July 19, 2026

Explainer: देश में शुरू हुई पानी से चलने वाली ट्रेन, जानें हाइड्रोजन फ्यूल का इतिहास

Explainer:हरियाणा के जींद स्टेशन से 17 जुलाई को एक अनोखी ट्रेन चल पड़ी है. इसे चलाने के लिए न तो डीजल चाहिए और न ही बिजली. चलने पर न तो धुआं होगा और न ही राख निकलेगा. ये भारत की पहली हाईड्रोजन ट्रेन है, जो जींद से लेकर सोनीपत के बीच चलेगी. 89 किलोमीटर लंबे सफर में करीब 2600 यात्री सफर कर पाएंगे. इसे दुनिया की सबसे ताकतवर हाइड्रोजन ट्रेनों को गिना जाएगा. 

बता दें, 17 जुलाई को लॉन्च हुई भारत की पहली हाईड्रोजन ट्रेन जर्मनी की मूल हाइड्रोजन ट्रेन से करीब 5 गुना ज्यादा लंबी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जींद स्टेशन पर ट्रेन को हरी झंडी दिखाई है. आखिर ये हाइड्रोजन फ्यूल क्या होता है और इसका इतिहास क्या है, आइये जानते हैं….

कहानी की शुरुआत होती है आज से करीब ढाई सौ साल पहले, लंदन की एक लैब से. साल 1776, हेनरी कैवेंडिश नाम के वैज्ञानिक जिंक धातु को तेजाब में डालते हैं और अचानक उसमें से बुलबुले उठने लगते है. खास बात है ये एक ऐसी गैस का बुलबुला था, जिसे पहले कभी भी किसी ने देखा नहीं था. जब कैवेंडिश ने इस रंगहीन हैस में चिंगारी लगाई तो भम्म जैसे हल्की सी आवाज निकली और पानी की बूंद बन गई. यही से पहली बार लोगों को पता चला कि जिस पानी को हम लोग रोज पीते हैं, उसमें वही गैस है, जिससे ट्रेन चल रही है. 

#WATCH | Haryana: A trial run of a hydrogen train took place today between Delhi and Jind. The trial focused on emergency braking distance and oscillation.

(Source: Indian Railways) pic.twitter.com/2UCcK1I6rH

— ANI (@ANI) June 26, 2026

गैस तो मिल गई थी, पर उसका नाम क्या रखें?

अब गैस तोे मिल गई थी पर उस गैस का नाम क्या होगा. इस बारे में मंथन शुरू हुआ. अब इस काम को किया फ्रांस के एक कैमिस्ट ने. उन्होंने ग्रीक भाषा के दो शब्दों को आपस में जोड़ा और एक नया शब्द बनाया. हाईड्रोजन यानी पानी से जन्मा. ग्रीक भाषा में हाइड्रो का मतलब पानी होता है और जेनेस का मतलब जन्मा. 

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इसके बाद, 18वीं शताब्दी में दो अंग्रेज वैज्ञानिकों ने उल्टा कमाल कर दिया. उन्होंने बिजली का करंट पानी में दौड़ा दिया और उसे हाइड्रोजन और ऑक्सीजन गैस में तोड़ दिया. इस प्रोसेस को एक नया नाम दिया गया- इलेक्ट्रोलिसिस. आज इसी प्रोसेस से दुनिया भर में हाईड्रोजन बनाई जा रही है. 

#WATCH | Jind, Haryana | Prime Minister Narendra Modi says, "Hydrogen trains have only recently arrived on the global stage. They came into existence just seven or eight years ago. Currently, only three or four countries possess the capability to operate hydrogen trains, and even… pic.twitter.com/7lJIZRx7Ta

— ANI (@ANI) July 17, 2026

क्या हाइड्रोजन गैस ईंधन के तौर पर इस्तेमाल हो सकती है?

1838 में एक कैमिस्ट ने पाया कि हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को साथ मिलाने पर सिर्फ पानी ही नहीं बल्कि एनर्जी भी मिलती है. इंग्लैंड के वैज्ञानिक जज विलियम ग्रोव ने इसी सिद्धांत पर एक असल मशीन बना डाली, जिसे ग्रोव ने गैस बैटरी कहा. इसमें हाईड्रोजन की एनर्जी को बैटरी में स्टोर कर सकते हैं. ये दुनिया का पहला फ्यूल सेल था. इसी वजह से ग्रोव को ‘फादर ऑफ द फ्यूल सेल’ कहा जाता है.

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हाइड्रोजन की कहानी में एक बड़ा हादसा भी दर्ज है

साल 1937 में हाइड्रोजन गैस से भरा हुआ एक हिंडनहबर्ग नामक विशालकाय एयरशिप लैंडिंग के वक्त अचानक आग का गोला बन गया था. दरअसल, हाइड्रोजन बहुत ही हल्की गैस होती है और हिंडनबर्ग एयरशिप में हाइड्रोजन का इस्तेमाल एयरशिप को हवा के गुब्बारे की तरह ऊपर उठाने के लिए किया जाता था. इस दौरान, किन्हीं कारण से एयरशिप के पिछले हिस्से में आग लग गई और हाइड्रोजन की ज्वलनशील प्रवृत्ति की वजह से सेकेंडों में पूरी एयरशिप जल गई. हादसे के बाद पूरे प्रोजेक्ट को बंद कर दिया गया.

#WATCH | Jind, Haryana: Prime Minister Narendra Modi will flag off India's first hydrogen-powered train between Jind and Sonipat tomorrow

pic.twitter.com/JUbWycjE9N

— ANI (@ANI) July 16, 2026

असल मोड़ आया साल 1973 में, जब मिडिल ईस्ट के देशों ने अचानक तेल की सप्लाई ही रोक डाली थी. इस दौरान, दुनिया को एहसास हुआ कि हमेशा तेल पर ही निर्भर रहना रिस्की हो सकता है और यहीं से हाइड्रोजन को गंभीरता से एक ऑप्शन के रूप में देखा जाने लगा था.  

नॉर्डिक द्वीपीय देश आइसलैंड ने साल 1998 में ऐलान किया कि साल 2030 तक वह दुनिया की पहली हाइड्रोजन-आधारित इकोनॉमी बनेगा. जर्मनी ने साल 2018 में दुनिया की पहली कमर्शियल हाइड्रोजन पैसेंजर ट्रेनें उतार दीं. जापान, चीन और अमेरिका ने भी हाइड्रोजन ट्रेनें लॉन्च कर दी. 

इन देशों में फ्लॉप हुई हाइड्रोजन ट्रेन 

हाइड्रोजन ट्रेन की टेक्नोलॉजी दुनिया में बहुत नई है. फ्रांस की कंपनी अल्स्टॉम ने सबसे पहले 2016 में बर्लिन की एक प्रदर्शनी में इसे दिखाया था. इसके बाद साल 2018 में जर्मनी में दुनिया की पहली हाइड्रोजन पैसेंजर ट्रेनें चलीं. हालांकि, जर्मनी ने 2024 के अंत तक अपनी कई हाइड्रोजन ट्रेनें सर्विस से हटा दीं. 2022 में जापान ने हाइड्रोडन ट्रेनों की टेस्टिंग शुरू की थी लेकिन अब तक बड़े पैमाने पर उसे उतार नहीं पाया. चीन और अमेरिका भी इसे सिर्फ छोटी दूरी पर ही चला रहे हैं.  

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तो क्या बड़े पैमाने पर हाइड्रोजन ट्रेनें शुरू करेगा भारत?

अगर जींद-सोनीपत रूट पर ये प्रयोग कामयाब होता है तो आने वाले वक्त में देश के विभिन्न हेरिटेज और पहाड़ी रूटों पर भी हाइड्रोजन ट्रेनें चल सकती है. यहां बिजली की लाइनें खींचना मुश्किल है और डीजल इंजन का धुआं चिंता का सबब बना हुआ है. अगर ये ट्रेन सफल नहीं होती है तो जर्मनी की तरह भारत भी इससे दूरी बना सकता है.