भारत के 500 गीगवाट क्लीन एनर्जी टारगेट को गति देने और सोलर और विंड प्रोजेक्ट्स की एग्जीक्यूशन कॉस्ट में कटौती के लिए सरकार एक बड़े टैक्स सुधार की तैयारी कर रही है. मनीकंट्रोल (Moneycontrol) की रिपोर्ट के अनुसार, आगामी जीएसटी काउंसिल बैठक में रिन्यूएबल ऊर्जा क्षेत्र के इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट और कंस्ट्रक्शन (EPC) कॉन्ट्रैक्ट्स पर फ्लैट 5% GST दर लागू करने के प्रस्ताव पर विचार किया जा सकता है.
वर्तमान में, जहां सोलर मॉड्यूल व विंड टरबाइन जैसे उपकरणों पर 5% जीएसटी लगता है, वहीं संपूर्ण प्लांट के इरेक्शन व कमीशनिंग पर 18% सर्विस टैक्स लगता है—जिससे कंपोजिट सप्लाई के तहत प्रभावी प्रोजेक्ट टैक्स दर करीब 8.9% बैठती थी. 5% की एकसमान फ्लैट दर लागू होने से इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर की समस्या पूरी तरह समाप्त हो जाएगी, जिससे कंपनियों का फंसा हुआ इनपुट टैक्स क्रेडिट अनलॉक होगा और ग्रीन एनर्जी प्रोजेक्ट्स की पूंजीगत लागत में सीधी 3 फीसदी से 5 फीसदी की बचत होगी. आइए इसे विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं…
क्या है पूरा मामला
सरकारी सूत्रों ने मनीकंट्रोल की रिपोर्ट में कहा कि GST काउंसिल अपनी अक्टूबर की बैठक में रिन्यूएबल एनर्जी इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट और कंस्ट्रक्शन (EPC) कॉन्ट्रैक्ट्स के लिए टैक्स स्ट्रक्चर में बदलाव पर चर्चा कर सकती है. काउंसिल इन कॉन्ट्रैक्ट्स के सर्विस वाले हिस्से पर गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) को 18 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत करने पर विचार कर सकती है, ताकि इसे रिन्यूएबल एनर्जी इक्विपमेंट पर लगने वाले टैक्स के बराबर किया जा सके.
EPC कॉन्ट्रैक्ट बड़े पैमाने के इंफ्रास्ट्रक्चर और एनर्जी प्रोजेक्ट्स के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक मॉडल है. इस एग्रीमेंट के तहत, एक ही कॉन्ट्रैक्टर मालिक को पूरी तरह से चालू प्रोजेक्ट सौंपने के लिए शुरू से आखिर तक जिम्मेदार होता है — इसमें डिजाइन और इक्विपमेंट की खरीद से लेकर फाइनल कंस्ट्रक्शन तक सब कुछ शामिल होता है. अभी, कॉन्ट्रैक्ट के लिए प्रभावी GST दर 8.9 फीसदी है. रिन्यूएबल एनर्जी और दूसरे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए, EPC कॉन्ट्रैक्ट्स पर टैक्स 70:30 फॉर्मूले से तय होता है.
कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू का 70 प्रतिशत हिस्सा सामान की सप्लाई माना जाता है और उस पर 5 प्रतिशत GST लगता है, जबकि बाकी 30 प्रतिशत हिस्से को सर्विस की सप्लाई माना जाता है, जिस पर 18 प्रतिशत की दर से टैक्स लगता है. सूत्रों में से एक ने कहा कि प्रभावी टैक्स दर 8.9 प्रतिशत है, लेकिन इंडस्ट्री 5 प्रतिशत की फ्लैट दर की मांग कर रही है, जिस पर अगली बैठक में चर्चा होने की संभावना है.
किस तरह की मिल सकती है राहत
- 18% वर्क्स कॉन्ट्रैक्ट और कंपोजिट सप्लाई विवाद पर विराम : अब तक अथॉरिटी फॉर एडवांस रूलिंग्स (AAR) के फैसलों के कारण रिन्यूएबल EPC प्रोजेक्ट्स पर 18% वर्क्स कॉन्ट्रैक्ट दर लगाने या 70:30 कंपोजिट स्प्लिट को लेकर भ्रम बना रहता था. पूरे EPC कॉन्ट्रैक्ट पर 5% की यूनिफॉर्म दर लागू होने से टैक्स मुकदमों (Tax Litigations) पर विराम लगेगा और स्पष्टता आएगी.
- इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर और वर्किंग कैपिटल ब्लॉकेज से राहत : कंपोनेंट्स उपकरणों और सेवाओं के अलग-अलग टैक्स स्लैब के कारण डेवलपर्स का भारी-भरकम इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) रिफंड के रूप में टैक्स विभाग के पास फंसा रहता था. 5% की एकसमान दर से प्रोजेक्ट डेवलपर्स (जैसे Adani Green, Tata Power, ReNew) की लिक्विडिटी में सुधार होगा और वर्किंग कैपिटल फ्री होगी.
- बिजली दरें होंगी और प्रतिस्पर्धी : EPC लागत में प्रति 100 करोड़ रुपए पर 4 से 5 करोड़ रुपये तक की प्रत्यक्ष बचत होने से बिजली उत्पादन की लागत कम होगी. इसका सीधा लाभ बिजली वितरण कंपनियों (DISCOMs) और औद्योगिक खरीदारों को पावर परचेज एग्रीमेंट्स (PPA) के तहत 10-15 पैसे प्रति यूनिट सस्ते टैरिफ के रूप में मिलेगा.
- 500 GW रिन्यूएबल एनर्जी टारगेट को बूस्ट : भारत वर्ष 2030 तक 500 GW नॉन फॉजिल फ्यूल क्षमता हासिल करने का लक्ष्य बना रहा है. EPC टैक्स दर को तार्किक बनाने से घरेलू सोलर सेल मैन्युफैक्चरिंग, विंड एनर्जी पार्क्स और ग्रीन हाइड्रोजन इंफ्रास्ट्रक्चर में नए निजी निवेश (Private Investment) को रफ्तार मिलेगी.

सौरभ शर्मा
15 साल से शेयर मार्केट, इकोनॉमी और कमोडिटी कवर कर रहे हैं. टीवी9 के साथ जुड़ने से पहले डीएनए, एशियानेट, जनसत्ता और राजस्थान पत्रिका जैसे कई बड़े संस्थानों के साथ भी जुड़े रहे.
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