Indian Rupee VS Dollar: भारतीय रुपये को लेकर आने वाले समय में चिंता बढ़ाने वाली एक रिपोर्ट सामने आई है. फिच सॉल्यूशंस से जुड़ी रिसर्च कंपनी BMI का अनुमान है कि भारतीय रुपया अगले दो वित्त वर्षों में और कमजोर हो सकता है. रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 के अंत तक रुपया 97 रुपये प्रति डॉलर और वित्त वर्ष 2027-28 के अंत तक 99 रुपये प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंच सकता है.
फिलहाल रुपया करीब 95.4 रुपये प्रति डॉलर के स्तर पर है. यानी अगर यह अनुमान सही साबित होता है तो अगले दो वित्त वर्षों में रुपये की कीमत डॉलर के मुकाबले करीब 3.6% और कमजोर हो सकती है.
लेकिन सवाल यह है कि आखिर रुपये पर इतना दबाव क्यों बन रहा है? क्या यह सिर्फ अमेरिका-ईरान संघर्ष का असर है या इसके पीछे कुछ और बड़े कारण भी हैं? इसके अलावा सबसे अहम सवाल ये भी है कि क्या भारत के पास रुपये को संभालने के लिए पर्याप्त विकल्प हैं?
रुपये के 99 तक गिरने का अनुमान क्यों?
BMI के मुताबिक रुपये पर कई मोर्चों से दबाव बन रहा है. इनमें सबसे बड़ा कारण ऊंची ऊर्जा कीमतें हैं. भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है. इसलिए जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है तो भारत को तेल खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं. इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव आता है.
आसान भाषा में समझें तो-
महंगा तेल → ज्यादा डॉलर की जरूरत → डॉलर की मांग बढ़ेगी → रुपये पर दबाव बढ़ेगा
यही वजह है कि भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में किसी भी बड़े संकट का असर सीधे रुपये पर दिखाई दे सकता है.
अमेरिका-ईरान संघर्ष से कितना असर पड़ा?
BMI के मुताबिक अमेरिका-ईरान संघर्ष शुरू होने के बाद रुपया करीब 4 फीसदी कमजोर हो चुका है. संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ी है. निवेशक आमतौर पर ऐसे समय में जोखिम वाली संपत्तियों से पैसा निकालकर सुरक्षित माने जाने वाले विकल्पों की ओर जाते हैं. अमेरिकी डॉलर भी ऐसे समय में मजबूत होता है. अगर संघर्ष लंबे समय तक चलता है तो तेल की कीमतों में और तेजी आ सकती है. इससे भारत का आयात बिल बढ़ेगा और डॉलर की मांग भी बढ़ सकती है. हालांकि, BMI को उम्मीद है कि संघर्ष का स्थायी समाधान होने पर वित्त वर्ष के दूसरे हिस्से में रुपये पर कुछ दबाव कम हो सकता है.
भारत-अमेरिका ब्याज दरों का अंतर क्यों महत्वपूर्ण है?
रुपये की कीमत पर ब्याज दरों का भी बड़ा असर पड़ता है. अगर अमेरिका में ब्याज दरें भारत की तुलना में ज्यादा आकर्षक रहती हैं तो विदेशी निवेशकों के लिए अमेरिकी संपत्तियों में पैसा लगाना ज्यादा फायदेमंद हो सकता है. इससे भारत से विदेशी पूंजी बाहर जा सकती है और डॉलर की मांग बढ़ सकती है.
BMI का अनुमान है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व 2026 के बाकी हिस्से में अपनी नीति दर को 3.75 फीसदी पर बनाए रख सकता है और 2027 में इसमें करीब 0.50 प्रतिशत अंक की कटौती कर सकता है.
दूसरी तरफ, BMI को उम्मीद है कि भारतीय रिजर्व बैंक फरवरी 2027 में ब्याज दर में 0.25 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी कर सकता है. अगर भारत में ब्याज दरें अमेरिका की तुलना में ज्यादा आकर्षक होती हैं तो इससे रुपये को कुछ समर्थन मिल सकता है.
क्या सरकार रुपये को गिरने से रोक सकती है?
रुपये को किसी एक स्तर पर बनाए रखना आसान नहीं होता. लेकिन सरकार और RBI के पास कई ऐसे उपाय हैं जिनसे रुपये में अचानक और तेज गिरावट को सीमित किया जा सकता है.
हाल के समय में सरकार और RBI ने विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के लिए कई कदम उठाए हैं.
इनमें शामिल हैं-
- विदेशी निवेशकों के लिए कुछ कर संबंधी रियायतें.
- भारतीय बॉन्ड बाजार में विदेशी निवेश की पहुंच बढ़ाना.
- विदेशी मुद्रा की हेजिंग को आसान और सस्ता बनाना.
- विदेशी पूंजी के प्रवाह को बढ़ावा देने वाले नीतिगत बदलाव.
BMI के मुताबिक इन उपायों से करीब 40 अरब डॉलर का विदेशी पोर्टफोलियो निवेश आया है.
अगर विदेशी पूंजी का प्रवाह मजबूत रहता है तो इससे डॉलर की उपलब्धता बढ़ेगी और रुपये पर दबाव कुछ कम हो सकता है.
भारत के पास सर्विस सेक्टर भी बड़ी ताकत है
भारत के लिए सिर्फ सामान का व्यापार ही महत्वपूर्ण नहीं है. देश बड़ी मात्रा में आईटी, सॉफ्टवेयर, बिजनेस प्रोसेस और दूसरी सेवाओं का निर्यात करता है. भारत का सेवा क्षेत्र लंबे समय से देश के बाहरी खाते को मजबूती देता रहा है.
जब भारतीय कंपनियां विदेशों से सेवाओं के बदले डॉलर कमाती हैं तो देश में विदेशी मुद्रा आती है. इससे आयात के लिए जरूरी डॉलर की जरूरत पूरी करने में मदद मिलती है. यही वजह है कि BMI का मानना है कि भारत का मजबूत सर्विस सरप्लस रुपये को निकट अवधि में समर्थन देता रहेगा.
विदेशों से आने वाला पैसा भी रुपये के लिए सहारा
भारत को विदेशों में काम करने वाले भारतीयों से बड़ी मात्रा में धनप्रेषण यानी Remittances मिलता है. यह विदेशी मुद्रा का एक महत्वपूर्ण स्रोत है. अगर भारतीय प्रवासी लगातार देश में पैसा भेजते रहते हैं तो इससे भारत के पास डॉलर और अन्य विदेशी मुद्राओं का प्रवाह बना रहता है.
BMI के मुताबिक भारत में होने वाला धनप्रेषण फिलहाल वस्तु व्यापार घाटे के करीब आधे के बराबर है. इससे चालू खाते के घाटे को सीमित रखने में मदद मिलती है. यानी तेल आयात की वजह से जहां डॉलर की मांग बढ़ती है, वहीं सेवा निर्यात और विदेशों से आने वाला पैसा डॉलर की उपलब्धता बढ़ाने में मदद करता है.
सुपर अल नीनो भी रुपये के लिए खतरा क्यों?
रुपये के सामने सिर्फ भू-राजनीतिक संकट ही चुनौती नहीं है. मौसम भी आने वाले समय में बड़ी भूमिका निभा सकता है. BMI ने संभावित ‘सुपर अल नीनो’ को भी रुपये के लिए जोखिम बताया है. अगर अल नीनो की वजह से भारत में मौसम और मानसून प्रभावित होता है तो कृषि उत्पादन पर असर पड़ सकता है.
इस स्थिति में दो चीजें हो सकती हैं-
कृषि निर्यात घट सकता है और खाद्य पदार्थों का आयात बढ़ सकता है. इससे भारत का व्यापार घाटा बढ़ सकता है और डॉलर की मांग पर दबाव आ सकता है. हालांकि, भारत के पास पर्याप्त खाद्यान्न भंडार होने से इस जोखिम का कुछ असर कम होने की उम्मीद है.
AI भी अप्रत्यक्ष रूप से रुपये के लिए चुनौती बन सकता है?
यह एक दिलचस्प पहलू है. BMI ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI के बढ़ते इस्तेमाल को भी भारत के लिए संभावित जोखिमों में शामिल किया है. भारत का सेवा क्षेत्र बड़ी संख्या में सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग, कॉल सेंटर और दूसरे IT-enabled कामों पर निर्भर करता है. अगर AI की वजह से इन क्षेत्रों में रोजगार या सेवाओं की मांग प्रभावित होती है तो भारत के सेवा निर्यात पर असर पड़ सकता है. हालांकि फिलहाल भारत का मजबूत सेवा अधिशेष रुपये को समर्थन देने वाले प्रमुख कारकों में शामिल है. इसलिए यह तत्काल खतरा नहीं बल्कि लंबी अवधि का संभावित जोखिम है.
रूस से तेल खरीदने पर अमेरिका का दबाव कितना महत्वपूर्ण?
भारत के लिए एक और बड़ा जोखिम अमेरिका की व्यापार नीति से जुड़ा है. देश रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता रहा है. अगर रूस से तेल खरीदने को लेकर अमेरिका भारत पर ज्यादा शुल्क या अन्य व्यापारिक दबाव डालता है तो इससे भारत के निर्यात और विदेशी निवेश पर असर पड़ सकता है. अगर निवेशकों का भरोसा कमजोर होता है तो विदेशी पूंजी का प्रवाह घट सकता है. इसका सीधा असर रुपये पर पड़ सकता है.
क्या 99 रुपये प्रति डॉलर पहुंचना तय है?
BMI का अनुमान एक पूर्वानुमान है, कोई निश्चित भविष्यवाणी नहीं. रुपये की कीमत कई घरेलू और वैश्विक परिस्थितियों पर निर्भर करती है. अगर अमेरिका-ईरान संघर्ष जल्दी खत्म हो जाता है, तेल की कीमतें नीचे आती हैं, विदेशी निवेश बढ़ता है और भारत का सेवा निर्यात मजबूत रहता है तो रुपये पर दबाव कम हो सकता है.
वहीं अगर युद्ध लंबा चलता है, तेल महंगा होता है और वैश्विक निवेशक जोखिम से बचने लगते हैं तो रुपया अनुमान से भी ज्यादा दबाव में आ सकता है.
रुपया कमजोर होने से आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?
रुपये की कमजोरी का असर सिर्फ शेयर बाजार या विदेशी मुद्रा बाजार तक सीमित नहीं रहता. आम लोगों की जेब पर भी इसका असर पड़ सकता है. भारत जिन चीजों का बड़े पैमाने पर आयात करता है, उनके दाम बढ़ सकते हैं.
खास तौर पर—
- कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद महंगे हो सकते हैं.
- पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है.
- आयातित इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी महंगी हो सकती है.
- विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों का खर्च बढ़ सकता है.
- विदेश यात्रा महंगी हो सकती है.
- विदेशी मुद्रा में भुगतान करने वाली कंपनियों की लागत बढ़ सकती है.
हालांकि रुपये की कमजोरी से कुछ लोगों और क्षेत्रों को फायदा भी होता है. उदाहरण के लिए IT और दूसरी सेवाओं का निर्यात करने वाली कंपनियों को डॉलर में मिलने वाली कमाई को रुपये में बदलने पर ज्यादा रकम मिल सकती है.
तो क्या RBI रुपये को संभाल पाएगा?
RBI के पास विदेशी मुद्रा भंडार, बाजार में डॉलर की खरीद-बिक्री और मौद्रिक नीति जैसे कई साधन हैं. जरूरत पड़ने पर केंद्रीय बैंक रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को कम करने के लिए बाजार में हस्तक्षेप कर सकता है.
लेकिन RBI का लक्ष्य हमेशा रुपये को किसी एक निश्चित स्तर पर रखना नहीं होता. उसका मुख्य उद्देश्य बाजार में अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करना होता है. इसलिए अगर वैश्विक स्तर पर डॉलर मजबूत हो रहा है और तेल महंगा है तो रुपये में कुछ कमजोरी को पूरी तरह रोकना मुश्किल हो सकता है.
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99 रुपये का अनुमान चेतावनी है, तय मंजिल नहीं
BMI का 2027-28 के अंत तक रुपये के 99 प्रति डॉलर तक पहुंचने का अनुमान कई जोखिमों पर आधारित है. ऊंची तेल कीमतें, अमेरिका-ईरान संघर्ष, वैश्विक जोखिम से बचने की प्रवृत्ति, ब्याज दरों का अंतर, मौसम और विदेशी निवेश में उतार-चढ़ाव रुपये के लिए चुनौती बन सकते हैं.
लेकिन भारत के पास कुछ मजबूत सुरक्षा कवच भी हैं. मजबूत सेवा निर्यात, विदेशों से आने वाला धनप्रेषण, विदेशी निवेश आकर्षित करने के सरकारी प्रयास और पर्याप्त खाद्यान्न भंडार रुपये पर दबाव को सीमित करने में मदद कर सकते हैं. इसलिए 99 रुपये का अनुमान फिलहाल एक संभावित जोखिम को दिखाता है. रुपये की वास्तविक दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि आने वाले महीनों में तेल की कीमतें, भू-राजनीतिक तनाव, अमेरिकी ब्याज दरें और भारत में विदेशी पूंजी का प्रवाह किस दिशा में जाते हैं.
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