कुछ तारीखें कैलेंडर में सिर्फ तारीखें नहीं रहतीं। वे इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाती हैं। 20 जुलाई भी शायद ऐसी ही एक तारीख है। आने वाले वर्षों में जब देश के छात्र आंदोलनों की बात होगी तब दिल्ली के जंतर-मंतर की वह सुबह लाखों युवाओं का जनसैलाब और शिक्षा के सवाल पर उठी आवाज़ें जरूर याद की जाएँगी –

फोटो साभार: खबर लहरिया
मैं उस दिन सिर्फ एक पत्रकार नहीं थी। मैं उन लाखों चेहरों की गवाह थी,जो अपने-अपने शहरों, कस्बों और गांवों से एक उम्मीद लेकर दिल्ली पहुँचे थे। उनके हाथों में झंडे थे, गले में नारे थे, आँखों में गुस्सा भी था और उम्मीद भी। किसी की कहानी अलग थी किसी का संघर्ष अलग था लेकिन सबकी मंज़िल एक थी एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था जिस पर भरोसा किया जा सके।
यह आंदोलन 6 जून से जंतर-मंतर पर चल रहा था। शुरुआत NEET परीक्षा में कथित घोटाले और पेपर लीक के विरोध से हुई थी। माँग थी कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें और शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही तय हो। लेकिन 20 जुलाई तक आते-आते यह आंदोलन सिर्फ एक मंत्री के इस्तीफे की माँग तक सीमित नहीं रह गया था। यह पूरे शिक्षा तंत्र, उसकी पारदर्शिता और सरकार की जवाबदेही पर सवाल बन चुका था।
सबसे दिलचस्प बात यह थी कि यह भीड़ सिर्फ किसी एक संगठन की नहीं लग रही थी। शुरुआत में इसे जरुर CJP का आंदोलन माना जा रहा था लेकिन 20 जुलाई को ऐसा महसूस हो रहा था कि आंदोलन अब लोगों का अपना आंदोलन बन चुका है। देश के अलग-अलग राज्यों से आए छात्र, युवा, अभिभावक और आम लोग अपने अनुभवों और शिकायतों के साथ वहाँ मौजूद थे। लोगों से बातचीत के दौरान साफ समझ में आ रहा था कि लोग सिर्फ NEET या एक परीक्षा से नाराज नहीं हैं लोग अपने-अपने राज्यों की शिक्षा व्यवस्था, भर्ती प्रक्रियाओं और लगातार बढ़ती अनिश्चितता से परेशान होकर यहाँ पहुँचे हैं। जंतर-मंतर पर एक और वजह से भी भीड़ उमड़ रही थी और वो है लोग सोनम वांगचुक जिनके समर्थन में भी लोग पहुँच रहे थे जिन्हें आंदोलन के दौरान मंच से उठाए जाने की खबर फैल चुकी थी। कई लोग उनके अनशन के समर्थन में भी आए थे। शिक्षा का सवाल अब देश के दूसरे जन आंदोलनों से भी जुड़ता दिखाई दे रहा था। उस दिन जंतर-मंतर पर केवल छात्र नहीं थे वे तमाम लोग थे जो किसी न किसी रूप में व्यवस्था से निराश थे।
सुबह पाँच बजे और दिल्ली का जंतर मंतर
20 जुलाई को हमारी टीम भी संसद चलो मार्च की रिपोर्टिंग के लिए तड़के ही निकल गई थी। हम चार लोग थे और सुबह लगभग साढ़े छह बजे जंतर-मंतर पहुँच गए लेकिन वहाँ पहुँचकर सबसे पहला आश्चर्य यही हुआ कि इतनी सुबह भी दस-बीस हजार से कम लोग नहीं थे। सुबह पाँच बजे जब मैं दिल्ली की सड़कों से होकर जंतर-मंतर की ओर जा रही थी तब चारों तरफ सिर्फ पुलिस ही पुलिस दिखाई दे रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे किसी बड़े नेता या मंत्री का दौरा होने वाला हो। हर सड़क, हर मोड़ और हर बैरिकेड पर पुलिस की मौजूदगी थी।

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जंतर-मंतर पहुँचते ही हमारी टीम अपने-अपने काम में लग गई। टीम में से कोई कैमरा संभाल रहा था कोई लोगों से बातचीत कर रहा था तो कोई लगातार अपडेट जुटा रहा था ताकि हर छोटी-बड़ी जानकारी दर्ज की जा सके।
उधर पटेल चौक मेट्रो, जनपथ और दूसरे रास्तों से लोगों का आना लगातार जारी था। अलग-अलग संगठनों के सौ-सौ, डेढ़-सौ लोगों के समूह एक साथ पहुँच रहे थे। हर समूह के अपने झंडे थे, अपने बैनर थे, लेकिन नारों में एक जैसी गूँज थी इंकलाब, आज़ादी और इस्तीफे की माँग। समय बीतने के साथ भीड़ बढ़ती जा रही थी। लेकिन विरोध का तरीका हर किसी का अलग था। कहीं डफली बज रही थी, कहीं गीत गाए जा रहे थे, कहीं रैप के ज़रिए व्यवस्था पर सवाल उठ रहे थे। कुछ लोग नारे लगा रहे थे तो कुछ पुश-अप करके अपना विरोध दर्ज करा रहे थे। जंतर-मंतर एक बड़ा धरना स्थल तो है ही लेक्न जंतर मंतर उस दिन अभिव्यक्ति का एक बड़ा मंच भी बन गया था जहाँ हर व्यक्ति अपने तरीके से अपनी बात कह रहा था।
बैरिकेड, वेल्डिंग और बंद होता इंटरनेट
करीब एक घंटे बाद माहौल अचानक बदलने लगा। पुलिस प्रशासन ने जंतर-मंतर की ओर आने वाले लगभग सभी रास्तों पर बैरिकेड लगाने शुरू कर दिए। सिर्फ जनपथ वाला रास्ता खुला छोड़ा गया। बाकी जगहों पर बैरिकेड इतने मजबूत किए जा रहे थे कि उन्हें वेल्डिंग करके स्थायी रूप से जोड़ दिया गया ताकि कोई उन्हें हिला या तोड़ न सके। इसी बीच भीड़ लगातार बढ़ती रही। लेकिन कुछ देर बाद एक और ऐसी घटना हुई जिसने पूरे आंदोलन की दिशा बदल दी। अचानक इंटरनेट सेवा बंद कर दी गई।
हमारे कैमरों में दर्ज वीडियो, लोगों की बाइट्स, तस्वीरें और रिपोर्टिंग का सारा डेटा हमारे पास था लेकिन हम उसे अपने ऑफ़िस नहीं भेज पा रहे थे। न वीडियो अपलोड हो रहे थे, न फोटो, न ही लाइव अपडेट। पत्रकारों के लिए यह सबसे मुश्किल स्थिति थी। इसी बीच मार्च सुबह 9 बजे निकलना था। लेकिन 10 और फिर 11 बज गए। मार्च शुरू नहीं हुआ जबकि लोगों का आना लगातार जारी था। इस बीच हमारी टीम के पास रिपोर्टिंग का बहुत सारा कंटेंट जमा हो चुका था लेकिन इंटरनेट बंद होने की वजह से उसे भेजना असंभव था। इसी अफरा-तफरी में हमारी चार लोगों की टीम भी दो हिस्सों में बँट गई। हमें यह तक नहीं पता था कि बाकी साथी उस समय कहाँ हैं।
आख़िरकार हमने तय किया कि इंटरनेट की तलाश में जंतर-मंतर से बाहर निकलना ही होगा। हमें नहीं पता था कि आगे क्या होने वाला है लेकिन उस समय रिपोर्टिंग जारी रखना भी उतना ही जरूरी था जितना वहाँ मौजूद रहना। हमारी दो लोगों की एक टीम वहीं रुकी और दो लोग बाहर आ गए।
हम इंटरनेट की तलाश में जंतर-मंतर से कनॉट प्लेस (सीपी) की ओर निकल गए। हमें लगा कि कुछ दूरी पर जाकर शायद नेटवर्क मिल जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जंतर-मंतर से बाहर निकलने के बाद भी मोबाइल पूरी तरह बेकार था। इंटरनेट बंद होने का असर पत्रकारों पर तो था ही इसके अलावा वहाँ मौजूद हजारों लोगों पर भी इसका असर पड़ रहा था। किसी को नहीं पता था कि मंच पर क्या हो रहा है अगला फैसला क्या है और मार्च कब निकलेगा और मंच के लोगों के भी ये नहीं पता था कि बाहर क्या हो रहा है और कितनी भीड़ इकट्ठा होती जा रही है।

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हम और आगे बढ़े लेकिन नेटवर्क कहीं नहीं मिला। आखिरकार हमें अपने एक साथी (हम दो थे उसमें एक एक) के घर जाना पड़ा। वहाँ वाई-फाई से फोन कनेक्ट किया तो पहली बार पता चला कि इस बीच जंतर-मंतर के अंदर जहां सभी CJP नेता मौजूद थे वहां क्या-क्या हो चुका है। सबसे बड़ी खबर यह थी कि AISA छात्र संगठन के तरफ से जो तीन लोग अनशन पर बैठे लोग थे उनका अनशन तुड़वा दिया गया था। (अपनी मर्ज़ी से) इंटरनेट बंद होने के कारण जंतर-मंतर के बाहर मौजूद हजारों लोगों को इसकी कोई जानकारी नहीं थी। मंच के पास क्या चल रहा है किसने क्या घोषणा की, मार्च कब निकलेगा इनमें से किसी बात की स्पष्ट सूचना लोगों तक नहीं पहुँच रही थी।
हमने सबसे पहले अपने कैमरे में रिकॉर्ड किए गए वीडियो, तस्वीरें और लोगों की बाइट्स दफ्तर भेजीं ताकि खबर प्रकाशित हो सके। इसके बाद सोशल मीडिया के जरिए भी घटनाक्रम समझने की कोशिश की। तभी महसूस हुआ कि इंटरनेट बंद होने से सिर्फ संचार नहीं रुका था बल्कि आंदोलन की पूरी गति प्रभावित हो गई थी। लोग एक-दूसरे से कट गए थे। किसी को नहीं मालूम था कि आगे क्या रणनीति है और किस दिशा में बढ़ना है।
पैदल सफर और संसद की ओर निकलती भीड़
काम पूरा करने के बाद हम वापस जंतर-मंतर की ओर लौटने लगे। उस समय ऑटो मिलना भी मुश्किल हो गया था। कुछ दूरी ऑटो से और बाकी पैदल तय करनी पड़ी। रास्ते में पता चला कि प्रदर्शनकारियों का एक बड़ा समूह संसद भवन की ओर निकल चुका है। सबसे हैरानी की बात यह थी कि उस समूह के साथ कोई प्रमुख नेतृत्व मौजूद नहीं था। न अभिजीत दिपके थे और न ही आंदोलन के दूसरे प्रमुख चेहरे। भीड़ अपने आप आगे बढ़ चुकी थी। जिसकी जानकारी नेतृत्वकर्ताओं को भी नहीं थी।
इंटरनेट बंद होने की वजह से यह जानकारी भी सभी तक नहीं पहुँची थी। कुछ लोगों को पता था कि संसद की ओर कूच शुरू हो चुका है जबकि बाकी लोग अब भी जंतर-मंतर के आसपास ही खड़े थे और आगे की घोषणा का इंतज़ार कर रहे थे। इससे भीड़ कई हिस्सों में बँट गई थी। लोग लगातार एक-दूसरे से पूछ रहे थे “अब कहाँ जाना है?”, “मार्च निकल गया क्या?”, “नेतृत्व कहाँ है?” ‘लीडर कहाँ हैं’?
हमने भी तय किया कि संसद भवन की ओर बढ़ना चाहिए। लेकिन दिल्ली की सड़कों पर इतनी भारी सुरक्षा थी कि रास्ता समझना मुश्किल हो गया। जगह-जगह बैरिकेड लगे थे। कई रास्ते पूरी तरह बंद कर दिए गए थे। पुलिस लोगों को आगे बढ़ने से रोक रही थी। भीड़ इतनी अधिक थी कि कई बार हम खुद भी भटक गए। समझ नहीं आ रहा था कि संसद भवन की ओर जाने वाला रास्ता कौन-सा है।
भटकते-भटकते हम एक ऐसे इलाके में पहुँचे जहाँ हजारों लोग पहले से जमा थे। यह वही समूह था जो संसद भवन की ओर बढ़ रहा था। और संसद भवन के लगभग करीब ही था। सामने पुलिस के बड़े-बड़े बैरिकेड लगे थे। प्रदर्शनकारी लगातार नारे लगा रहे थे और आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे थे। कई लोग बैरिकेड हटाने की कोशिश कर रहे थे ताकि संसद तक पहुँच सकें।
हमारे टीम से हम दो भी वहीं मौजूद थे। माहौल लगातार तनावपूर्ण होता जा रहा था। लोगों की कोशिश थी कि रास्ता खुल जाए लेकिन पुलिस उन्हें रोकने में लगी थी। इसी दौरान पुलिस ने भीड़ को पीछे धकेलने के लिए कार्रवाई शुरू की। कुछ लोगों पर कुछ ऐसा स्प्रे किया गया जिससे आँखों में तेज जलन होने लगी। कई लोग अपनी आँखें मलते हुए पीछे हटने लगे। इसके बाद सामने खड़े कुछ लोगों पर लाठियाँ भी चलाई गईं। लेकिन इसके बावजूद भीड़ पीछे हटने को तैयार नहीं थी। लोगों ने मिलकर बैरिकेड को धक्का दिया और आखिरकार उसे तोड़ दिया। बैरिकेड टूटते ही हजारों लोग आगे बढ़ गए। हम भी उनके साथ आगे बढ़े और रास्ते में लोगों से लगातार बातचीत करते रहे। हर कोई बस एक ही बात कह रहा था उन्हें संसद तक जाकर अपनी आवाज़ पहुँचानी है।

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कुछ दूर आगे बढ़ने के बाद स्थिति अचानक बदल गई। जिस बैरिकेड को प्रदर्शनकारियों ने तोड़ा था पुलिस ने उसे फिर से खड़ा कर दिया। आगे भी नया बैरिकेड लगा दिया गया। देखते ही देखते हजारों लोग दोनों तरफ से घिर गए। अनुमानित बारह हजार से अधिक लोग बीच में फँसे हुए थे। आगे जाने का रास्ता बंद था और पीछे लौटना भी आसान नहीं था।
भीड़ लगातार आगे बढ़ने की कोशिश कर रही थी। उन्होंने एक बार फिर बैरिकेड हटाने की कोशिश की लेकिन इस बार पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को पकड़-पकड़कर हटाना शुरू कर दिया। इसी दौरान अफरा-तफरी मच गई। लोग इधर-उधर भागने लगे। हम भी उसी भीड़ के बीच फँसे हुए थे और अपनी सुरक्षा के साथ-साथ रिपोर्टिंग भी जारी रखने की कोशिश कर रहे थे। यहीं से उस दिन का सबसे कठिन और सबसे भयावह दौर शुरू हुआ।
लाठीचार्ज, आँसू गैस और वह दिन जिसे भूलना आसान नहीं
अचानक पुलिस ने लोगों को पकड़-पकड़कर हटाना शुरू कर दिया। फिर लाठीचार्ज हुआ। देखते ही देखते अफरा-तफरी मच गई। लोग अपनी जान बचाने के लिए भागने लगे। कोई इधर दौड़ रहा था कोई उधर। महिलाएँ, बच्चे, युवा, बुजुर्ग उस समय किसी में कोई फर्क नहीं किया जा रहा था। जिस पर पुलिस का हाथ पड़ रहा था उसे धक्का दिया जा रहा था, पीटा जा रहा था या घसीटकर हटाया जा रहा था।
हम भी उसी भीड़ के बीच थे। हम लगातार लोगों से बात कर रहे थे वीडियो रिकॉर्ड कर रहे थे और समझने की कोशिश कर रहे थे कि आखिर हालात इतनी तेजी से कैसे बदल गए। लेकिन कुछ ही मिनटों में रिपोर्टिंग और अपनी सुरक्षा, दोनों एक साथ संभालना मुश्किल हो गया। इसी बीच हम कुछ देर के लिए एक जगह रुक गए। मेरे साथ मौजूद साथी ने कहा कि वह सामने से लाठीचार्ज के कुछ फ़ुटेज लेकर आएगी और मुझे वहीं रुकने को कहा। मैं अकेली खड़ी थी कि तभी पुलिस की ओर से एक जोरदार धक्का दिया गया। सामने खड़ी भीड़ अचानक मेरी तरफ भागी।

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उस भगदड़ में एक पुलिस कर्मी मुझसे टकराया और मैं सीधे एक खड़ी कार के ऊपर जाकर गिर गई। मुझे गंभीर चोट नहीं आई लेकिन कुछ पल के लिए समझ ही नहीं आया कि हुआ क्या है। मैं खुद को संभाल ही रही थी कि उसी पुलिसकर्मी ने बेहद रूखे अंदाज़ में कहा “तुम लोग यहाँ मरने क्यों आते हो?” इतना कहकर वह आगे बढ़ गया। उस समय मेरे मन में कई सवाल उठे। क्या लोकतंत्र में अपनी बात कहने आए लोगों के साथ ऐसा व्यवहार होना चाहिए? क्या एक पत्रकार या प्रदर्शनकारी की जान की कोई कीमत नहीं है? थोड़ी देर बाद मेरी साथी वापस आई। उसने बताया कि भगदड़ में वह भी गिर गई थी और उसके पैर पर एक महिला चढ़कर निकल गई। दर्द के बावजूद हम दोनों ने फिर से रिपोर्टिंग जारी रखने का फैसला किया।

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चारों ओर चीख-पुकार थी। कई लोग घायल हो चुके थे। एक युवक हमारे पास आया। उसके पैरों में गंभीर चोट थी और वह ठीक से चल भी नहीं पा रहा था। हमने उसे पानी पिलाया थोड़ी देर बैठाया और उसकी मदद की। कुछ देर बाद एक और युवक मिला जिसे भी बुरी तरह मारा गया था। वह दर्द में था, लेकिन बार-बार यही कह रहा था कि उसकी बात रिकॉर्ड कर ली जाए और हमने उनसे बात की और उनसे रिपोर्टिंग ली।
उस दिन एक बात बार-बार महसूस हुई घायल लोग इलाज से पहले अपनी बात देश तक पहुँचाना चाहते थे। वे पत्रकारों से आग्रह कर रहे थे “हमारी बात रिकॉर्ड कर लीजिए, लोगों तक पहुँचा दीजिए।” शायद उन्हें भरोसा था कि अगर उनकी आवाज़ कहीं पहुँच सकती है तो वह रिपोर्टिंग और मीडिया के जरिए ही पहुँचेगी।
आँसू गैस से भर गई हवा
कुछ देर बाद हम किसी तरह भीड़ से निकलकर एक रास्ते से बाहर आए। ऑटो बंद हो चुके थे। इंटरनेट पहले से बंद था इसलिए ऑनलाइन कैब भी नहीं बुक की जा सकती थी। मजबूरी में कुछ दूरी पैदल और कुछ दूरी ऑटो से तय करके हम एक कैफे पहुँचे। वहाँ वाई-फाई से इंटरनेट मिला और हमने पूरे दिन की रिकॉर्डिंग, वीडियो और तस्वीरें दफ्तर भेजीं लेकिन रिपोर्टिंग अभी खत्म नहीं हुई थी। कैफे से निकलकर हम फिर जनपथ की ओर लौटे। वहाँ पहुँचते ही देखा कि लगातार आँसू गैस के गोले छोड़े जा रहे हैं। हमारी टीम के कुछ साथी अब भी जंतर-मंतर के अंदर थे। उनसे संपर्क करना मुश्किल था।
हम दोबारा घटनास्थल की ओर बढ़े। वहाँ पहुँचते ही आँसू गैस का असर हम पर भी होने लगा। आँखों में तेज जलन होने लगी, साँस लेने में तकलीफ होने लगी और लगातार खाँसी आने लगी। कुछ देर तक हालात देखने के बाद हमें मजबूरी में वहाँ से निकलना पड़ा। हमें भी लोकतंत्र का आशीर्वाद आंसू गैस के माध्यम से मिल ही गया।
उस दिन मैंने अपनी आँखों से देखा कि पुलिस कार्रवाई में किसी तरह का भेदभाव नहीं किया जा रहा था। महिलाएँ थीं, बच्चे थे, बुजुर्ग थे, छात्र थे, पत्रकार थे लेकिन किसी को राहत नहीं मिली। कई महिलाओं को बाल पकड़कर खींचा गया। बच्चों को भी नहीं छोड़ा गया। जो सामने आया उसे बल प्रयोग का सामना करना पड़ा। प्रोटोकॉल कहता है लाठीचार्ज में केवल पैरो में किया जाता है लेकिन उस दिन लोगों के सर फटे हाथ टूटे कई गहरी चोटें आइँ, घायल हुए।

सबसे हैरानी की बात यह थी कि देश में स्कूलों के भीतर बच्चों को मारना कानूनन गलत माना जाता है। शिक्षकों को बच्चों पर हाथ उठाने की अनुमति नहीं है। लेकिन उसी देश में शिक्षा की माँग कर रहे छात्रों पर खुलेआम लाठियाँ बरसाई जा रही थीं। यह विरोधाभास पूरे दिन मेरे मन में घूमता रहा।
कार्रवाई के दौरान कुछ ऐसे लोग भी दिखाई दिए जिन्होंने पुलिस जैसी वर्दी तो पहन रखी थी लेकिन उनकी वर्दी पर नाम की पट्टी नहीं थी, नेम प्लेट नहीं था और न ही बैच। कुछ लोग सामान्य टी-शर्ट और शर्ट में भी थे जिनके हाथों में डंडे थे और वे भी कार्रवाई का हिस्सा लग रहे थे। वहाँ मौजूद कई लोग लगातार यही सवाल पूछ रहे थे ये लोग कौन हैं? लेकिन किसी के पास इसका जवाब नहीं था।
सवाल सिर्फ एक परीक्षा का नहीं, पूरे सिस्टम का था
दिन ढलने लगा था लेकिन जंतर-मंतर और संसद मार्ग पर उठे सवाल शांत नहीं हुए थे। दूर तक आंसू गैस के आवाज सुनाई दे रही थी मानों दिवाली हो। पूरे दिन की रिपोर्टिंग के बाद जब मैं पीछे मुड़कर देख रही थी तो महसूस हो रहा था कि यह आंदोलन अब सिर्फ NEET परीक्षा या एक मंत्री के इस्तीफे की माँग तक सीमित नहीं रहा। यह उस पूरे शिक्षा तंत्र के खिलाफ लोगों का गुस्सा था जिस पर उनका भरोसा लगातार कमजोर होता जा रहा है।
रिपोर्टिंग के दौरान यह बात बार-बार सामने आई कि यहाँ आए लोग सिर्फ एक परीक्षा की बात नहीं कर रहे थे। कोई भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ियों से परेशान था, कोई अपने राज्य की शिक्षा व्यवस्था से, कोई बेरोज़गारी से और कोई वर्षों की मेहनत के बाद भी व्यवस्था में पारदर्शिता न मिलने से। शिक्षा उनके लिए सिर्फ डिग्री पाने का माध्यम नहीं थी शिक्षा भविष्य, रोजगार और सम्मान से जुड़ा सवाल बनी हुई थी।

फोटो साभार: खबर लहरिया
नेतृत्व की कमी और इंटरनेट बंद होने का असर
उस दिन की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ पुलिस कार्रवाई नहीं थी। इंटरनेट बंद होना भी पूरे आंदोलन की दिशा बदल देने वाला फैसला साबित हुआ। जब इंटरनेट बंद हुआ तब हजारों लोग एक-दूसरे से कट गए। मंच पर क्या हो रहा है, कौन-सा फैसला लिया गया है, मार्च कब निकलेगा, किस रास्ते जाना है इनमें से किसी बात की जानकारी समय पर लोगों तक नहीं पहुँच पा रही थी। न पत्रकार खबर भेज पा रहे थे, न प्रदर्शनकारी आपस में संपर्क कर पा रहे थे। दूसरी ओर भीड़ लगातार बढ़ती जा रही थी। इतनी बड़ी संख्या को संभालना किसी भी संगठन के लिए आसान नहीं था।
मुझे लगा कि उस दिन दो बातें एक साथ हुईं। पहली, इंटरनेट बंद कर दिया गया। दूसरी, भीड़ इतनी बड़ी हो गई कि उसे संगठित तरीके से नियंत्रित करना मुश्किल हो गया। इन दोनों कारणों से लोग अलग-अलग समूहों में बँट गए। अगर सभी लोगों तक एक साथ जानकारी पहुँचती और पूरा मार्च एक नेतृत्व के साथ आगे बढ़ता, तो शायद हालात कुछ अलग होते। शायद लोग इधर-उधर न भटकते। शायद पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की स्थिति भी कुछ कम होती। यह केवल एक संभावना है लेकिन उस दिन की घटनाएँ देखते हुए यह सवाल लगातार मन में बना रहा।
एक और बात पूरे दिन साफ दिखाई दी। हजारों लोगों की भीड़ होने के बावजूद मैंने बार-बार प्रदर्शनकारियों को एक-दूसरे से यह कहते सुना कि आंदोलन शांतिपूर्ण रहना चाहिए। कई लोग दूसरों को समझा रहे थे कि गाली-गलौज नहीं करनी है, हिंसा नहीं करनी है, बस अपनी बात संसद तक पहुँचानी है।
हाँ, बैरिकेड हटाने की कोशिश हुई लेकिन अधिकांश लोगों की मंशा पुलिस से भिड़ना नहीं थी आगे बढ़कर अपनी बात कहना थी। वे शिक्षा के सवाल को देश की सर्वोच्च संस्था तक ले जाना चाहते थे। यह बात भी उस दिन की तस्वीर का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा है जितनी पुलिस कार्रवाई।

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लोकतंत्र, मीडिया और कुछ सवाल भी
20 जुलाई ने कई सवाल खड़े किए हैं। क्या शिक्षा की माँग करने वाले छात्रों के साथ ऐसा व्यवहार लोकतंत्र में स्वीकार्य है? क्या इंटरनेट बंद कर देना किसी आंदोलन को संभालने का तरीका होना चाहिए? क्या पत्रकारों के लिए भी रिपोर्टिंग करना इतना कठिन बना दिया जाना चाहिए कि वे अपनी खबर तक न भेज सकें? और सबसे अहम सवाल क्या शिक्षा जैसे मुद्दे पर आवाज़ उठाने वाले युवाओं को अपनी बात कहने के लिए लाठियाँ और आँसू गैस झेलनी पड़ेगी?
उस दिन मैंने देखा कि कई छात्र पत्रकारों से खुद आकर कह रहे थे “हमारी बात रिकॉर्ड कर लीजिए।” इससे यह भी समझ में आया कि उन्हें पता है कि मीडिया का एक हिस्सा उनकी आवाज़ दिखाएगा लेकिन एक हिस्सा शायद नहीं। आंदोलन के दौरान भीड़ से “गोदी मीडिया” के नारे भी सुनाई दे रहे थे। कुछ मीडिया संस्थानों ने उस दिन की घटनाओं को उसी रूप में दिखाया जैसा वहाँ हो रहा था जबकि कुछ ने प्रदर्शनकारियों को अलग तरह से पेश किया। यह भी उस दिन की कहानी का एक अहम हिस्सा था।
विपक्ष का समर्थन
दूसरे दिन यानी 21 जुलाई को संसद परिसर के बाहर विपक्ष के नेताओं ने भी छात्रों के समर्थन में प्रदर्शन किया। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी सहित कई नेताओं ने छात्रों की माँगों का समर्थन किया जिसके बाद उन्हें भी हिरासत में लिया गया और बाद में छोड़ा गया। उस समय आंदोलन में मौजूद कई छात्रों का मानना था कि कम से कम उनकी बात राजनीतिक स्तर पर उठाई जा रही है। यह समर्थन उनके लिए मनोबल बढ़ाने वाला था।
20 जुलाई के बाद भी आंदोलन नहीं रुका। जंतर-मंतर पर लोग डटे रहे। उसी दिन सीजेपी द्वारा रात में वपस जंतर मंतर पर हज़ारों संख्या के साथ वापस आंदोलन शुरू कर दिया गया है। इस आंदोलन को देश और विदेश से समर्थन मिलने लगा। देश के बाकी लोगों के साथ विदेशों में रहने वाले लोगों द्वारा भी ऑनलाइन खाना, दवाइयाँ और दूसरी ज़रूरी सामग्री जंतर मंतर भेजी जाने लगी। इससे यह साफ दिखा कि आंदोलन समाज के अलग-अलग हिस्सों तक पहुँच गया है। लोग किसी ना किसी तरीके से अपना समर्थन दे रहे हैं।
जब उस रात मैं घर लौटी तब मेरे कपड़ों में आँसू गैस की गंध अब भी थी। आँखों में जलन थी, पैरों में थकान थी और कैमरे में पूरे दिन की तस्वीरें थीं। लेकिन सबसे ज़्यादा मेरे भीतर वे चेहरे रह गए जो सैकड़ों किलोमीटर दूर से सिर्फ इसलिए दिल्ली आए थे क्योंकि उन्हें लगता था कि अगर अब भी नहीं बोले तो शायद फिर कभी बोल नहीं पाएँगे। मैंने उस दिन सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं देखा। मैंने उम्मीद और हताशा को एक साथ चलते देखा। मैंने गुस्सा देखा लेकिन उसके भीतर बदलाव की इच्छा भी देखी। मैंने डर देखा लेकिन उससे बड़ा साहस भी देखा।
रिपोर्टिंग के दौरान कुछ ऐसे दृश्य भी सामने आए जिन्होंने मन को भीतर तक झकझोर दिया। एक ओर देश में “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” का नारा दिया जाता है वहीं दूसरी ओर उसी दिन कई महिलाएँ पुलिस कार्रवाई से खुद को बचाने के लिए इधर-उधर भागती दिखाई दीं। जिन वर्दियों को सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है उनके बीच कई ऐसे व्यवहार भी देखने को मिले जिन्होंने मन में असहज सवाल खड़े कर दिए। हमारे सामने कुछ महिलाओं ने दिल्ली पुलिसकर्मियों के अनुचित व्यवहार का सामना किया। हमने स्वयं भी कुछ ऐसे हाव-भाव, नज़रें और अशोभनीय इशारे देखे जिन्हें शब्दों में बयां करना आसान नहीं है। उन पलों में मेरे मन में बार-बार यही सवाल उठ रहा था अगर महिलाएँ अपनी सुरक्षा को लेकर पुलिस से ही डरने लगें तो फिर “बेटी बचाओ” का नारा आखिर किससे और कैसे पूरा होगा? और किससे बचाएँ बेटी?
हालाँकि जब वापस आकर सोशल मीडिया देखा तो कई ऐसे खबरें आइं जिसमें पुलिस द्वारा महिलाओं के साथ गलत तरीके से व्यवहार करते दिखाई दिया। जितना हम उस समय देख पाए थे उससे ज़्यादा लोग घायल थे, लोगों को जानवरों की तरह घसीटा गया लाठी के अलावा पैरो और जूतों से भी मारा गया, महिलाओं पर हाथ उठाया गया और दुःख तब ज़्यादा होता है कि इतना सब होने पर भी सरकार की चुप्पी उसी तरह बनी हुई है। इस बात को भी नहीं नकारा जा सकता कि आंसू गैस और लाठीचार्ज भी सरकार के मंज़ूरी से ही दिया गया और पुलिस द्वारा उसी बखूबी से निभाया गया।
20 जुलाई इसलिए याद नहीं रखी जाएगी कि उस दिन कितनी बैरिकेडिंग हुई कितने आँसू गैस के गोले छोड़े गए या कितने लोग घायल हुए। यह दिन इसलिए भी याद रखा जाएगा क्योंकि उस दिन देश के हजारों युवाओं ने शिक्षा को अपना अधिकार मानते हुए सड़कों पर उतरकर इस क्रूर व्यवस्था से जवाब माँगा। इतिहास यह तय करेगा कि उनकी माँगें कितनी पूरी हुईं। लेकिन एक रिपोर्टर और देश के नागरिक होने के तौर पर मैं इतना ज़रूर कह सकती हूँ कि उस दिन जंतर-मंतर पर बस एक आंदोलन नहीं चल रहा था उस दिन देश का एक पूरा युवा वर्ग अपने भविष्य को बचाने की कोशिश कर रहा था। और शायद यही 20 जुलाई की सबसे बड़ी कहानी है।
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