यह वो बांग्लादेश नहीं…निष्कासन के बाद पहली बार सामने आईं शेख हसीना, मंच पर रोते हुए कही यह बड़ी बात
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Written By:
अर्पित शुक्ला
Updated On: Aug 05, 2026 | 07:38 PM IST
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सार
Sheikh Hasina: बांग्लादेश की पूर्व पीएम शेख हसीना ने निष्कासन के बाद पहली बार रोते हुए अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि यह वो बांग्लादेश नहीं है जिसके लिए लाखों लोगों ने शहादत दी थी।

शेख हसीना (Image- Social Media)
विस्तार
Sheikh Hasina Speech: बांग्लादेश से निष्कासन के बाद पहली बार सार्वजनिक तौर पर सामने आईं बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने खुलकर अपनी बात रखी। इस दौरान वो इमोशनल हो गईं और अपने परिवार के सदस्यों को याद कर मंच पर रोने लगीं। उन्होंने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया. इस दौरान उन्होंने कहा कि ये वो बांग्लादेश नहीं है, जिसके लिए दी लाखों शहादत दी गई।
नई दिल्ली में शेख हसीना ने 5 अगस्त को प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कहा, ‘पिछले कुछ सालों में बांग्लादेश के अंदर डर हर जगह घुस गया है। ये वो बांग्लदेश नहीं है जिसके लिए लाखों लोगों ने शहादत दी थी। कुछ सालों कुछ संगठन काम कर रहे थे कि छात्रों की मांगों को हिंसा में कैसे बदला जाए। ऑर्गेनाइज्ड ग्रुप ने इसको हिंसा और सत्ता परिवर्तन के लिए इस्तेमाल किया।’
मुझे पता है वो मुझे मार सकते हैं लेकिन फिर भी जाऊंगी
शेख हसीना ने कहा कि 1981 में जब मैं बांग्लादेश लौटी थी तब भी उन्होंने मुझे रोकने की कोशिश की। वापसी के बाद मुझे कई बार गिरफ्तार किया गया। लेकिन मैं वतन वापसी से नहीं रुकी। मुझे अपने भविष्य की चिंता नहीं है, मुझे बांग्लादेश के भविष्य की चिंता है। मुझे पता है कि बांग्लादेश जाने पर वह मुझे गिरफ्तार कर सकते हैं, मार सकते हैं या जेल में डाल सकते हैं, लेकिन मैं वापस जरूर जाऊंगी।
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वह एक ऑर्गेनाइज्ड प्रोटेस्ट था
बांग्लादेश में हुए प्रदर्शन पर बोलते हुए शेख हसीना ने कहा कि पिछले दो सालों से, मैंने अपने प्यारे बांग्लादेश को मुश्किलों से गुजरते देखा है। यह वह बांग्लादेश नहीं है जिसे हमने बनाया था, यह वह बांग्लादेश नहीं है जिसके लिए 1971 में 30 लाख लोगों ने अपनी जान दी थी। मैं जुलाई और अगस्त 2024 की सच्चाई से अपनी बात शुरू करना चाहती हूं।
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उन्होंने कहा कि यह छात्रों का कोई शांतिपूर्ण आंदोलन नहीं था। शुरू से ही, मेरी सरकार ने बातचीत, कानूनी प्रक्रिया और धैर्य से इस मुद्दे को शांति से सुलझाने की कोशिश की। लेकिन सुधार की बात की आड़ में, कुछ संगठित समूह छात्रों की माँगों को हिंसक राजनीतिक हथियार में बदलने की कोशिश कर रहे थे।
