राजस्थान में पंचायत चुनावों से ठीक पहले आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर सियासी केंद्र में आ गया है। शिव विधानसभा सीट से निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने केंद्र सरकार के EWS (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) आरक्षण के कड़े नियमों के खिलाफ सीधा मोर्चा खोल दिय
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पंचायत राज चुनावों से ठीक पहले उनका यह कदम पूरे प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है। आखिर रविंद्र सिंह भाटी EWS आरक्षण की किन शर्तों में रियायत चाहते हैं, इस यात्रा से राजस्थान में क्या सियासी समीकरण बदलेंगे और इस पूरे दांव का क्या होगा असर, यही जानेंगे आज के राजस्थान एक्सप्लेनर में…
सवाल-1: EWS आरक्षण के मौजूदा नियमों में रविंद्र सिंह भाटी क्या बदलाव चाहते हैं?
जवाब : केंद्र सरकार ने 103वें संविधान संशोधन अधिनियम के जरिए 14 जनवरी 2019 को EWS आरक्षण की शुरुआत की थी। जिसका मुख्य उद्देश्य सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़े परिवारों को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 10% आरक्षण देना था।
इस आरक्षण के दायरे में वो परिवार थे- जिनकी कुल सालाना आय 8 लाख रुपए से कम, 5 एकड़ से कम कृषि भूमि, 1000 वर्ग फीट से कम का आवासीय मकान या अधिसूचित नगरपालिकाओं में 100 गज से कम का प्लॉट हो। फरवरी 2019 में इस आरक्षण को राज्य में भी लागू कर दिया था। लेकिन कठिन शर्तों के चलते सर्टिफिकेट बनवाने में इस वर्ग से जुड़े युवाओं को कई दिक्कतें आ रही थीं।
ऐसे में तत्कालीन राज्य सरकार ने 20 अक्टूबर को भूमि और भवन संबंधी सभी शर्तें हटाते हुए नोटिफिकेशन जारी कर दिया था। EWS प्रमाण पत्र के लिए केवल 8 लाख की वार्षिक आय सीमा को ही आधार मानने का ऐलान कर दिया था।
अब रविंद्र सिंह भाटी की आपत्तियां और मांग क्या हैं
- सबसे बड़ी आपत्ति केंद्र सरकार के EWS की पात्रता के तहत आर्थिक रूप से पिछड़े सामान्य वर्ग के काश्तकारों की जमीन से जुड़े मापदंड को लेकर है। उनका कहना है कि देश के हर राज्य की भौगोलिक परिस्थिति, जमीन की उत्पादकता, सिंचाई व्यवस्था और बाजार मूल्य अलग-अलग होते हैं।
- पश्चिमी राजस्थान के मरुस्थलीय इलाकों में 5 एकड़ सूखी या बंजर जमीन की कीमत और पैदावार पंजाब या हरियाणा की सिंचित जमीन से बेहद कम होती है। इसलिए केवल जमीन के आकार के आधार पर किसी को अयोग्य ठहराना अनुचित है। इसके बजाय जमीन की असल उपयोगिता, स्थानीय कीमत और फसल पैदावार को भी मापदंड में शामिल किया जाना चाहिए।
- राज्य सरकार की ओर से जारी EWS प्रमाण पत्र को केंद्र सरकार की नौकरियों और केंद्रीय संस्थानों में भी सीधे मान्य किया जाए। ताकि युवाओं को दोहरी कागजी कार्रवाई न करनी पड़े।
- अपनी मांग को साबित करने के लिए उन्होंने आंकड़े दिए कि साल 2022-23 में राजस्थान सरकार ने जहां 2,77,555 EWS प्रमाण पत्र जारी किए। वहीं केंद्र के कड़े मानकों की वजह से सिर्फ 95,243 प्रमाण पत्र ही बन पाए। यह बड़ा अंतर साफ दिखाता है कि नियमों में सरलीकरण की कितनी सख्त जरूरत है।

इसके अलावा, भाटी की मांग है कि EWS सर्टिफिकेट की वैधता अवधि को मौजूदा 1 वर्ष से बढ़ाकर 3 से 5 वर्ष किया जाए। हर साल दफ्तरों के चक्कर काटने के बजाय केवल एक शपथ-पत्र के जरिए इसका नवीनीकरण हो।
आय के आकलन में शादीशुदा महिलाओं के लिए मायके और ससुराल दोनों के दस्तावेज मांगने की जटिलता को खत्म करने, EWS छात्रों को स्कॉलरशिप व हॉस्टल सुविधाएं देने और राष्ट्रीय स्तर पर EWS आयोग के गठन पर भी विचार करना भी उनकी प्रमुख मांगों में शामिल है।
सवाल-2: भाटी की सड़क पर उतरने की रणनीति क्या है और इस यात्रा का रोडमैप क्या है?
जवाब : रविंद्र सिंह भाटी अब इस मुद्दे को सीधे जनता और युवाओं के बीच ले जाना चाहते हैं। इसे लेकर ‘सरलीकरण - EWS आरक्षण की विकृतियों के समाधान का अभियान’ नाम से उनकी राज्यव्यापी जन चेतना यात्रा बाड़मेर शहर के आलोक आश्रम से शुरू कर चुके हैं। पिछले दिनों जयपुर में उन्होंने साफ कहा था कि जब तक सरकारें जमीनी हकीकत को समझकर नियमों में बदलाव नहीं करेंगी, तब तक युवाओं की आवाज को सड़क पर ही बुलंद करना पड़ेगा।

सवाल-3: EWS आरक्षण का लाभ उठाने में युवाओं के सामने इस वक्त सबसे बड़ी रुकावट क्या है?
जवाब: वर्तमान में EWS आरक्षण का फायदा मिलने में सबसे बड़ी अड़चन केंद्र और राज्य सरकार के अलग-अलग नियम हैं। राज्य सरकार जिन मानकों पर EWS प्रमाण पत्र जारी करती है, केंद्र सरकार उन्हें स्वीकार नहीं करती। इसके चलते एक ही अभ्यर्थी को राज्य और केंद्र की भर्तियों के लिए अलग-अलग कागजी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है, जिसकी वजह से लाखों पात्र अभ्यर्थी केंद्रीय भर्तियों और शिक्षण संस्थानों से बाहर हो जाते हैं।
दूसरी बड़ी व्यावहारिक समस्या प्रमाण पत्र की केवल एक साल की वैधता अवधि है। हर साल नए सिरे से पटवारी, तहसीलदार और नोटेरी के चक्कर काटना विशेष रूप से ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं के लिए समय और पैसे दोनों की बर्बादी साबित होता है। इसके साथ ही खेती की जमीन का मूल्यांकन करने में स्थानीय परिस्थितियों को नजरअंदाज किया जाना भी एक बड़ा रोड़ा है।
उदाहरण के लिए- यदि किसी परिवार के पास गांव में 6 एकड़ कम उपजाऊ जमीन है जिसकी बाजार में कोई खास कीमत नहीं है, तब भी कागजों में संपत्ति का आकार देखकर उन्हें EWS से बाहर कर दिया जाता है।
भाटी का दावा है कि इस मुद्दे पर 550 से अधिक भाजपा पदाधिकारियों और अन्य संगठनों से जुड़े लोगों ने राज्य सरकार से लिखित में आग्रह किया है कि राज्य सरकार को केंद्र सरकार से बातचीत करते हुए नियमों में सरलीकरण की मांग को प्रमुखता से रखा जाना चाहिए। कई विधायकों और सांसदों ने भी सहमति पत्र भी दिए हैं।

सवाल-4: EWS के बहाने भाटी का अगला राजनीतिक मैदान कितना बड़ा है?
जवाब: छात्र राजनीति और जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय (JNVU) के छात्रसंघ अध्यक्ष पद से अपनी पहचान बनाने वाले रविंद्र सिंह भाटी ने जिस तरह शिव विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनाव जीता। उससे यह साफ है कि उनकी राजनीतिक पकड़ युवाओं के बीच बेहद मजबूत है।
वरिष्ठ पत्रकार महेश शर्मा बताते हैं कि EWS आरक्षण का मुद्दा किसी एक जाति या केवल पश्चिमी राजस्थान तक सीमित नहीं है। यह पूरे राजस्थान के राजपूत, ब्राह्मण, वैश्य और अन्य सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं से सीधे जुड़ा एक बेहद संवेदनशील विषय है।
क्या यह मुद्दा भाटी को पूरे राजस्थान में बड़ा युवा चेहरा बनाने में कामयाब होगा, यह अभी तय नहीं है। फिलहाल इतना कहा जा सकता है कि उन्होंने अपने क्षेत्रीय राजनीतिक आधार से बाहर निकलकर एक ऐसे मुद्दे को प्रदेशव्यापी बनाने की कोशिश शुरू की है, जिसका दायरा पश्चिमी राजस्थान से बड़ा है।
तथ्यों, सरकारी आंकड़ों और कानूनी बारीकियों के साथ इस लड़ाई को लड़ने का भाटी का अंदाज यह दिखाता है कि यह केवल एक तात्कालिक चुनावी स्टंट नहीं, बल्कि सोच-समझकर बनाई गई एक दूरगामी रणनीति है।