फेस्टिव सीजन आते ही फ्लिपकार्ट और अमेजन जैसी ई-कॉमर्स कंपनियों की बड़ी सेल शुरू हो जाती है. बिग बिलियन डेज और ग्रेट इंडियन फेस्टिवल जैसे नामों के साथ 70 से 80 फीसदी तक छूट के बैनर ग्राहकों को आकर्षित करते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि इतनी भारी छूट देने के बाद भी कंपनियां कमाई कैसे करती हैं. दरअसल, इस पूरे खेल में सिर्फ ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म ही नहीं, बल्कि वेंडर, ब्रांड और पुराने स्टॉक की भी बड़ी भूमिका होती है. चलिए समझते हैं.
प्लेटफॉर्म और वेंडर मिलकर बनाते हैं डिस्काउंट
फ्लिपकार्ट और अमेजन जैसी कंपनियां खुद ज्यादातर सामान बनाकर नहीं बेचतीं, बल्कि वेंडर और ग्राहक के बीच एक प्लेटफॉर्म की तरह काम करती हैं. वेंडर को सामान बेचने के लिए जगह और सुविधाएं देने के बदले कंपनी बिक्री पर कमीशन लेती है. फेस्टिवल सेल के दौरान प्लेटफॉर्म अपना कमीशन कम करते हैं, जबकि वेंडर भी कीमत कम करते हैं. इस तरह भारी डिस्काउंट का पूरा बोझ किसी एक पक्ष पर नहीं आता. इसका मुख्य मकसद ज्यादा से ज्यादा सामान बेचकर बिक्री की मात्रा बढ़ाना और नए ग्राहकों को प्लेटफॉर्म से जोड़ना होता है. यानी कीमत कम होती है लेकिन बिक्री कई गुना बढ़ जाती है तो कमाई भी बढ़ती है.
पुराने स्टॉक से भी निकलता है बड़ा डिस्काउंट
कपड़ों और दूसरे सामान के पुराने स्टॉक को निकालने के लिए बड़े ब्रांड अक्सर डिस्काउंट देते हैं. हालांकि, अपनी ब्रांड पहचान बनाए रखने के लिए वे सीधे बहुत ज्यादा छूट नहीं दे पाते. ऐसे में लिक्विडेटर कंपनियां रिटेल कीमत के करीब 20 से 30 फीसदी में बड़ी मात्रा में स्टॉक खरीद सकती हैं. इसके बाद यही सामान छोटे मार्जिन के साथ सेल में बेचा जा सकता है. कुछ मामलों में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म भी चुनिंदा प्रोडक्ट कम कीमत या नुकसान पर बेचते हैं, क्योंकि उनका मकसद लंबे समय में ग्राहकों को अपने प्लेटफॉर्म पर खरीदारी के लिए बनाए रखना होता है.
बल्क में बिक्री से घट जाती है लागत
भारी डिस्काउंट को समझने के लिए बल्क सेलिंग भी अहम है. किसी प्रोडक्ट की बिक्री जितनी ज्यादा होती है, बड़ी मात्रा में उत्पादन और खरीद के कारण प्रति यूनिट लागत कम हो सकती है. इसका सीधा फायदा कीमत में दिया जा सकता है. मोबाइल, टीवी, लैपटॉप और एसी जैसे प्रोडक्ट बड़ी संख्या में बिकते हैं, इसलिए इन पर कंपनियां और वेंडर कम मार्जिन के साथ भी ज्यादा बिक्री कर सकते हैं. यानी एक सामान पर कम कमाई होने के बावजूद हजारों या लाखों यूनिट्स बेचने से कुल कमाई बढ़ सकती है.
FOMO से खरीदारी का दबाव
फेस्टिवल सेल में ग्राहकों को खरीदारी के लिए प्रेरित करने के लिए FOMO यानी छूट जाने का डर भी बनाया जाता है. कंपनियां सेल के प्रचार में बॉलीवुड सितारों, क्रिकेटर्स और दूसरी लोकप्रिय हस्तियों का इस्तेमाल करती हैं. ग्राहकों को ऐसा महसूस कराया जाता है कि ऑफर बहुत कम समय के लिए है और मौका निकलने के बाद वही प्रोडक्ट इतनी कम कीमत पर नहीं मिलेगा. इस जल्दबाजी में कई लोग जरूरत नहीं होने के बावजूद सामान खरीद लेते हैं. इससे सेल के दौरान बिक्री की मात्रा तेजी से बढ़ाने में मदद मिलती है.
आर्टिफिशियल कमी और कीमत का खेल
सेल के दौरान आर्टिफिशियल स्कैरसिटी यानी आर्टिफिशियल कमी भी ग्राहकों के खरीदारी के फैसले को प्रभावित कर सकती है. वेबसाइट पर टाइमर लगाकर दिखाया जाता है कि ऑफर खत्म होने में कुछ ही समय बचा है. इससे ग्राहक को तुरंत खरीदारी करने का दबाव महसूस हो सकता है. इसके अलावा कुछ मामलों में सेल से पहले प्रोडक्ट की कीमत बढ़ाकर फिर उस पर छूट दिखाई जाती है. ग्राहक को बड़ी बचत का अहसास होता है, जबकि दिखाई गई छूट वास्तविक कीमत और सेल कीमत के अंतर पर निर्भर करती है. इसलिए किसी भी बड़े डिस्काउंट को देखकर खरीदारी से पहले कीमत की तुलना करना समझदारी है.
कई बार तो जिस प्रोडक्ट पर काफी ज्यादा डिस्काउंट होता है उसे आउट ऑफ स्टॉक में मार्क कर दिया जाता है. यानी प्रोडक्ट बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं है लेकिन उसपर डिस्काउंट काफी ज्यादा दिखाया जाता है.
असली कमाई सिर्फ डिस्काउंट में नहीं
ई-कॉमर्स कंपनियों के लिए फेस्टिवल सेल का मकसद सिर्फ किसी एक प्रोडक्ट पर मुनाफा कमाना नहीं होता. कई बार कम मार्जिन या नुकसान पर कुछ सामान बेचकर ग्राहकों की संख्या और प्लेटफॉर्म पर कुल खरीदारी बढ़ाने पर जोर दिया जाता है. एक बार ग्राहक प्लेटफॉर्म पर नियमित खरीदारी करने लगे तो लंबे समय में कंपनी दूसरे प्रोडक्ट और सेवाओं से कमाई कर सकती है. यानी फेस्टिवल सेल में डिस्काउंट, बल्क बिक्री, पुराने स्टॉक की निकासी, वेंडर की कीमत और ग्राहक को आकर्षित करने वाली रणनीतियां मिलकर पूरा बिजनेस मॉडल तैयार करती हैं.
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विशाल मैथिल
भोपाल के रहने वाले हैं. कम्प्यूटर साइंस में ग्रेजुएशन और मीडिया रिसर्च में पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद डिजिटल मीडिया में कदम रखा. दैनिक भास्कर से शुरुआत हुई. इसके बाद टाइम्स नाउ नवभारत और अमर उजाला जैसे संस्थान में टेक जर्नलिस्ट के दौर पर करने के बाद TV9 भारतवर्ष से जुड़े हैं. सोशल मीडिया कैंपेन को लीड करने और हिंदी मैग्जीन में भी काम करने का मौका मिला. फिलहाल टेक्नोलॉजी, सोशल मीडिया, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सिक्योरिटी और स्मार्टफोन की खबरें आप तक आसान भाषा में पहुंचाने का काम कर रहे हैं. गैजेट्स कंपेरिजन, गैजेट्स रिव्यूज और मोबाइल रिचार्ज जैसे टॉपिक्स पर भी अच्छी पकड़ रखते हैं. रिसर्च, एक्सप्लेनर, डाटा स्टोरी और इंफोग्राफिक्स के साथ जटिल खबरों को आसानी से कहने और टेक जगत की छोटी-बड़ी अपडेट आप तक पहुंचाने का हुनर रखते हैं. गैजेट्स के अलावा किताबों और म्यूजिक में भी खूब मन लगता है.
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