September 24, 2026

यमुना में गणेश विसर्जन पर रोक, दिल्ली में 81 कृत्रिम कुंड तैयार, रेखा गुप्ता सरकार की पहल

By Oneindia Staff

Time Published: Thursday, September 24, 2026, 18:43 [IST]

गणेश विसर्जन को लेकर दिल्ली में इस बार व्यवस्था बदल गई है। यमुना या किसी दूसरे प्राकृतिक जलस्रोत में सीधे मूर्ति विसर्जन नहीं किया जा सकेगा। श्रद्धालुओं के लिए राजधानी के अलग-अलग इलाकों में 81 कृत्रिम विसर्जन कुंड तैयार किए गए हैं। ये कुंड दिल्ली के सभी 13 राजस्व जिलों में बनाए गए हैं।

सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण विभाग को इनकी खुदाई और बाकी जरूरी काम की जिम्मेदारी दी गई थी, जिसे पूरा कर लिया गया है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने इसकी जानकारी सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए दी है।

Ganesh Visarjan

यमुना में विसर्जन क्यों रोका गया?

दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति यानी डीपीसीसी ने 9 सितंबर को मूर्ति विसर्जन को लेकर नए निर्देश जारी किए थे। इसमें यमुना और दूसरे जलस्रोतों में विसर्जन पर रोक लगाई गई है। सिर्फ स्थानीय निकाय या प्रशासन की तरफ से तय किए गए स्थानों पर ही मूर्ति विसर्जित की जा सकती है। नियम तोड़ने पर 50 हजार रुपये तक पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति लग सकती है।

इसका सीधा मतलब है कि गणपति की मूर्ति लेकर यमुना घाट पहुंचने के बजाय श्रद्धालुओं को तय कृत्रिम कुंडों का इस्तेमाल करना होगा। इस बार अनंत चतुर्दशी 25 सितंबर, शुक्रवार को है। हालांकि जिन घरों या पंडालों में गणपति की स्थापना कम दिनों के लिए हुई है, वहां विसर्जन इससे पहले भी हो सकता है।

दिल्ली के किस जिले में सबसे ज्यादा कुंड?

81 कुंडों में सबसे ज्यादा 15 पूर्वी दिल्ली में बनाए गए हैं। इसके बाद उत्तर-पूर्वी दिल्ली में 9 और दक्षिणी दिल्ली में 8 कुंड हैं। दक्षिण-पश्चिम, दक्षिण-पूर्व और बाहरी उत्तर जिले में 7-7 कुंड रखे गए हैं। पश्चिम और उत्तर-पश्चिम में 6-6, जबकि उत्तर जिले में 5 कुंड हैं।

नई दिल्ली, मध्य और मध्य-उत्तर जिले में 3-3 कुंड हैं। पुराने दिल्ली जिले में 2 कुंड बनाए गए हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि 81 का आंकड़ा कुंडों का है, अलग-अलग जगहों का नहीं। एक ही स्थान पर एक से ज्यादा कुंड भी हो सकते हैं। शास्त्री नगर मेट्रो स्टेशन के पास गोपाल मलिक पार्क में दो कुंड सूचीबद्ध हैं।

मयूर विहार से नरेला तक, इन इलाकों में इंतजाम

पूर्वी दिल्ली में मयूर विहार, त्रिलोकपुरी, आईपी एक्सटेंशन, गाजीपुर, कोंडली और कड़कड़डूमा जैसे इलाके शामिल हैं। दक्षिणी दिल्ली में आया नगर, जोनापुर, अस्थल मंदिर, आस्था कुंज, बेगमपुर और वसंत कुंज में व्यवस्था की गई है।

दक्षिण-पश्चिम दिल्ली में द्वारका और दीनपुर शामिल हैं। उत्तर-पश्चिम में किराड़ी, सुल्तानपुरी, रोहिणी, निहाल विहार और मंगोलपुरी जैसे इलाके हैं। बाहरी उत्तर दिल्ली में मुंडका, टिकरी कलां, बवाना और नरेला को सूची में रखा गया है।

प्रशासन ने सिर्फ विसर्जन की जगह तैयार करने तक व्यवस्था सीमित नहीं रखी है। इन स्थानों पर भीड़ और यातायात प्रबंधन, पीने का पानी, एंबुलेंस, अग्निशमन, सुरक्षा, सफाई, रोशनी और बिजली जैसी सुविधाओं की तैयारी की गई है। विसर्जन के बाद कुंडों की सफाई और मूर्ति अवशेष हटाने की व्यवस्था भी इसमें शामिल है। 15 सितंबर को हुई अंतर-विभागीय बैठक में इन तैयारियों की समीक्षा की गई। राजस्व विभाग के साथ नगर निकाय, पुलिस, ट्रैफिक पुलिस, दमकल, स्वास्थ्य विभाग और बिजली से जुड़ी एजेंसियां भी इसमें शामिल रहीं।

मिट्टी की मूर्ति क्यों बेहतर मानी जा रही है?

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड यानी सीपीसीबी की गाइडलाइन में प्राकृतिक मिट्टी और जैव-अवक्रमणीय सामग्री से बनी मूर्तियों को बढ़ावा देने की बात कही गई है। प्लास्टर ऑफ पेरिस और सिंथेटिक रंगों से बचने की सलाह दी गई है। कृत्रिम कुंड, कचरे को अलग जमा करना और विसर्जन के बाद सफाई भी इन दिशा-निर्देशों का हिस्सा है।

दिल्ली में भी मूर्ति बनाने और बेचने वालों से प्राकृतिक मिट्टी, जैव-अवक्रमणीय सामग्री और प्राकृतिक रंग इस्तेमाल करने को कहा गया है। मकसद यही है कि धार्मिक आयोजन के साथ यमुना और दूसरे जलस्रोतों पर प्रदूषण का दबाव कम हो।

ऐसी व्यवस्था दिल्ली में पहले भी हो चुकी है। 2019 में भी यमुना में मूर्ति विसर्जन पर रोक के दौरान गणेश चतुर्थी और दुर्गा पूजा के लिए तय स्थानों पर अस्थायी कुंड बनाए गए थे। डीपीसीसी के पुराने रिकॉर्ड में भी कृत्रिम कुंडों से जुड़े निर्देश और सूची दर्ज हैं। इस बार भी प्रशासन का फोकस यही है कि श्रद्धालुओं की धार्मिक परंपरा जारी रहे, लेकिन मूर्ति और पूजा सामग्री सीधे प्राकृतिक जलस्रोतों में न पहुंचे। यानी गणेश विसर्जन होगा, लेकिन तय जगह पर और तय तरीके से।