सामाजिक और पॉलिसी संबंधित विषयों की रिपोर्टिंग और लेखन का अनुभव। लगातार 2 दशक से बीजेपी, संघ परिवार, संसद और केंद्र सरकार की खबरों पर विशेष निगाह
Read More