August 26, 2026

भारत में नेपाल जैसी तबाही को उफन रहीं 88 झीलें: खतरे में 6 प्रदेश, 'ग्लेशियर लेक' अचानक कैसे फट जाती हैं

26 अगस्त की सुबह 9 बजे। तिब्बत से सटे नेपाल के रसुवा जिले की भोटेकोशी नदी में अचानक तेज बाढ़ आ गई। कुछ ही मिनटों में सड़कें, इमारतें, गांव बह गए। सैकड़ों लोग लापता हैं, जिनमें भारत-अमेरिका समेत 26 देशों के नागरिक शामिल हैं। रात 9 बजे तक 95 मौतों की प

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शुरुआती आकलन के मुताबिक, तबाही की वजह ‘ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ यानी GLOF है। करीब एक साल पहले, जुलाई 2025 में भी इसी इलाके में तिब्बत की एक ग्लेशियर झील तापमान बढ़ने से फट गई थी, जिसमें 9 लोगों की जान गई थी। ये एक पैटर्न-सा बनता जा रहा है। GLOF की जद में भारत के भी कई इलाके हैं।

5 गुना बढ़ गईं ग्लेशियर झीलें, खतरे में भारत के 6 प्रदेश

IIT रोपड़ और सिडनी की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी ने एक साझा स्टडी की। इसी महीने जारी रिपोर्ट के मुताबिक, हिमाचल प्रदेश में 1990 में सिर्फ 107 ग्लेशियर झीलें थीं। 2024 तक यह संख्या बढ़कर 669 हो गई, यानी 525% की बढ़ोत्तरी।

669 में से 88 झीलों पर नेपाल जैसी ‘ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ का खतरा मंडरा रहा है। 9 झीलों को ‘बेहद ज्यादा खतरनाक’, 18 को ‘ज्यादा खतरनाक’ और 26 को ‘मध्यम खतरनाक’ श्रेणी में रखा गया है।

रिसर्चर्स ने दो झीलों पर खास मॉडलिंग की- ब्यास बेसिन की हिमसू झील और सतलुज बेसिन की एक बेनाम झील।

अगर ब्यास झील का नेचुरल डैम टूट जाए, तो 1,385 क्यूबिक मीटर प्रति सेकेंड की बाढ़ आएगी। यानी हर सेकेंड करीब 14 लाख लीटर पानी बहेगा। इससे हर सेकेंड ओलंपिक साइज के 6 स्विमिंग पूल भरे जा सकते हैं।

इसी तरह सतलुज झील से 3,507 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड पानी का सैलाब आएगा। यानी हर सेकेंड करीब 35 लाख लीटर पानी बहेगा। इससे डैम और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट समेत 588 इमारतों को खतरा है।

हिमालय का बढ़ता तामपान इस खतरे को और बढ़ा रहा है। जुलाई 2026 में आई IIT खड़गपुर की एक स्टडी बताती है कि ऊंचाई वाले इलाकों का तापमान पिछले 20 सालों में करीब 1 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है। वैज्ञानिकों की चेतावनी है कि इससे ग्लेशियर पिघलने और नदियों के बहाव में बड़ा बदलाव आ सकता है।

ग्लेशियर झीलें अचानक कैसे फट जाती हैं?

पहाड़ों पर ऊंचाई पर मौजूद ग्लेशियर जब पिघलते हैं, तो उनका पानी आसपास के निचले इलाके या किसी चट्टानी दीवार के सहारे इकट्ठा होने लगता है। ये धीरे-धीरे एक झील का रूप ले लेता है, जिसे ‘ग्लेशियल लेक’ कहते हैं। ये झील ग्लेशियर के सामने या उसकी निचली सतह पर भी बन सकती है।

इन झीलों को बर्फ, पहाड़ का मलबा या चट्टान की एक नैचुरल दीवार यानी 'डैम' रोककर रखती है। जब ये दीवार किसी वजह से अचानक टूट जाती है, तो झील में जमा लाखों-करोड़ों क्यूबिक मीटर पानी बहुत तेज रफ्तार से बेकाबू होकर नीचे की तरफ बहता है। इसी को ‘ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड, GLOF या ग्लेशियर की झील फटना कहते हैं।

GLOF में पानी के बहाव की रफ्तार आम बारिश से आई बाढ़ के मुकाबले कई गुना ज्यादा होती है, जिससे यह रास्ते में आने वाली हर चीज को बहुत तेजी से काटती-छांटती और बहाती चली जाती है।

नेपाल-तिब्बत बॉर्डर पर तिब्बत के रसुवागढ़ी बॉर्डर पॉइंट पर CCTV कैमरे में बाढ़ का भयावह दृश्य कैद हुआ। यहीं से बाढ़ नेपाल में घुसी।

नेपाल-तिब्बत बॉर्डर पर तिब्बत के रसुवागढ़ी बॉर्डर पॉइंट पर CCTV कैमरे में बाढ़ का भयावह दृश्य कैद हुआ। यहीं से बाढ़ नेपाल में घुसी।

ग्लेशियर झील 3 वजहों से फट सकती हैं…

1. ग्लोबल वार्मिंग से ग्लेशियर का तेजी से पिघलना

  • ग्लोबल वार्मिंग के चलते मैदानी इलाकों के मुकाबले ऊंचे पहाड़ों का तापमान हर साल ज्यादा बढ़ रहा है. इससे ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इससे नई झीलें बनती हैं और पुरानी झीलें और बड़ी हो जाती हैं।
  • साइंस मैगजीन 'नेचर' की रिपोर्ट के मुताबिक, अगर तापमान इसी तरह बढ़ता रहा, तो अगले करीब 70 सालों में हिमालय-काराकोरम इलाके की करीब 65% बर्फ खत्म हो सकती है, जिससे झीलों की संख्या और साइज दोनों बढ़ेंगे।

2. बर्फ या चट्टान का झील में गिरना

  • भूस्खलन या हिमस्खलन, यानी पहाड़ का चट्टानी या मिट्टी वाला हिस्सा या फिर कोई बड़ा बर्फ का टुकड़ा सीधे झील में गिर जाए, तो झील में एक बड़ी लहर बनती है और झील का नेचुरल ठहराव टूट जाता है।
  • नेचर मैगजीन की एक स्टडी के मुताबिक, हिमालय-काराकोरम इलाके में अब तक दर्ज 388 से ज्यादा GLOF मामलों में हिमस्खलन को सबसे आम वजह माना गया है।

3. भारी बारिश से झील का ओवरफ्लो होना

  • कई बार भारी बारिश के चलते झील का पानी बढ़ता है और उसका नेचुअल डैम टूट जाता है। पिछले साल जुलाई में भी भोटेकोशी नदी में बाढ़ आने के पीछे यही वजह थी। बारिश के चलते इस झील में पानी जमा हो गया, जबकि 3 महीने पहले तक इस झील का नामोनिशान तक नहीं था।
  • इसके अलावा भूकंप, पहाड़ी इलाकों में खनन, पेड़ों की कटाई और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट वगैरह के चलते झील के इलाके की स्थिरता बिगड़ सकती है और झील का बांध टूट सकता है।

GLOF की तबाही कैसे रोकी जा सकती है?

नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी, NDMA और नेशनल GLOF रिस्क मिटिगेशन प्रोग्राम के मुताबिक,

  • सैटेलाइट इमेजरी, फील्ड सर्वे और पुराने रिकॉर्ड से खतरनाक झीलों को पहचानने की जरूरत है। इसके लिए ISRO भी निगरानी करता है।
  • खतरनाक झीलों में रडार, सेंसर जैसी तकनीकों के जरिए पानी के लेवल और बांध की मजबूती में बदलाव का जल्दी पता लगाया जा सकता है।
  • कंट्रोल्ड तरीके से कृत्रिम नाली बनाकर खतरनाक झीलों का पानी कम किया जा सकता है। इससे झील के अचानक टूटने का खतरा घटता है।इसके अलावा पहाड़ी इलाकों में इन्फ्रास्ट्रक्चर एक्टिविटी कम करने की जरूरत है। मुख्य कॉज, यानी ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए इंटरनेशनल लेवल पर कई कोशिशें हो रही हैं, लेकिन इनका कोई खास असर नजर नहीं आता।

क्या नेपाल की बाढ़ से भारत में फौरन कोई खतरा?

  • भोटेकोशी नेपाल के उत्तरी हिस्से में चीन-तिब्बत सीमा से निकलने वाली हिमालयी नदी है। यह सिंधुपालचोक क्षेत्र से होकर बहती है।
  • यह नीचे उतरते हुए सुनकोशी, सप्तकोशी नदी में मिलती है। नेपाल के हनुमान नगर के पास भीमनगर बराज से बिहार में प्रवेश करती है। यह सुपौल जिले के बीरपुर के पास है। तब इसका नाम कोसी नदी हो जाता है। जिसे बिहार में शोक की नदी कहा जाता है।
  • यह आगे चलकर कटिहार के कुरसेला के पास गंगा में मिलती है। कोसी में कमला और बागमती नदी का पानी भी मिलता है।

इसलिए भोटेकोशी में अधिक पानी आने पर उसका पानी सुनकोशी और फिर कोसी नदी तंत्र में शामिल हो सकता है। इससे सुपौल, सहरसा, मधेपुरा और खगड़िया जिले काफी प्रभावित हो सकते हैं।

2008 में नेपाल के कुसहा में कोसी नदी का तटबंध टूट गया था। इसके बाद कोसी नदी अपने नए/प्राकृतिक रास्ते को छोड़कर सैकड़ों साल पुराने पूर्व की ओर वाले रास्ते पर बहने लगी।

इससे अचानक नदी का रुख घनी आबादी और नए इलाकों की तरफ मुड़ गया, जिससे बिहार के 34 लाख से अधिक लोग बिना किसी पूर्व चेतावनी के भीषण बाढ़ की चपेट में आ गए।

हालांकि, इस बार रसुवा में लैंडस्लाइड, भूस्खलन या हिम झील टूटने से अचानक नदी में भारी मात्रा में पानी आ गया है। लेकिन नदी ने अपना रास्ता नहीं बदला है। वह अपने तय रास्ते पर बह रही है। इस कारण एक्सपर्ट तटबंध टूटने की संभावना व्यक्त नहीं कर रहे हैं।

पानी के भारी दबाव और संभावित बढ़ोतरी को देखते हुए पश्चिमी चंपारण के वाल्मीकिनगर गंडक बैराज के सभी 36 फाटक खोल दिए गए हैं। बिहार के 8 जिलों में हाईअलर्ट जारी किया गया है। ये जिले पश्चिमी चंपारण (बगहा), पूर्वी चंपारण (मोतिहारी), गोपालगंज, सारण, मुजफ्फरपुर, वैशाली, सीतामढ़ी और शिवहर हैं।

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