मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार की अगुवाई वाले चुनाव आयोग में अंदरूनी मतभेदों की खबरों के बाद एक राजनीतिक हंगामा खड़ा हो गया. विपक्षी दलों ने सरकार की आलोचना तेज कर दी. वे मुख्य चुनाव आयुक्त के अपनी मर्जी से फैसले लिए जाने की खबरों के बीच उनके इस्तीफे से लेकर गिरफ्तारी तक की मांग कर रहे हैं. इस विवाद के बीच, यह सवाल उठ रहा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सीधे FIR दर्ज कराई जा सकती है या नहीं. भारतीय कानून के तहत क्या इस पद को कोई विशेष कानूनी संरक्षण हासिल है?
CEC के खिलाफ उनके आधिकारिक कर्तव्यों के पालन के दौरान लिए गए फैसलों को लेकर सीधे तौर पर कोई FIR दर्ज नहीं की जा सकती. उन्हें कानूनी सुरक्षा प्राप्त है जो उनके आधिकारिक कार्यों तक ही सीमित है. हालांकि, यदि वे अपनी व्यक्तिगत हैसियत से कोई अपराध करते हैं, तो उन पर आपराधिक कानून के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है.
अधिनियम, 2023 की धारा 16 के तहत, मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके कार्यकाल के दौरान या रिटायरमेंट के बाद, आधिकारिक कर्तव्यों के पालन में किए गए कार्यों या लिए गए फैसलों के लिए सिविल या आपराधिक कार्यवाही से कानूनी सुरक्षा या छूट मिलती है. हालांकि, यह छूट केवल आधिकारिक कार्यों को करते समय की गई गतिविधियों पर ही लागू होती है.
धारा 16 की भाषा के अनुसार, यह छूट केवल उन कार्यों तक सीमित है जो CEC या चुनाव आयुक्त (EC) द्वारा आधिकारिक कर्तव्य के पालन में किए गए हों, या करने का प्रयास किया गया हो. इसके विपरीत, यदि CEC या EC सीधे तौर पर कोई अपराध करते हैं- जैसे शारीरिक चोट पहुंचाना, हमला करना, या किसी अन्य संज्ञेय (cognizable) या असंज्ञेय (non-cognizable) आपराधिक गतिविधि में शामिल होना, तो भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं के तहत FIR दर्ज की जा सकती है या कानूनी कार्यवाही शुरू की जा सकती है. CEC को दी गई यह छूट उच्च न्यायपालिका के जजों को मिलने वाली छूट की तर्ज पर ही है.
दिल्ली हाई कोर्ट के जज का मामला
हालांकि एक दुर्भाग्यपूर्ण उदाहरण दिल्ली हाई कोर्ट के एक जज के घर में भारी नकदी मिलने के बावजूद FIR दर्ज ना होना सबके सामने है, क्योंकि उस समय वह अपने न्यायिक कर्तव्यों का निर्वहन नहीं कर रहे थे. हालांकि उनके खिलाफ महाभियोग प्रक्रिया संसद में अभी लंबित है. मौजूदा कानून की धारा-16 को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा था, लेकिन उस समय प्रावधान पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था.
हाल ही में इस पर दो जजों की पीठ ने एक बंटा हुआ फैसला दिया और सीजेआई से मामले को सीधे पांच जजों की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए भेजने की सिफारिश की है. ऐसे में सीईसी के खिलाफ FIR या आपराधिक मुकदमे के सवाल मुख्यतः इस बात पर निर्भर करेगा कि आरोपित कृत्य धारा-16 में संरक्षित official duty or function के दायरे में आता है या नहीं. धारा 16 की संवैधानिक वैधता पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला क्या होता है.
CEC को पद से हटाने की प्रक्रिया
CEC को पद से हटाने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के समान आधार और प्रक्रिया से जुड़ी है. यानी हटाने के लिए संसद की विशेष प्रक्रिया और सिद्ध कदाचार या अक्षमता का आधार जरूरी है. इसके लिए संसद में महाभियोग या हटाने की प्रक्रिया को अंजाम देना होगा. हालांकि सिर्फ महाभियोग की कार्यवाही शुरू होने या संसद में नोटिस दिए जाने से CEC या EC की आपराधिक प्रतिरक्षा अपने-आप खत्म नहीं होती.
महाभियोग प्रक्रिया को अंजाम देने के बाद उन्हें सिर्फ पद से हटाया जा सकता है जिसकी पूरी प्रक्रिया न्यायाधीश (जांच) अधिनियम-1968 के तहत है. सीईसी को उनके पद से हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के जज के समान होती है, जबकि अन्य चुनाव आयुक्तों को सीईसी की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा हटाया जाता है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों को हटाने के नियम तय किए गए हैं.
- साबित दुर्व्यवहार: पद का गलत इस्तेमाल, पक्षपातपूर्ण व्यवहार या भ्रष्टाचार.
- असमर्थता: शारीरिक या मानसिक कारणों से अपने कर्तव्यों को पूरा करने में असमर्थ होना.
मुख्य चुनाव आयुक्त के हटाने की प्रक्रिया
- प्रस्ताव का नोटिस: महाभियोग प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में लाया जा सकता है. लोकसभा में इसके लिए कम से कम 100 सांसदों और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी हैं.
- स्वीकृति या अस्वीकृति: सदन के पीठासीन अधिकारी (लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति) इस नोटिस को स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं.
- जांच समिति: यदि प्रस्ताव स्वीकार होता है, तो आरोपों की जांच के लिए एक 3 सदस्यीय समिति बनती है (जिसमें सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या जज, हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित न्यायविद् शामिल होते हैं).
- संसद में मतदान: जांच में दोषी पाए जाने पर प्रस्ताव को संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) द्वारा विशेष बहुमत (कुल सदस्यों का बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत) से पास करना होता है.
- राष्ट्रपति की मंजूरी: दोनों सदनों से प्रस्ताव पास होने के बाद राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का आदेश जारी करते हैं.
अन्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया
अन्य चुनाव आयुक्तों को हटाने के लिए संसद में महाभियोग की जरूरत नहीं होती है. राष्ट्रपति, मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश पर अन्य चुनाव आयुक्तों को उनके पद से हटा सकते हैं.

पीयूष पांडे
प्रमुखत: सुप्रीम कोर्ट, वित्त मंत्रालय और भारतीय निर्वाचन आयोग की खबरों की जिम्मेदारी. पत्रकारिता में 22 वर्षों से ज्यादा का अनुभव. हिंदुस्तान, अमर उजाला, दैनिक भास्कर और आज में सेवाएं दीं. खबरिया चैनल और अखबार के अलावा दैनिक भास्कर के डिजिटल प्लेटफॉर्म में जिम्मेदारी निभाई, जबकि ऑल इंडिया रेडियो के आमंत्रण पर कई विशिष्ट जनों के साक्षात्कार किए.
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