August 13, 2026

Explainer: केरल से ‘केरलम’ होगा नाम? लोकसभा से पास हुआ बिल, जानिए नाम बदलने की पूरी कहानी

Explainer: केरल के नाम को लेकर अब एक बड़ा संवैधानिक बदलाव सामने आया है. लोकसभा ने 11 अगस्त 2026 को विपक्ष के विरोध के बीच ‘केरल (नाम में बदलाव) बिल, 2026’ को ध्वनि मत से मंजूरी दे दी.  इस विधेयक का उद्देश्य संविधान और आधिकारिक दस्तावेजों में राज्य का नाम ‘केरल’ से बदलकर ‘केरलम’ करना है. 

हालांकि, लोकसभा से पारित होने के बाद भी नाम बदलने की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है. इसमें अभी और भी कदम उठाए जाने हैं. दरअसल  बिल को अभी राज्यसभा से मंजूरी मिलनी है और इसके बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने पर ही यह संवैधानिक बदलाव प्रभावी हो सकेगा.  लेकिन इन सबके बीच आखिर केरल अपना नाम ‘केरलम’ क्यों करवाना चाहता है? इस नाम का इतिहास क्या है और किसी राज्य का नाम बदलने की संवैधानिक प्रक्रिया कैसी होती है? आइए इसे विस्तार से समझते हैं. 

‘केरल’ की जगह ‘केरलम’ क्यों?

केरल विधानसभा का तर्क है कि मलयालम भाषा में राज्य का पारंपरिक नाम ‘केरलम’ है, जबकि अंग्रेजी भाषा और भारतीय संविधान की पहली अनुसूची में इसका नाम ‘केरल’ दर्ज है. इसी अंतर को खत्म करने के उद्देश्य से राज्य विधानसभा ने केंद्र से नाम बदलने की मांग की. 

अगस्त 2023 में विधानसभा ने इस संबंध में प्रस्ताव पारित किया था. इसके बाद जून 2024 में एक बार फिर सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार से संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत राज्य का नाम ‘केरलम’ करने की प्रक्रिया शुरू करने का अनुरोध किया गया. इस तरह राज्य की ओर से नाम परिवर्तन को लेकर यह दूसरी औपचारिक पहल थी।

केंद्र सरकार ने कब दी मंजूरी?

केरल विधानसभा के प्रस्ताव के बाद नाम बदलने की प्रक्रिया केंद्र तक पहुंची. फरवरी 2026 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राज्य का नाम बदलने के प्रस्ताव को मंजूरी दी. इसके बाद संवैधानिक प्रक्रिया के तहत प्रस्तावित विधेयक को केरल विधानसभा के पास भेजा गया, ताकि राज्य को इस विषय पर अपनी राय रखने का अवसर मिल सके. विधानसभा ने प्रस्ताव का समर्थन किया.

इसके बाद 10 अगस्त 2026 को लोकसभा में विधेयक पेश किया गया, जबकि अगले दिन यानी 11 अगस्त को इसे ध्वनि मत से पारित कर दिया गया. अब यह मामला संसद के अगले चरण में पहुंचेगा.

‘केरलम’ शब्द कितना पुराना है?

‘केरलम’ कोई नया नाम नहीं है. इसके पीछे दक्षिण भारत के लंबे इतिहास और भाषाई परंपरा का संबंध बताया जाता है. हालांकि केरलम की उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग ऐतिहासिक और भाषाई मत हैं. इसका एक महत्वपूर्ण प्राचीन उल्लेख सम्राट अशोक के शिलालेख II से जोड़ा जाता है, जिसकी तारीख लगभग 257 ईसा पूर्व मानी जाती है.

इस शिलालेख में चोल, पांड्य, सत्यपुत्र और केरलपुत्र जैसे नामों का उल्लेख मिलता है. ‘केरलपुत्र’ का संबंध प्राचीन चेर राजवंश से माना जाता है, जो दक्षिण भारत की प्रमुख राजनीतिक शक्तियों में से एक था. हालांकि ‘केरल’ या ‘केरलम’ शब्द की सटीक उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों और भाषाविदों के बीच अलग-अलग व्याख्याएं मिलती हैं.

नाम की उत्पत्ति को लेकर क्या हैं मत?

जर्मन मिशनरी और भाषा विशेषज्ञ हरमन गुंडर्ट ने मलयालम भाषा पर महत्वपूर्ण काम किया था. शुरुआती मलयालम-अंग्रेजी शब्दकोश तैयार करने वाले गुंडर्ट ने ‘केरम’ और ‘चेरम’ जैसे शब्दों के बीच संबंध की ओर भी संकेत किया था.

एक अन्य भाषाई मत के अनुसार ‘केरलम’ का संबंध पुराने तमिल शब्दों से हो सकता है. इसमें ‘चेर’ का अर्थ जुड़ने और ‘अलम’ का अर्थ क्षेत्र या भूमि से जोड़ा जाता है.  हालांकि इस पर भी एकमत नहीं है. यही कारण है कि ‘केरलम’ नाम की उत्पत्ति को एक ही सिद्धांत से जोड़ना ठीक नहीं होगा।

आधुनिक केरल राज्य कब अस्तित्व में आया?

केरल भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के दौरान अस्तित्व में आया. आजादी से पहले मलयालम भाषी आबादी अलग-अलग प्रशासनिक और राजनीतिक क्षेत्रों में रहती थी. इनमें त्रावणकोर, कोचीन और मद्रास प्रेसीडेंसी का मालाबार क्षेत्र प्रमुख थे.

मलयालम भाषी क्षेत्रों को एक प्रशासनिक इकाई में शामिल करने की मांग ने 20वीं सदी के शुरुआती दशकों में जोर पकड़ा. 1920 के दशक में ‘ऐक्य केरल’ यानी संयुक्त केरल आंदोलन ने इस मांग को राजनीतिक रूप से मजबूत किया.

1949 में त्रावणकोर और कोचीन को मिलाकर त्रावणकोर-कोचीन राज्य बनाया गया. इसके बाद भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ी.

1 नवंबर 1956 को बना केरल

बता दें कि राज्यों के पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के आधार पर 1 नवंबर 1956 को आधुनिक केरल राज्य का गठन हुआ. नए राज्य में मालाबार क्षेत्र और कासरगोड तालुक को शामिल किया गया. वहीं त्रावणकोर के कुछ दक्षिणी क्षेत्रों को अलग कर तमिलनाडु में शामिल किया गया.

मलयालम भाषा में राज्य को ‘केरलम’ कहा जाता रहा, लेकिन अंग्रेजी में इसका आधिकारिक नाम ‘Kerala’ बना रहा. संविधान की पहली अनुसूची में भी ‘Kerala’ ही दर्ज है. अब प्रस्तावित बदलाव इसी अंतर को समाप्त करने की कोशिश है.

राज्य का नाम बदलने का अधिकार किसके पास है?

किसी राज्य का नाम बदलना सामान्य प्रशासनिक फैसला नहीं है. इसके लिए संविधान में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 3 संसद को राज्यों के गठन, क्षेत्र में बदलाव, सीमाओं में परिवर्तन और नाम बदलने की शक्ति देता है.

हालांकि संसद में ऐसा विधेयक सीधे किसी सांसद की ओर से सामान्य तरीके से पेश नहीं किया जा सकता. इसके लिए राष्ट्रपति की सिफारिश आवश्यक होती है.

अगर विधेयक किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम को प्रभावित करता है, तो राष्ट्रपति उसे संबंधित राज्य की विधानसभा के पास उसकी राय जानने के लिए भेजते हैं.

क्या राज्य विधानसभा की मंजूरी जरूरी है?

यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है. राज्य विधानसभा को अपनी राय देने का अवसर दिया जाता है, लेकिन उसकी राय संसद के लिए बाध्यकारी नहीं होती. यानी किसी राज्य की विधानसभा प्रस्ताव का विरोध भी कर सकती है, फिर भी संवैधानिक प्रक्रिया के तहत संसद अंतिम निर्णय ले सकती है.

केरल के मामले में विधानसभा ने प्रस्तावित नाम परिवर्तन का समर्थन किया है. इसलिए इस मामले में राज्य और केंद्र के बीच नाम परिवर्तन को लेकर सहमति का पक्ष दिखाई देता है.

अभी ‘केरलम’ नाम आधिकारिक क्यों नहीं हुआ?

लोकसभा से बिल पारित होना प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण है, लेकिन यह अंतिम चरण नहीं है. अब विधेयक को राज्यसभा से पारित होना होगा. इसके बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा. राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद ही यह कानून का रूप लेगा और संवैधानिक रिकॉर्ड में आवश्यक बदलाव किए जा सकेंगे.

इसलिए फिलहाल आधिकारिक रूप से राज्य का नाम ‘केरल’ ही है. ‘केरलम’ को संवैधानिक नाम बनने के लिए पूरी विधायी प्रक्रिया पूरी होना बाकी है.

नाम बदलने के बाद क्या-क्या बदलेगा?

अगर विधेयक कानून बन जाता है, तो संविधान की पहली अनुसूची समेत केंद्र और राज्य सरकार के आधिकारिक रिकॉर्ड में आवश्यक संशोधन किए जाएंगे. इसके अलावा सरकारी दस्तावेजों, विभागीय रिकॉर्ड, आधिकारिक संचार और अन्य संवैधानिक संदर्भों में ‘Kerala’ की जगह ‘Keralam’ का इस्तेमाल किया जा सकता है.

हालांकि इसका मतलब यह नहीं होगा कि राज्य की सीमाएं, प्रशासनिक ढांचा या राजधानी बदल जाएगी. बदलाव मुख्य रूप से राज्य के आधिकारिक नाम से संबंधित होगा.

सिर्फ नाम नहीं, भाषा और पहचान का सवाल

केरल को ‘केरलम’ नाम देने की मांग केवल शब्दों का बदलाव नहीं है. इसके पीछे भाषा, इतिहास और सांस्कृतिक पहचान का तर्क भी जुड़ा हुआ है. राज्य सरकार और विधानसभा का मानना है कि जिस नाम का इस्तेमाल मलयालम में लंबे समय से होता रहा है, उसे संविधान और आधिकारिक अंग्रेजी रिकॉर्ड में भी मान्यता मिलनी चाहिए.

यदि संसद की पूरी प्रक्रिया और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह बदलाव लागू होता है, तो केरल उन राज्यों की सूची में शामिल हो जाएगा जिनके आधिकारिक नाम समय के साथ बदले गए हैं.

फिलहाल सबसे अहम पड़ाव राज्यसभा में विधेयक का पारित होना और उसके बाद राष्ट्रपति की मंजूरी है. इन दोनों चरणों के पूरा होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि भारत के संवैधानिक नक्शे और आधिकारिक दस्तावेजों में ‘Kerala’ की जगह ‘Keralam’ दर्ज होता है या नहीं.

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