July 13, 2026

Explained: क्या है जम्मू-कश्मीर का विवादित शहीदी दिवस? 13 जुलाई 1931 को क्या हुआ था? जानें पूरी कहानी

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1931 से 2019 तक, 13 जुलाई जम्मू और कश्मीर में एक आधिकारिक सार्वजनिक अवकाश था। हालांकि, अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 को रद्द करने के बाद उपराज्यपाल के प्रशासन ने इस दिन को आधिकारिक छुट्टियों की सूची से हटा दिया।

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जम्मू-कश्मीर शहीद दिवस का विवाद समझें (PTI/ANI)

What is Nakshband Martyrs Day: 13 जुलाई को जम्मू-कश्मीर में विवादित नक्शबंद शहीदी दिवस मनाया जाता है। हर साल की तरह इस बार भी इसे लेकर भारी सियासी विवाद है। केंद्र की एनडीए सरकार ने इसे 2019 में ही आधिकारिक सरकारी अवकाश सूची से बाहर कर दिया था। इसके बावजूद लोग खासकर सियासतदां इसे मनाने की कोशिश करते हुए नक्शबंद कब्रिस्तान पहुंचते हैं और इसे लेकर भारी विवाद पैदा होता है। इसके मद्देनजर इस बार पुलिस प्रशासन पूरी तरह अलर्ट है। उपराज्यपाल प्रशासन ने सोमवार को श्रीनगर के कई इलाकों में प्रतिबंध लगा दिए ताकि लोग शहर के नक्शबंद साहिब इलाके में स्थित शहीदों के कब्रिस्तान पर इकट्ठा न हो सकें। कब्रिस्तान के एक किलोमीटर के दायरे को सील कर दिया गया है, वहीं पुराने शहर और सिविल लाइंस इलाके के कुछ हिस्सों में एहतियाती तौर पर बैरिकेड्स लगा दिए गए। आखिर क्या है हुआ था 13 जुलाई 1931 को और इसे लेकर क्या है सियासी विवाद और इतिहास, विस्तार से जानते हैं।

13 जुलाई 1931 का वो दिन

शहीद दिवस ब्रिटिश भारत के दौरान डोगरा शासन द्वारा 13 जुलाई 1931 को मारे गए 22 कश्मीरी मुस्लिम प्रदर्शनकारियों की याद में मनाया जाता है। 13 जुलाई 1931 को श्रीनगर की केंद्रीय जेल के बाहर भारी भीड़ जमा हो गई, जहां अब्दुल कादिर का मुकदमा चल रहा था। कादिर पर डोगरा शासक महाराजा हरि सिंह के विरुद्ध भड़काऊ भाषण देने का आरोप था। दोपहर की नमाज (ज़ुहर) का समय होते ही प्रदर्शनकारियों ने अजान देना शुरू कर दिया। प्रदर्शनकारी महाराजा हरि सिंह के विरुद्ध विद्रोह भड़काने के आरोप में गिरफ्तार अब्दुल कादिर खान की रिहाई की मांग करते हुए श्रीनगर की केंद्रीय जेल के बाहर एकत्रित हुए थे। भीड़ बढ़ने पर डोगरा सैनिकों ने गोलीबारी शुरू कर दी, जिसमें 22 लोग मारे गए। शवों को श्रीनगर में मुस्लिम संत ख्वाजा बहाउद्दीन नक्शबंदी के दरगाह में दफनाया गया। यह स्थल मजार-ए-शुहदा या शहीदों के कब्रिस्तान के नाम से जाना जाने लगा। तब से यह दिन प्रतिरोध और संघर्ष के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। इस दिन लोग शहीदों को श्रद्धांजलि देने क्रबिस्तान पहुंचती है।

अब्दुल कादिर खान कौन थे?

अब्दुल कादिर खान के मूल के बारे में सीमित दस्तावेज उपलब्ध हैं, लेकिन व्यापक रूप से माना जाता है कि उन्होंने पेशावर में एक ब्रिटिश अधिकारी, मेजर बट के लिए काम किया था। कश्मीर में कादिर खान ने डोगरा शासन के खिलाफ तीखे भाषण दिए, जिसके कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर राजद्रोह और दंगा भड़काने के इरादे से उकसाने का आरोप लगाया गया था। उनकी गिरफ्तारी और मुकदमे ने व्यापक विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया, जो 13 जुलाई की 22 हत्याओं में परिणत हुए।

13 जुलाई की सरकारी छुट्टी हुई रद्द

1931 से 2019 तक, 13 जुलाई जम्मू और कश्मीर में एक आधिकारिक सार्वजनिक अवकाश था। हालांकि, अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 को रद्द करने के बाद उपराज्यपाल के प्रशासन ने इस दिन को आधिकारिक छुट्टियों की सूची से हटा दिया। तभी से यह विवाद का मुद्दा बन गया। इसे लेकर सियासत भी शुरू हुई और कश्मीरी नेता इस दिवस को मनाने पर अड़े रहे। साल 2025 में कड़ी सुरक्षा के बावजूद सीएम उमर अब्दुल्ला दीवार फांदकर नक्शबंदी कब्रिस्तान पहुंचे और फातिहा पढ़ने लगे। तब इस मामले में खूब सुर्खियां बटोरी थी कि किस तरह एक मुख्यमंत्री ने दीवार फांदकर रस्म को पूरा करने की कोशिश की थी। अब्दुल्ला ने बाद में टिप्पणी की- 'नई दिल्ली के गैर-चुने हुए उम्मीदवारों ने जम्मू-कश्मीर के निर्वाचित नेताओं को कैद कर लिया है।'

कहीं समर्थन तो कहीं विरोध

कई लोगों ने इस कदम को कश्मीर के इतिहास को एक नया रूप देने की कोशिश के रूप में देखा। जहां कश्मीरी मुसलमान 13 जुलाई को स्मरण दिवस के रूप में मनाते हैं, वहीं कुछ कश्मीरी पंडित समूह इसे ऐतिहासिक रूप से 'काला दिवस' के रूप में मनाते आए हैं। केंद्र शासित प्रदेश में सत्ता में मौजूद नेशनल कॉन्फ्रेंस जैसी क्षेत्रीय पार्टियां 13 जुलाई को अवकाश की बहाली और सार्वजनिक समारोहों की अनुमति की मांग करती रही हैं।

भारत सरकार ने यह कदम क्यों उठाया?

अनुच्छेद 370 को समाप्त करने के बाद, भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर में आधिकारिक छुट्टियों की सूची से शहीद दिवस को हटा दिया। इसके बजाय, उसने दो नई छुट्टियां घोषित कीं। 23 सितंबर - महाराजा हरि सिंह का जन्मदिन। 26 अक्टूबर - वह दिन जब महाराजा हरि सिंह ने 1947 में विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए, जिससे जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा बन गया। 2019 से 13 जुलाई जम्मू-कश्मीर में आधिकारिक छुट्टी नहीं है।

क्या है विलय पत्र जिससे जम्मू-कश्मीर बना भारत का हिस्सा?

1947 में जब भारत को स्वतंत्रता मिली, तो लगभग 580 रियासतों को भारत या पाकिस्तान में शामिल होने या स्वतंत्र रहने में से किसी एक को चुनना था। भारत में शामिल होने का निर्णय विलय पत्र पर हस्ताक्षर करके औपचारिक रूप दिया गया था। महाराजा हरि सिंह शुरू में चाहते थे कि जम्मू-कश्मीर तटस्थ रहे और उन्होंने दोनों देशों के साथ यथास्थिति समझौते पर हस्ताक्षर किए। हालांकि, पाकिस्तान समर्थित कबायली आतंकियों के आक्रमण के बाद, उन्होंने भारत से सैन्य सहायता मांगी। भारत इस शर्त पर सहमत हुआ कि जम्मू-कश्मीर भारतीय संघ में शामिल हो जाए। महाराजा ने 26 अक्टूबर, 1947 को विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए।