आजतक की सुरक्षा सभा में पूर्व डीआरडीओ चेयरमैन जी सतीश रेड्डी ने भविष्य की युद्धनीति पर विस्तार से बात की. उन्होंने साफ कहा कि बड़े प्लेटफॉर्म जैसे एयरक्राफ्ट, सबमरीन, डिस्ट्रॉयर और टैंक अब भी जरूरी रहेंगे. लेकिन एसिमेट्रिक और टैक्टिकल वारफेयर में लो-कॉस्ट ऑटोनॉमस सिस्टम का रोल बहुत बढ़ गया है. दोनों को मिलाकर ही आगे बढ़ना होगा. यह वर्तमान ट्रेंड है.
पारंपरिक युद्ध और नवीनतम कम लागत वाली स्वायत्त तकनीक साथ-साथ चल रहे हैं. यूक्रेन और अन्य संघर्षों से सबक लेते हुए भारत को दोनों क्षमताओं को विकसित करना होगा. बड़े प्लेटफॉर्म रणनीतिक गहराई देते हैं जबकि ड्रोन, ऑटोनॉमस सिस्टम और लो-कॉस्ट समाधान तेजी से प्रतिक्रिया और बड़े पैमाने पर तैनाती की सुविधा देते हैं. इस संतुलन से ही भविष्य के युद्ध में बढ़त हासिल की जा सकती है.
इंडस्ट्रियल पार्टनरशिप में क्रांतिकारी बदलाव
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पूर्व चेयरमैन ने याद दिलाया कि उनके कार्यकाल में इंडस्ट्रियल पार्टनरशिप पर विशेष फोकस था. अब स्थिति और मजबूत हो गई है. पहले डीआरडीओ अकेले डिजाइन और विकास करता था, ट्रायल्स होते थे, फिर इंडस्ट्री को प्रौद्योगिकी हस्तांतरण होता था. अब डेवलपमेंट-कम-प्रोडक्शन पार्टनर यानी डीसीपीपी कॉन्सेप्ट आ गया है. डिजाइन और विकास के चरण से ही इंडस्ट्री पार्टनर बन जाती है.
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इससे समय बहुत कम हो गया है. पहले मिसाइल या सिस्टम बनाने में दस-बारह साल लगते थे, अब चार साल में तैयार हो रहे हैं. देश में दो हजार से ज्यादा रक्षा उद्योग हैं. टियर-वन और टियर-टू कंपनियां खुद सिस्टम डिजाइन और विकसित कर रही हैं. प्राइवेट इंडस्ट्रीज बारह-तेरह मिसाइलें बना रही हैं. एलसीए, लाइटवेट टैंक और अन्य क्रिटिकल सिस्टम प्राइवेट क्षेत्र में बनने लगे हैं. यह बदलाव आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम है.
डीआरडीओ ने सेंटर ऑफ एक्सलेंस की अवधारणा लाई है. हर सेंटर में अकादमिक संस्थान, इंडस्ट्री और DRDO तीनों मिलकर काम करते हैं. दिल्ली आईआईटी में बुलेटप्रूफ जैकेट का उदाहरण दिया गया. रिसर्च के समय ही इंडस्ट्री शामिल हो गई और उत्पादन शुरू हो गया. यह इंटीग्रेशन पिछले दस साल में रक्षा उद्योग इकोसिस्टम को बहुत आगे ले गया है. भारत अब ग्लोबल सप्लाई चेन में महत्वपूर्ण स्थान बना चुका है.
रक्षा निर्यात पिछले साल 23,666 करोड़ रुपये से बढ़कर लगभग 29,450 करोड़ रुपये तक पहुंच गया. पिनाका, आकाश जैसी प्रणालियां निर्यात हो रही हैं. अजरबैजान-आर्मेनिया संघर्ष में भारतीय उपकरण इस्तेमाल हुए जो देश के लिए गर्व की बात है. स्टार्टअप्स में भी आरएंडडी और इनोवेशन बढ़ रहा है. आईडेक्स, टीडीएफ, मेक-वन, मेक-टू, मेक-थ्री जैसी योजनाओं से इंडस्ट्री खुद रिसर्च करके सिस्टम ला रही है.
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स्पेस और आर्थिक बुनियादी ढांचे की सुरक्षा
बैटलफील्ड का दायरा अब आर्थिक और स्पेस इंफ्रास्ट्रक्चर तक फैल गया है. तेल भंडारण, ईंधन टर्मिनल जैसे नागरिक लक्ष्यों पर हमले देखे गए हैं. इसकी सुरक्षा के लिए मजबूत आक्रामक क्षमता जरूरी है जो प्रतिरोधक का काम करे. स्पेस में भारत ने 27 मार्च 2019 को एंटी-सैटेलाइट टेस्ट करके दुनिया को संदेश दिया. रूस, अमेरिका और चीन के बाद भारत चौथा देश बना.
यह नियंत्रित परीक्षण था जिसमें मलबा न्यूनतम था. इससे स्पष्ट हो गया कि भारत के पास क्षमता है और उसके सैटेलाइट को आसानी से छुआ नहीं जा सकता. स्पेस इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत और सुरक्षित रखने के लिए निरंतर काम चल रहा है.
भारत की प्रौद्योगिकी निर्भरता बहुत कम हो गई है. मिसाइल, रडार, सोनार, टॉरपीडो, एयरबोर्न वार्निंग सिस्टम, टैंक, गन, मॉडर्न व्हीकल, शिप और सबमरीन देश में बन रहे हैं. एयरक्राफ्ट कैरियर भी स्वदेशी हैं. मिसाइलों में लगभग नब्बे प्रतिशत स्वदेशी सामग्री है. फिर भी महत्वपूर्ण सामग्री, सेमीकंडक्टर, सेंसर, डिटेक्टर और एयरो-इंजन अभी बाहर से आते हैं.
अगले चार-पांच साल में सेमीकंडक्टर उद्योग देश में मजबूत होगा. डिवाइस, सेंसर और डिटेक्टर भी बनेंगे. क्रूज मिसाइल और टैंक के इंजन पहले ही स्वदेशी हो चुके हैं. एयरक्राफ्ट इंजन पर काम चल रहा है. निर्भरता तेजी से घटेगी.
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रणनीतिक रूप से मूल्यवान प्रौद्योगिकियों में स्वदेशी सामग्री, एयरो-इंजन, बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम, लेजर, हाइपरसोनिक और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिस्टम तथा क्वांटम सिस्टम शामिल हैं. शहरों की सुरक्षा के लिए बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस जरूरी है. इन क्षेत्रों में जोर देने से भारत उन्नत राष्ट्रों के साथ कदम से कदम मिलाकर चल सकेगा.
2030 और 2047 का लक्ष्य: गहरी रिसर्च और लो-कॉस्ट सिस्टम
आत्मनिर्भर भारत के लिए अकादमिक संस्थानों में गहरी बुनियादी रिसर्च जरूरी है. सामग्री, विनिर्माण, जैविक, कोल्ड एटम, ऑप्टिकल और प्रोफेशनल सिस्टम क्षेत्रों में काम बढ़ाना होगा. मिसाइल का वजन कम करके लागत घटानी होगी. ईरान जैसे संघर्षों से सीखकर लो-कॉस्ट, आसानी से चलने वाले और स्वायत्त सिस्टम पर फोकस करना होगा.
लेजर, हाई पावर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक्स, अंडरवाटर सिस्टम और पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान पर 2030-35 तक काम पूरा करने का लक्ष्य है. इकोसिस्टम को इतना मजबूत बनाना होगा कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बल पर भारत न सिर्फ अपनी रक्षा सुनिश्चित करे बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अग्रणी बने.
पूर्व डीआरडीओ प्रमुख के अनुसार पिछले एक दशक में रक्षा उद्योग में जो बदलाव आया है वह उल्लेखनीय है. समय की बचत, निजी भागीदारी, निर्यात वृद्धि और प्रौद्योगिकीय आत्मनिर्भरता ने भारत को नई ऊंचाई दी है. पारंपरिक और आधुनिक दोनों क्षमताओं को साथ लेकर भविष्य के युद्ध की तैयारी चल रही है. यह सफर जारी रहेगा और 2047 तक भारत एक सशक्त, आत्मनिर्भर रक्षा शक्ति के रूप में उभरेगा.
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