भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के सबसे बेबाक, ईमानदार और अपने सख्त तेवरों के लिए देश भर में जाने जाने वाले हरियाणा के पूर्व एडिशनल सेक्रेटरी अशोक खेमका एक बार फिर से अपने तीखे बयानों के कारण चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। इस बार उनका निशाना कोई और नहीं बल्कि देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) डॉ. एस.वाई. कुरैशी हैं। पूरा मामला तब गरमाया जब पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर कुछ सार्वजनिक टिप्पणियां की थीं। अशोक खेमका ने इन बياनों पर कड़ी आपत्ति जताते हुए दो टूक शब्दों में कहा है कि एक पूर्व संवैधानिक पद पर आसीन रहे व्यक्ति की ओर से इस तरह के निचले स्तर के प्रहार करना कतई शोभा नहीं देता। खेमका ने साफ किया कि लोकतंत्र में असहमति होना और वैचारिक मतभेद होना पूरी तरह से जायज है, लेकिन किसी व्यक्ति विशेष पर व्यक्तिगत छींटाकशी करना और संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाना स्वस्थ लोकतंत्र के लिए सही नहीं है।
अनुच्छेद 370 को हटाना देश की सबसे बड़ी राष्ट्रीय उपलब्धि और गर्व का विषय
अपने इस कड़े बयान के दौरान अशोक खेमका ने देश के सबसे बड़े फैसलों में से एक 'अनुच्छेद 370' (Article 370) के खात्मे का भी पुरजोर समर्थन किया। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाना केवल एक राजनीतिक फैसला नहीं था, बल्कि यह भारत की संप्रभुता, अखंडता और सुरक्षा से जुड़ा हुआ एक ऐसा राष्ट्रीय गौरव का विषय था जिसे सदियों तक याद रखा जाएगा। खेमका का कहना था कि इस प्रकार के ऐतिहासिक और राष्ट्रीय महत्व के फैसलों पर अनावश्यक सवाल खड़े करना या राजनीतिक चश्मे से देखना देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने जैसा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस कदम से देश की मुख्यधारा के साथ कश्मीर का जो जुड़ाव मजबूत हुआ है, वह हर भारतीय के लिए गर्व की बात होनी चाहिए, न कि उस पर किसी भी प्रकार की ओछी राजनीति की जानी चाहिए।
राजनीतिक द्वेष से ऊपर उठकर संवैधानिक गरिमा को देनी चाहिए प्राथमिकता
अशोक खेमका ने अपने लंबे प्रशासनिक अनुभव का हवाला देते हुए देश के बुद्धिजीवियों और पूर्व अधिकारियों को नसीहत दी कि उन्हें राजनीति और राजनीतिक द्वेष की भावना से ऊपर उठकर देशहित और संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा के बारे में सोचना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब कोई व्यक्ति देश के सबसे बड़े और जिम्मेदार चुनाव आयोग जैसे प्रतिष्ठित पद पर कार्य कर चुका होता है, तो समाज की उससे यह अपेक्षा होती है कि वह अपने बयानों में परिपक्वता और निष्पक्षता की मिसाल पेश करेगा। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं या राजनीतिक एजेंडे के तहत दिए जाने वाले बयान देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और प्रशासनिक ढांचे के प्रति जनता के भरोसे को कमजोर करते हैं। खेमका के इस बेबाक बयान ने एक बार फिर से इस बात को साबित कर दिया है कि वे प्रशासनिक गलियारों में सच बोलने के लिए क्यों जाने जाते हैं।
प्रशासनिक गलियारों और राजनीतिक जगत में छिड़ गई नई बहस
अशोक खेमका के इस तीखे और स्पष्टवादी बयान के सामने आने के बाद से ही राजनीतिक गलियारों और नौकरशाही के बीच जुबानी जंग छिड़ गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एक सेवारत या पूर्व नौकरशाह द्वारा दूसरे वरिष्ठ पूर्व अधिकारी की कार्यशैली और बयानों पर इस तरह की सार्वजनिक टिप्पणी करना बहुत कम देखने को मिलता है। एक तरफ जहां कई लोग खेमका के इस रुख को प्रशासनिक नैतिकता और राष्ट्रीयता के पक्ष में उठाया गया एक साहसिक कदम बता रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ इस पर विरोधी दलों की प्रतिक्रियाएं भी आनी शुरू हो गई हैं। यह पूरा घटनाक्रम इस समय देश भर की मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म्स पर मुख्य चर्चा का विषय बना हुआ है, जहां लोग इस वैचारिक बहस के अलग-अलग पहलुओं पर अपनी राय रख रहे हैं।
लोकतंत्र की मजबूती के लिए संस्थागत और व्यक्तिगत मर्यादा बेहद जरूरी
भारत जैसी दुनिया की सबसे बड़ी और जीवंत लोकतांत्रिक व्यवस्था में विभिन्न मुद्दों पर अलग-अलग विचार होना लोकतंत्र की खूबसूरती है, लेकिन इस खूबसूरती को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि हर व्यक्ति अपनी सीमा और गरिमा का ध्यान रखे। अशोक खेमका द्वारा उठाई गई यह आवाज इस बात की याद दिलाती है कि पद चाहे कोई भी हो, देशहित और संवैधानिक मर्यादाएं हमेशा सबसे ऊपर होनी चाहिए। पूर्व CEC और एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के बीच छिड़ी इस वैचारिक तनातनी ने देश की प्रशासनिक शुचिता और राजनीतिक बहसों को एक नया मोड़ दे दिया है, जो आने वाले दिनों में और अधिक तूल पकड़ सकता है।