इंदौर में 2030 के विद्यार्थी की शिक्षा को लेकर मंगलवार को डेली कॉलेज में राउंड टेबल आयोजित हुई। Bring Your Own Sunshine की ओर से आयोजित ‘The Student of 2030: Are Our Schools & Colleges Ready?’ विषय पर हुए संवाद में शिक्षा विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और ल
.
विशेषज्ञों ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को शिक्षा के लिए खतरा मानने के बजाय सीखने और सोचने के माध्यम के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए। AI बच्चों के लिए ‘थिंकिंग पार्टनर’ की भूमिका निभा सकता है, लेकिन अंतिम निर्णय उनकी अपनी सोच, विवेक और समझ पर आधारित होना चाहिए।
भविष्य की शिक्षा में AI के साथ मानवीय मूल्यों पर भी जोर
MPPSC की सचिव एवं श्रम आयुक्त, IAS अधिकारी शीटला पटले ने कहा कि शिक्षा केवल किताबें पढ़ने और गणित के सवाल हल करने तक सीमित नहीं है। विद्यार्थियों में स्किलिंग, सॉफ्ट स्किलिंग, आत्मविश्वास, संवाद क्षमता और अपने ज्ञान को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने की क्षमता भी विकसित करनी होगी।
उन्होंने कहा कि भारत में आर्थिक और भौगोलिक असमानता के साथ अवसरों की असमान उपलब्धता भी बड़ी चुनौती है। आज विद्यार्थी सिर्फ देश के दूसरे विद्यार्थियों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर रहा, बल्कि पूरी दुनिया उसके सामने है। ऐसे में स्कूल और कॉलेजों को विद्यार्थियों को वैश्विक स्तर की चुनौतियों के लिए तैयार करना होगा।
आज बच्चों के पास पहले की तुलना में अधिक जानकारी और करियर विकल्प हैं, लेकिन इससे भ्रम भी बढ़ा है। अभिभावकों और शिक्षकों को बच्चों को सिर्फ यह बताने के बजाय कि ‘क्या करना है’, उनसे यह भी पूछना चाहिए कि ‘वे क्या करना चाहते हैं।’
समान अवसर के साथ बच्चों की प्राइवेसी भी जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के अधिवक्ता तनुज दीक्षित ने कहा कि 2030 की शिक्षा व्यवस्था में तकनीक के साथ मानवीय मूल्यों, सही निर्णय लेने की क्षमता, साइबर सुरक्षा और बच्चों की प्राइवेसी पर भी ध्यान देना होगा। निजी और सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को AI और आधुनिक तकनीक सीखने के समान अवसर मिलने चाहिए।
AI से डरने के बजाय शिक्षक खुद सीखें
डेली कॉलेज ऑफ बिजनेस मैनेजमेंट की प्रिंसिपल डॉ. सोनल सिसोदिया ने कहा कि शिक्षा जगत को सिर्फ यह सोचने तक सीमित नहीं रहना चाहिए कि तकनीक से क्या गलत हो सकता है, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि उससे क्या बेहतर किया जा सकता है।
एक समय कैलकुलेटर को भी शिक्षा के लिए खतरा माना जाता था, लेकिन उसने सीखने की प्रक्रिया को खत्म नहीं किया। उसी तरह AI भी शिक्षा व्यवस्था में बदलाव का माध्यम है। शिक्षकों को AI से डरने के बजाय इसे समझना, सीखना और सकारात्मक तरीके से इस्तेमाल करना होगा।
ChatGPT- Claude ने बदली असाइनमेंट की चुनौती
निजी यूनिवर्सिटी के कुलपति डॉ. ध्रुव गई ने कहा कि AI शिक्षा को तेजी से प्रभावित कर रहा है और आने वाले वर्षों में इसकी भूमिका और बढ़ेगी।
ChatGPT और Claude जैसे AI टूल्स के आने से पारंपरिक सवाल-जवाब आधारित असाइनमेंट पहले जैसी चुनौती नहीं रह गए हैं। इसलिए शिक्षण पद्धति में बदलाव जरूरी है।
डॉ. प्रकाश चौधरी ने कहा कि विद्यार्थियों को केवल उत्तर खोजने के बजाय कुछ नया बनाने के लिए प्रेरित करना चाहिए। इसके लिए प्रोजेक्ट-बेस्ड लर्निंग, हैकाथॉन और विभिन्न प्रतियोगिताओं को बढ़ावा दिया जा सकता है।
प्रोफेसर डॉ. सपना मालविया ने बताया कि यूनिवर्सिटी में AI के उपयोग को केवल इंजीनियरिंग तक सीमित नहीं रखा जा रहा है। एजुकेशन, लॉ, मैनेजमेंट और अन्य क्षेत्रों में भी AI के इस्तेमाल पर काम किया जा रहा है।
2030 नहीं, 2040-50 के भारत की नींव तैयार होगी
विशेषज्ञ डॉ. इरा बपना ने कहा कि जब हम 2030 की शिक्षा की कल्पना कर रहे हैं, तब वास्तव में 2040 और 2050 के भारत की नींव रख रहे हैं। विद्यार्थियों को सिर्फ परीक्षा और अंकों तक सीमित रखने के बजाय उन्हें नए विषयों और क्षेत्रों का एक्सपोजर देना होगा।
डॉ. विशाल मेहता ने कहा कि भविष्य की शिक्षा में Connect, Learn, Inspire और Grow जैसे मूल सिद्धांत महत्वपूर्ण होंगे। अनुभव आधारित शिक्षा, तकनीक आधारित कक्षाएं, वास्तविक जीवन की समस्याओं पर काम और प्रोजेक्ट-बेस्ड लर्निंग को बढ़ावा देना होगा।
सम एनल इकबाल ने कहा कि शिक्षकों की भूमिका भी बदलनी होगी। शिक्षक विद्यार्थियों पर अपना ज्ञान थोपने के बजाय उन्हें समझें, उनके सवालों को प्रोत्साहित करें और खुद भी लगातार सीखते रहें।
संवाद का उद्देश्य साझा दृष्टिकोण तैयार करना
विशेषज्ञ अंकिता हेमनानी ने बताया कि संवाद का उद्देश्य शिक्षा के भविष्य को लेकर साझा दृष्टिकोण तैयार करना और 2030 के विद्यार्थियों को भविष्य की जरूरतों के अनुरूप तैयार करने के लिए सामूहिक प्रयासों को बढ़ावा देना रहा।
कार्यक्रम में डॉ. नियति चेलावत, FICCI FLO की चेयरपर्सन वंदना गुजराती, समीक्षा खत्री, राकेश खत्री, ईशा सेठ और कुलदीप पुरोहित आदि मौजूद रहे।