August 28, 2026

अंगदान से भारत-पाकिस्तान में बना भाई-बहन का रिश्ता: शुजालपुर की महक को मिला था पाकिस्तान की इफरा का लीवर, 14 साल से जीवित - Shujalpur News

न कभी राखी बांधी, न एक-दूसरे के घर जाकर त्योहार मनाया। न खून का रिश्ता था और न पहले कोई पहचान। फिर भी रक्षाबंधन पर हर साल की तरह आज शुजालपुर के राकेश बाहेती ने उस बहन से वीडियो कॉल पर पर्व की बधाई ली, जो सीमा के उस पार पाकिस्तान में रहती हैं। कभी मिल

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इस रिश्ते की वजह है एक लिवर और 6 साल की महक की जिंदगी। आज से करीब 15 साल पहले, 2012 में महक जिंदगी और मौत के बीच थी। जेनेटिक बीमारी के कारण उसे लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत थी। पोती की जिंदगी बचाने के लिए उसकी दादी राधा बाहेती ने 60 वर्ष की उम्र में अपना लिवर दान करने का निर्णय लिया। पूरी प्रक्रिया हुई, लेकिन अलग ब्लड ग्रुप के कारण उनका लिवर महक को नहीं लगाया जा सका।

अपनी दादी और भाई के साथ महक।

अपनी दादी और भाई के साथ महक।

ऐसा बना रिश्ता

उसी समय गुड़गांव के मेदांता अस्पताल में पाकिस्तान सेना में लेफ्टिनेंट कमांडर रहे इफ्तिखार भी लिवर ट्रांसप्लांट का इंतजार कर रहे थे। उनकी पत्नी डॉक्टर इफरा अहमद ने पति के लिए अपना लिवर देने की प्रक्रिया पूरी की थी, लेकिन उनका लिवर भी पति से मैच नहीं हुआ। फिर डॉक्टरों ने एक ऐसा चिकित्सकीय विकल्प खोजा, जिसने दो देशों के दो परिवारों को हमेशा के लिए जोड़ दिया।

राधा बाहेती का लिवर इफ्तिखार से मैच हुआ और डॉक्टर इफरा का लिवर महक से। 6 अक्टूबर 2012 को दोनों ट्रांसप्लांट हुए। भारत की राधा का लिवर पाकिस्तान के इफ्तिखार के शरीर में पहुंचा और पाकिस्तान की इफरा का लिवर भारत की महक के शरीर में। एक ऑपरेशन में दो जिंदगियां बचीं, लेकिन इसके साथ उससे भी बड़ा रिश्ता जन्म ले चुका था।

महक 20 की हुई, इफरा आज भी परिवार का हिस्सा

उस समय छह साल की महक आज 20 साल की है। हैदराबाद के नालसार (एनएलयू) से कानून की पढ़ाई कर रही है और फाइनल ईयर में है। वह सामान्य जिंदगी जी रही है। उसके पिता राकेश बाहेती के लिए यह केवल उनकी बेटी के स्वस्थ होने की कहानी नहीं है, बल्कि उस पाकिस्तानी महिला से जुड़ा रिश्ता भी है, जिसने अपनी बेटी नहीं, बल्कि एक अनजान बच्ची को जीवन देने के लिए अपना लिवर दिया।

इफरा लाहौर यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं। उनके पति और पाकिस्तान सेना में लेफ्टिनेंट कमांडर रहे इफ्तिखार अब जीवित नहीं हैं, लेकिन उनके जाने के बाद भी इफरा और बाहेती परिवार के बीच बना रिश्ता कमजोर नहीं हुआ।

उन्होंने भास्कर से खास बातचीत में कहा सरहदें रिश्ते नहीं बांट सकती। जीवन में मौका मिले तो अंगदान सबको करना चाहिए, इससे वो सब मिलता है, जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। दोनों देश के रिश्ते अच्छे रहे और भारत आने का मौका मिले तो भारत इस बेटी और परिवार से मिलने आने की इच्छा इन्होंने जताई।

अपने माता-पिता के साथ महक।

अपने माता-पिता के साथ महक।

इफरा को राकेश अपनी बहन मानते हैं

इफरा की बड़ी बेटी ईशा ने सीएसएस परीक्षा पास की है और वर्तमान में पाकिस्तान के पंजाब सूबे में कमिश्नर हैं। छोटी बेटी सीएसएस की तैयारी कर रही हैं। दोनों परिवार एक-दूसरे के बच्चों की उपलब्धियों को अपनी खुशी मानते हैं।

रक्षाबंधन पर सरहद पार से आती है बहन की शुभकामना

रक्षाबंधन के दिन दोनों परिवारों के बीच बातचीत का सिलसिला खास हो जाता है। राकेश और इफरा एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं। कभी परिवार की बात, कभी बच्चों की पढ़ाई और कभी पुरानी यादें- बातचीत में दोनों देशों की दूरी कहीं दिखाई नहीं देती।

राकेश कहते हैं, "इफरा मेरे लिए बहन हैं। हमारी मुलाकात जिस परिस्थिति में हुई, वह जिंदगी का सबसे अलग अनुभव था। उनकी वजह से मेरी बेटी आज हमारे बीच है। लेकिन अब यह रिश्ता सिर्फ उस घटना तक सीमित नहीं है। हम एक-दूसरे के सुख-दुख साझा करते हैं।"

पाकिस्तानी बहन से आमने-सामने मिलने की इच्छा

वे कहते हैं, “आमने-सामने ईश्वर कब राखी बंधवाने का मौका देगा, पता नहीं। लेकिन भाई-बहन का यह रिश्ता हमेशा कायम रहेगा। मेरी इच्छा है कि महक की शादी में इफरा जरूर आएं। उस दिन दोनों परिवार एक साथ हों, यही सपना है।”

छह साल की महक जिसे मिला इफरा का लिवर।

छह साल की महक जिसे मिला इफरा का लिवर।

दादा भवानी शंकर ने भी छोड़ी सेवा की विरासत

अंगदान की इसी भावना को बाहेती परिवार ने आगे भी जारी रखा। 7 सितंबर 2025 को महक के दादा और शुजालपुर के 75 वर्षीय अनाज व्यवसायी भवानी शंकर बाहेती का निधन हुआ। परिजन ने उनकी इच्छा के अनुरूप नेत्रदान कराया। उनकी दोनों आंखों से प्राप्त कॉर्निया जरूरतमंद मरीजों के प्रत्यारोपण में उपयोग हुए।

परिवार के लिए यह केवल नेत्रदान नहीं था, बल्कि उस सोच की निरंतरता है, जो राधा बाहेती ने 2012 में पोती की जिंदगी बचाने के लिए अंगदान की प्रक्रिया शुरू कर अपनाई थी।