July 20, 2026

Explainer: अमेरिका-ईरान डील में आर्टिकल 5 कैसे बन गया रोड़ा? जानें क्या है इसकी सबसे बड़ी वजह

Explainer: अमेरिका और ईरान के बीच पिछले दो सप्ताह से ताबड़तोड़ हमले जारी है. ये हमले ईरान की ओर से होर्जुम में तीन हजाहों को निशाना बनाने के बाद शुरू हुई. हालांकि इससे पहले जून में दोनों देशों के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर हुए थे. ये समझौता होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से कमर्शियल शिपिंग को फिर से शुरू करने की उम्मीद के साथ हुआ था. लेकिन ये समझौता ईरान-अमेरिका के सबसे विवादित प्रावधानों में से एक बन गया. इससे दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक के भविष्य के मैनेजमेंट को लेकर वॉशिंगटन और तेहरान के बीच बहुत अलग-अलग नजरिए सामने आए हैं.

आर्टिकल 5 के चलते समझौते में फंसा पेंच

जानकारों का कहना है कि आर्टिकल 5, जो नेविगेशन की आजादी, माइन हटाने (demining) और समुद्री सुरक्षा से जुड़ा है, उसमें बड़े समझौते को पक्का करने के लिए जान-बूझकर अहम राजनीतिक सवालों को अनसुलझा छोड़ दिया गया. इसी को इस समझौते को लागू करने में सबसे बड़ी रुकावटों में से एक माना जा राह है. खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा मामलों पर रिसर्च करने वाले जानकारों की मानें तो, "वॉशिंगटन और तेहरान आर्टिकल 5 का मतलब बहुत अलग-अलग निकालते हैं."

समझौते में आर्टिकल 5 के चलते आई अड़चन

इस प्रावधान में होर्मुज जलडमरूमध्य से कमर्शियल जहाजों के सुरक्षित गुजरने की बात कही गई है, जिसमें 60 दिन की वह अवधि भी शामिल है जब ईरान कोई ट्रांजिट फीस नहीं लेगा और इस दौरान माइन हटाने समेत समुद्री सुरक्षा के उपाय किए जाएंगे. इस्लामाबाद MoU के अनुसार, ईरान जलडमरूमध्य से कमर्शियल जहाजों के सुरक्षित गुजरने को पक्का करने के लिए अपनी "पूरी कोशिश" करेगा और 60 दिनों तक इसके लिए कोई शुल्क नहीं लेगा. समझौते में कहा गया, "कमर्शियल जहाजों की आवाजाही तुरंत शुरू हो जाएगी, और तकनीकी व सैन्य रुकावटों को हटाने तथा इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ ईरान द्वारा माइन हटाने की जरूरत को ध्यान में रखते हुए, इसे 30 दिनों के भीतर लागू कर दिया जाएगा."

होर्मुज के लिए दोनों देशों का अलग-अलग नजरिया

इसके साथ ही इस आर्टिकल में असल में शिपिंग को लेकर किसी असहमति के बजाय, बुनियादी तौर पर अलग-अलग राजनीतिक मकसदों को दिखाता है. जानकारों का कहना है कि अमेरिका के लिए, इस आर्टिकल को इस तरह समझा जा सकता है कि यह ईरान और उसके खाड़ी के अरब पड़ोसियों के बीच भविष्य की बातचीत के लिए आधार तैयार कर रहा है, ताकि जलडमरूमध्य (स्ट्रेट) से समुद्री ट्रैफ़िक को मैनेज करने के लिए एक साझा ढांचा बनाया जा सके. वॉशिंगटन के नजरिए से, ये बातचीत सभी तटीय देशों के बीच संप्रभु समानता के आधार पर होनी चाहिए.

इस समझौते का अलग मतलब निकालता है ईरान

वहीं दूसरी ओर ईरान इस समझौते का मतलब बिल्कुल अलग तरह से निकालता है. इसके उलट, ईरान इस क्लॉज को अमेरिका की तरफ से उस जलडमरूमध्य पर तेहरान के दबदबे को एक तरह से आधी-अधूरी मंजूरी मानता है. जानकारों का कहना है कि इस सोच की वजह से ईरान भविष्य की किसी भी बातचीत में यह मानकर शामिल हो सकता है कि वॉशिंगटन ने पहले ही टकराव से पहले की स्थिति में बदलाव को स्वीकार कर लिया है और, इसका मतलब यह भी है कि ईरान की मोल-भाव करने की स्थिति मजबूत हो गई है.

आर्टिकल 5 रहा समझौते में दरार का कारण

दरअसल, इस समझौते में असली विवाद इस बात पर है कि हर पक्ष का क्या मानना ​​था कि 60 दिन की अवधि का मकसद क्या था और लंबे समय में राजनीतिक स्थिति क्या होनी चाहिए. जानकारों का कहना है कि भले ही सैन्य तनाव फिर से बढ़ गया, ईरान ने ओमान की मध्यस्थता के जरिए बातचीत जारी रखी और साथ ही कूटनीति के साथ-साथ नौसेना का नपा-तुला दबाव भी बनाए रखा.

बिना शुल्क के गुजरना लेकिन कोई साझा समझ नहीं

एक और विवादित पहलू कमर्शियल शिपिंग के लिए ट्रांजिट शुल्क को कुछ समय के लिए रोकना भी इस शांति समझौते के लिए खतरा साबित हुआ. जानकारी करते हैं कि इस प्रावधान का आर्थिक महत्व कम है, लेकिन राजनीतिक महत्व बहुत ज्यादा है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि तेहरान इसे इस बात की मंज़ूरी मानता है कि टकराव से पहले की स्थिति में वापस नहीं लौटा जा सकता. ईरान की नजर में, होर्मुज जलडमरूमध्य का प्रबंधन पहले ही फिर से बातचीत की प्रक्रिया में आ चुका है, और अमेरिका ने इस अस्थायी व्यवस्था पर सहमत होकर परोक्ष रूप से इस सच्चाई को स्वीकार कर लिया है.

क्या है वाशिंगटन का समझौते को लेकर तर्क

वहीं वॉशिंगटन का तर्क है कि यह प्रावधान बातचीत को आसान बनाने के लिए एक अस्थायी विश्वास-बढ़ाने वाला उपाय है, न कि ईरान के दबदबे या जलडमरूमध्य में मौलिक रूप से बदले हुए कानूनी या राजनीतिक ढांचे की स्वीकृति. इसलिए, मुख्य असहमति बातचीत के होने को लेकर नहीं है, बल्कि उस शुरुआती बिंदु को लेकर है जहां से बातचीत आगे बढ़नी चाहिए. ईरान का मानना ​​है कि वह बेहतर स्थिति से बातचीत कर रहा है, जबकि अमेरिका ईरान को क्षेत्रीय प्रक्रिया में भाग लेने वाले कई समान तटीय देशों में से एक के रूप में देखता है.

होर्मुज पर अपना अधिकारी चाहता है ईरान

तेहरान पॉलिटेक्निक यूनिवर्सिटी में पब्लिक पॉलिसी और गवर्नेंस के असिस्टेंट प्रोफेसर सैयद एमामियन ने तर्क दिया कि समझौता ईरान को स्थायी शासन ढांचे पर बातचीत करने के लिए बाध्य नहीं करता है. उन्होंने कहा, "ईरानी केवल इन 60 दिनों के भीतर कोई सेवा शुल्क न लेने के लिए प्रतिबद्ध रहे हैं. हम देख सकते हैं कि टेक्स्ट में ‘केवल’ (only) शब्द का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है."

उन्होंने कहा कि ईरान स्थायी समझौते पर बातचीत करने के बजाय जलडमरूमध्य में अपनी व्यवस्था बनाए रखने का इरादा रखता है. बता दें कि दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर शिपिंग की सुरक्षा के लिए 20 प्रतिशत शुल्क लगाने का प्रस्ताव दिया था. हालांकि उन्होंने अपने इस प्रस्ताव को अगले ही दिन वापस भी ले लिया.

सुरक्षा और ओमान की मध्यस्थता

आर्टिकल 5 के तहत ईरान को तकनीकी और सैन्य बाधाओं को हटाना होगा और 30 दिनों के भीतर माइन हटाने (डीमाइनिंग) का काम करना होगा. वहीं अमेरिकी नौसेना ने जलडमरूमध्य से डिस्ट्रॉयर तैनात किए थे जो माइन-काउंटरमेजर ऑपरेशन की तैयारियों में मदद कर सकते थे, लेकिन ऐसा कोई संकेत नहीं है कि बाद में माइन हटाने का कोई समन्वित प्रयास किया गया.