September 17, 2026

ओबीसी क्रीमी लेयर विवाद पर सुप्रीम कोर्ट और CAT के बीच फंसी सरकार, कानूनी उलझन से निकलने की कर रही कोशिश - obc creamy layer dispute government caught between supreme court and cat

सुप्रीम कोर्ट और कैट के बीच उलझी केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि ओबीसी क्रीमी लेयर पर रोहित नाथन फैसला ...और पढ़ें

HighLights

  1. सरकार ओबीसी क्रीमी लेयर निर्धारण पर सुप्रीम कोर्ट और कैट में उलझी।

  2. रोहित नाथन फैसले ने कई ओबीसी उम्मीदवारों के लिए नए रास्ते खोले।

  3. कैट में सरकार ने अपने पिछले बयान को संशोधित किया है।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सरकारी नौकरियों और सिविल सर्विसेज में आरक्षण का मामला एक बार फिर चर्चा में है। इस बार मामला ओबीसी के 'क्रीमी लेयर' के निर्धारण से जुड़ा है, जिसमें केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट और सेंट्रल प्रशासनिक ट्रिब्यूनल (CAT) के सामने विरोधाभासी रुख अपनाने के बाद खुद को इस कानूनी उलझन से बाहर निकालने की कोशिश कर रही है।

बता दें कि यह पूरा विवाद 11 मार्च के रोहित नाथन फैसले से शुरू हुआ था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस फैसले में स्पष्ट किया था कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSU) पृष्ठभूमि वाले ओबीसी उम्मीदवारों की आय तय करते समय वेतन को उनकी कुल आय में नहीं जोड़ा जाना चाहिए।

किसे मिला फायदा?

गौर करने वाली बात यह है कि कोर्ट के इस फैसले ने पिछले 10 वर्षों के दौरान परीक्षा पास करने के बावजूद क्रीमी लेयर के दायरे में आने के कारण सिविल सर्विसेज में नियुक्ति से वंचित रहे कई ओबीसी उम्मीदवारों के लिए रास्ते खोल दिए।

समझिए क्या कहता है नियम?

साल 1993 के आधिकारिक नियमों के अनुसार, किसी परिवार की आय की गणना करते समय वेतन और कृषि आय को शामिल नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि, कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) पीएसयू कर्मचारियों के बच्चों के मामले में वेतन को भी आय में जोड़ रहा था, जिससे वे क्रीमी लेयर में आ जाते थे और आरक्षण से बाहर हो जाते थे।

अब समझिए सरकार कहां उलझ गई?

इस बात को ऐसे समझिए कि केंद्र सरकार पर यह कानूनी दबाव तब और बढ़ा जब बसंत सिंह नामक एक ओबीसी उम्मीदवार ने कैट (CAT) का दरवाजा खटखटाया। बसंत सिंह की स्थिति भी रोहित नाथन मामले के उन उम्मीदवारों जैसी ही थी, जिन्हें नौकरी मिलनी चाहिए थी।

फिर क्या, 19 अगस्त को कैट के सामने सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने वचन दिया था कि वह रोहित नाथन फैसले को लागू करने जा रही है। हालांकि इसके ठीक कुछ दिनों बाद, 25 अगस्त को सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर रोहित नाथन के फैसले पर ही सवाल खड़े कर दिए और स्पष्टीकरण मांगा।

अब कैसे सरकार पर बढ़ गया दबाव?

एक तरफ केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में फैसले के खिलाफ अपील कर रही थी, तो दूसरी तरफ कैट में यह कह रही थी कि वह इस फैसले को लागू करेगी। जब यह विरोधाभास सामने आया, तो सरकार पर कानूनी पेचीदगियां और दबाव बढ़ गया।

सरकार ने कैट में नया हलफनामा क्यों दाखिल किया?

इस बात को ऐसे समझिए कि अपनी इसी विरोधी स्थिति को सुधारने के लिए, केंद्र सरकार ने हाल ही में सोमवार को कैट (CAT) में एक नया हलफनामा दाखिल किया है। सरकार ने कैट से अपने 19 अगस्त के उस आदेश में संशोधन करने का अनुरोध किया है जिसमें उसने फैसला लागू करने की बात कही थी।

केंद्र सरकार ने कहा कि उसका पिछला बयान कि फैसला लागू करने का निर्णय लिया गया है, उसे स्पष्ट किया जाना चाहिए। चूंकि ध्यान देने वाली बात यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट में एक मॉडिफिकेशन एप्लीकेशन लंबित है, इसलिए इस फैसले का लागू होना पूरी तरह से सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले पर निर्भर करेगा।

सरकार का तर्क क्या है?

इस मामले में सरकार का मानना है कि यदि पुराना आदेश बिना किसी बदलाव के रिकॉर्ड पर रहता है, तो इससे सरकार की छवि विरोधाभासी लगेगी, यानी एक तरफ कोर्ट में फैसले को चुनौती देना और दूसरी तरफ ट्रिब्यूनल में उसे लागू करने की बात कहना।