Dussehra Tradition: इस साल दशहरा यानी विजयदशमी का पर्व 20 अक्टूबर 2026 को मनाया जाएगा. ये त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, जो हर साल आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है. इस दिन देशभर में रावण के पुतले जलाए जाते हैं. आपने दशहरा से जुड़ी तमाम तरह की पौराणिक कथाएं और इसे मनाने के अलग-अलग तरीकों के बारे सुना होगा. दशहरा पर कहीं रावण को नहीं जलाया जाता है तो कहीं इस दिन रावण की पूजा की जाती है. लेकिन क्या आपको पता है कि एक जगह ऐसी भी है दशहरा पर रावण दहन करने के बाद बकायदा शोक सभा आयोजित की जाती है? इतना ही नहीं, शोक सभा के साथ ही रावण की प्रतिकात्मक अस्थियों का विसर्जन भी किया जाता है. आइए जानते हैं ये परंपरा कहां और क्यों निभाई जाती है.
दशहरे पर देशभर में रावण दहन किया जाता है, लेकिन राजस्थान के जयपुर में इससे जुड़ी एक अनोखी परंपरा देखने को मिलती है. राजस्थान के जयपुर (प्रताप नगर) में दशहरा मेला समिति और स्थानीय समुदायों में रावण दहन के बाद उसकी शोक सभा यानी ‘तीये की बैठक’ की जाती है. साथ ही, प्रतीकात्मक अस्थियों का विसर्जन करने के साथ ब्रह्मभोज और पगड़ी की रस्म भी निभाई जाती है.
राजस्थान की अनोखी परंपरा
राजस्थान के जयपुर (प्रताप नगर, सांगानेर) में विजयादशमी के बाद एक बेहद अनोखी और अद्भुत परंपरा निभाई जाती है. यहां रावण दहन को केवल एक पुतला जलाना नहीं माना जाता, बल्कि रावण के पुतले के दहन के बाद एक आम इंसान की मृत्यु की तरह उसकी सभी अंतिम क्रियाएं विधि-विधान से पूरी की जाती हैं.
रावण दहन और अस्थि संचय: दशहरे के दिन रावण का दहन किया जाता है. इसके बाद अगले दिन आयोजन समिति और स्थानीय लोग रावण के दहन स्थल से प्रतीकात्मक रूप से उसकी अस्थियां (राख) एकत्रित करते हैं.
तीये की बैठक (शोक सभा): रावण दहन के तीसरे दिन बकायदा ‘तीये की बैठक’ यानी शोक सभा बुलाई जाती है. इस बैठक में स्थानीय व्यापार मंडल के लोग और नागरिक शामिल होते हैं, जहां रावण के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उसे श्रद्धांजलि दी जाती है.
अस्थि विसर्जन: रावण की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए एकत्रित की गई अस्थियों (राख) को विसर्जित करने के लिए एक विशेष दल को हरिद्वार या नेपाल की पवित्र नदियों में भेजा जाता है.
पगड़ी की रस्म और ब्रह्मभोज: रावण की मृत्यु के 12वें दिन आम मान्यताओं की तरह ही पगड़ी दस्तूर की रस्म निभाई जाती है और पंडितों व समाज के लोगों के लिए ब्रह्मभोज (मृत्युभोज) का बड़ा आयोजन किया जाता है ताकि रावण को पूर्ण मोक्ष मिल सके.
जोधपुर में भी है शोक की परंपरा
जयपुर के अलावा राजस्थान के जोधपुर में भी रावण से जुड़ी एक अलग परंपरा है. वहाँ रहने वाले श्रीमाली गोधा ब्राह्मण समाज के लोग खुद को रावण का वंशज और जोधपुर को रावण का ससुराल (मंदोदरी का पीहर) मानते हैं. इसलिए वे लोग रावण दहन नहीं देखते और दशहरे के दिन शोक मनाते हैं तथा रावण दहन के धुएं को देखकर स्नान करके अपनी जनेऊ बदलते हैं.
Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है. टीवी9 भारतवर्ष इसकी पुष्टि नहीं करता है.

सना चौधरी
सना यूपी के गाजियाबाद की रहने वाली हैं. सना ने हाईटेक इंस्टीट्यूट से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की है. पढ़ाई के साथ-साथ कंटेंट ऑप्टिमाईजेशन और वीडियो एडिटिंग भी सीखा है. जिसके बाद सना ने अलग-अलग जगहों पर डिजिटल कॉन्टेंट राइटर और वीडियो एडिटर के तौर पर काम किया. इससे पहले सना Zee मीडिया में बतौर वीडियो और कंटेंट एडिटर काम कर चुकी हैं. उन्होंने जी न्यूज में सोशल मीडिया पेज मैनेज किया है. Zee के बाद सना ने टीवी9 भारतवर्ष की वेबसाइट TV9hindi.com में बतौर ट्रेनी ज्वाइन किया. सना को न्यूज़ एंकरिंग का भी शौक है.
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