चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत ने जजों के खिलाफ मिलने वाली शिकायतों के निपटारे की मौजूदा व्यवस्था का बचाव किया है. उन्होंने इस प्रक्रिया को ‘समयबद्ध और मजबूत’ करार दिया. हालांकि, इसके साथ ही उन्होंने यह भी साफ किया कि न्यायपालिका में सुधार की गुंजाइश हमेशा बनी रहनी चाहिए और कोई भी संस्थान स्थिर या जड़ नहीं हो सकता. सीजेआई सूर्यकांत ‘राम जेठमलानी मेमोरियल लेक्चर’ के दौरान बोल रहे थे. इस कार्यक्रम में वरिष्ठ वकील महेश जेठमलानी और हरीश साल्वे ने न्यायपालिका की जवाबदेही, पारदर्शिता और पूर्व जज यशवंत वर्मा कैश विवाद पर गंभीर सवाल उठाए थे.
‘हर स्तर पर मिलती हैं शिकायतें’
पारदर्शिता की मांग पर जवाब देते हुए सीजेआई ने सवालिया लहजे में कहा, “जजों को अपने करियर के हर पड़ाव पर शिकायतों का सामना करना पड़ता है. तो क्या हमें हर शिकायत को उठाकर वेबसाइट पर डाल देना चाहिए?” उन्होंने कहा कि शिकायतों से निपटने के लिए पहले से ही एक मजबूत आंतरिक व्यवस्था तय है. कुछ मुद्दे ऐसे भी होते हैं जिन पर सार्वजनिक मंचों से बात करना उचित नहीं होता.
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साल्वे और जेठमलानी ने उठाए थे कड़े सवाल
कार्यक्रम में वरिष्ठ वकील महेश जेठमलानी ने न्यायपालिका पर घटते जनविश्वास का हवाला दिया और जजों के खिलाफ शिकायतों का एक सार्वजनिक डेटाबेस बनाने की वकालत की. साथ ही उन्होंने ‘फिक्सर वकीलों’ पर रोक लगाने की मांग की. वहीं, वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने कॉलेजियम व्यवस्था और राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जहां जज ही जजों की नियुक्ति करते हैं. साल्वे ने न्याय व्यवस्था में बुनियादी स्तर से बड़े बदलाव (रीसेट) की जरूरत बताई.
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भरोसा और जनसमर्थन अलग-अलग: CJI
इन दलीलों के जवाब में सीजेआई सूर्यकांत ने कॉलेजियम प्रणाली का बचाव किया और कहा कि कॉलेजियम और सरकार के बीच संवाद में कोई बड़ी बाधा नहीं है. उन्होंने कहा कि जनता का ‘विश्वास’ और ‘पॉपुलैरिटी’ दो अलग बातें हैं. अदालत का भरोसा केवल इस बात से नहीं बनता कि फैसला जनता की मर्जी के मुताबिक आया है, बल्कि तब बनता है जब केस हारने वाला भी यह मानकर जाए कि सुनवाई पूरी निष्पक्षता से हुई है.
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