सैफ अली खान और अक्षय कुमार की फिल्म ‘हैवान’ ने सिनेमाघरों में दस्तक दे दी है। अगर आप इसे देखने का प्लान बना रहे हैं तो रिव्यू जरूर पढ़ लें।
‘हैवान’ सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। इस क्राइम थ्रिलर फिल्म के लिए लोग काफी ज्यादा एक्साइटेड हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि करीब 18 साल बाद अक्षय कुमार और सैफ अली खान साथ आए हैं, प्रियदर्शन का निर्देशन है, अक्षय नेगेटिव रोल में हैं और मोहनलाल का कैमियो है। हालांकि, सवाल यह उठता है कि क्या ये फिल्म उम्मीदों पर खरी उतरी? पढ़िए हमारा रिव्यू।—कागज पर यह कॉम्बिनेशन किसी बड़े सिनेमाई धमाके से कम नहीं लग रहा था।
अक्षय कुमार और सैफ अली खान की जोड़ी कैसी लगी?
अक्षय कुमार का डार्क और नेगेटिव किरदार में नजर आना निश्चित तौर पर फिल्म की सबसे दिलचस्प बातों में से एक है। वहीं सैफ अली खान का ब्लाइंड किरदार भी एक अलग तरह की उम्मीद जगाता है। दोनों कलाकारों को लंबे समय बाद एक साथ देखना भी अपने आप में खास है।
लेकिन समस्या यह है कि इन दोनों आइडियाज का कहानी में प्रभावी इस्तेमाल नहीं हो पाता। अक्षय और सैफ के बीच जिस टकराव, तनाव और केमिस्ट्री की उम्मीद ट्रेलर और प्रमोशन देखकर पैदा होती है, वह फिल्म में नजर नहीं आती।
कहानी कैसी है?
फिल्म की कहानी एक रिटायर्ड जज से शुरू होती है, जिन्होंने अपने अतीत में एक व्यक्ति को सजा सुनाई थी। अब वही अपराधी जज से अपनी सजा का बदला लेना चाहता है। इसके बाद कहानी बदले और टकराव के रास्ते पर आगे बढ़ती है।
कहानी का आइडिया अपने आप में नया नहीं है, लेकिन सही स्क्रीनप्ले और मजबूत ट्विस्ट के साथ इसे प्रभावी बनाया जा सकता था। ‘हैवान’ यहां कमजोर पड़ जाती है। फिल्म की शुरुआत में ही अंदाजा होने लगता है कि कहानी किस दिशा में जाने वाली है। इसके बाद न कोई ऐसा बड़ा ट्विस्ट आता है जो चौंकाए और न ही ऐसा सस्पेंस बनता है, जो दर्शकों को लगातार स्क्रीन से बांधे रखे।
2 घंटे 40 मिनट का रनटाइम सबसे बड़ी परेशानी
फिल्म की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक इसका करीब 2 घंटे 40 मिनट का लंबा रनटाइम है। कहानी में इतना मटीरियल नहीं है कि इसे इतने लंबे समय तक खींचा जा सके। कई जगह ऐसा महसूस होता है कि फिल्म एक ही बात को अलग-अलग तरीके से आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
अगर स्क्रीनप्ले ज्यादा टाइट होता और गैरजरूरी हिस्सों को हटाकर फिल्म की लंबाई कम की जाती, तो इसका असर निश्चित तौर पर बेहतर हो सकता था। लेकिन मौजूदा रूप में लंबा रनटाइम दर्शकों के धैर्य की परीक्षा लेता है और कहानी की रफ्तार कई मौकों पर काफी धीमी महसूस होती है।
एक्टिंग में भी नहीं है दम
इतनी बड़ी स्टारकास्ट होने के बावजूद कलाकारों के किरदारों में वह गहराई नजर नहीं आती, जिसकी इस कहानी को जरूरत थी। अक्षय कुमार का किरदार कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन स्क्रीनप्ले उन्हें वह स्पेस नहीं देता, जिससे उनका नेगेटिव किरदार यादगार बन सके।
सैफ अली खान का ब्लाइंड किरदार एक दिलचस्प प्रयोग हो सकता था, लेकिन इस किरदार को भी उतनी गहराई नहीं मिलती कि वह दर्शकों पर मजबूत प्रभाव छोड़ सके। बोमन ईरानी जैसे अनुभवी कलाकार के लिए भी किरदार काफी सीमित रह जाता है।
मोहनलाल का कैमियो पूरी तरह बेकार
फिल्म में मोहनलाल की मौजूदगी भी दर्शकों की उत्सुकता बढ़ाती है। लेकिन उनका कैमियो देखकर निराशा होती है। इतने बड़े कलाकार को सिर्फ कुछ सेकंड के लिए स्क्रीन पर दिखाया जाता है। यह दृश्य न कहानी में कोई खास योगदान देता है, न किसी ट्विस्ट को मजबूत करता है और न ही आगे के प्लॉट को प्रभावित करता है।
न कॉमेडी, न थ्रिल
प्रियदर्शन की फिल्मों से कॉमेडी की उम्मीद स्वाभाविक है। लेकिन ‘हैवान’ में उनकी ट्रेडमार्क कॉमेडी लगभग गायब है। करीब 2 घंटे 40 मिनट के दौरान मुश्किल से एक-दो ऐसे मौके आते हैं जहां हल्की मुस्कान या हंसी आती है। बाकी समय फिल्म का टोन लगातार सपाट बना रहता है। दूसरी तरफ इसे रिवेंज और थ्रिलर के तौर पर भी देखें तो फिल्म बहुत मजबूत नहीं लगती। न कोई ऐसा सस्पेंस है जो बांधे रखे और न ही ऐसा थ्रिल पैदा होता है कि दर्शक लगातार सोचता रहे कि आगे क्या होगा।
म्यूजिक और बैकग्राउंड स्कोर भी फीका
फिल्म के गाने भी खास प्रभाव नहीं छोड़ते। म्यूजिक कहानी के साथ ऐसा कनेक्शन नहीं बना पाता कि फिल्म खत्म होने के बाद कोई गाना याद रहे। बैकग्राउंड म्यूजिक से भी उन दृश्यों में जरूरी इमोशन या तनाव पैदा नहीं होता, जहां इसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी।
पार्किंग लॉट वाला सीन थोड़ा बेहतर
पूरी फिल्म में अगर कोई सीन थोड़ा अलग लगता है, तो वह पार्किंग लॉट में अक्षय कुमार और सैफ अली खान का आमना-सामना है। इस सीन में दोनों कलाकारों की मौजूदगी और टकराव फिल्म में थोड़ी देर के लिए वह ऊर्जा पैदा करता है, जिसकी कमी बाकी फिल्म में लगातार महसूस होती है। काश, फिल्म के बाकी हिस्से में भी इसी तरह का तनाव और एनर्जी देखने को मिलती।
अंतिम फैसला
कुल मिलाकर ‘हैवान’ एक ऐसी फिल्म है, जिसकी हाइप उसके कंटेंट पर भारी पड़ जाती है। अक्षय कुमार और सैफ अली खान की करीब 18 साल बाद वापसी, प्रियदर्शन का निर्देशन, अक्षय का नेगेटिव किरदार और इतनी बड़ी स्टारकास्ट—इन सबने फिल्म को लेकर उम्मीदें बहुत बढ़ा दी थीं। लेकिन कमजोर और बेहद साधारण कहानी, ढीला स्क्रीनप्ले, जरूरत से ज्यादा लंबा रनटाइम, फीकी कॉमेडी, कमजोर थ्रिल और किरदारों में गहराई की कमी फिल्म को लगातार नीचे खींचती है।
रेटिंग: ⭐ 1.5/5
सलाह: अगर आप ‘हैवान’ को सिर्फ अक्षय-सैफ की जोड़ी, प्रियदर्शन या फिल्म की हाइप की वजह से देखने जा रहे हैं, तो अपनी उम्मीदें काफी कम रखें।