October 10, 2026

बिहार में 80 लाख ग्रेजुएट, वोटर सिर्फ 5 लाख: MLC चुनाव में वोटर कम क्यों, मतदान कैसे, 7 सवालों के जवाब में जानिए सभी जरूरी बातें - Bihar News

बिहार विधान परिषद की 8 सीटों पर चुनाव हो रहे हैं। पटना स्नातक सीट पर जदयू के दो नेताओं विधायक अनंत सिंह और MLC नीरज कुमार के बीच टक्कर के चलते इस चुनाव की चर्चा अधिक है। नहीं तो, MLC चुनाव बिना खास राजनीतिक गर्माहट के संपन्न हो जाते थे।

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MLC चुनाव को लेकर आम लोगों में उदासीनता देखी जाती है। इसे स्नातक सीट के लिए वोटर की संख्या से समझ सकते हैं। 2023 के जाति सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार में करीब 80 लाख स्नातक हैं। राज्य में स्नातक सीट 6 हैं। इनमें से 4 पर चुनाव हो रहे हैं। वोटर मात्र 4,92,594 हैं।

MLC चुनाव को लेकर लोगों में उदासीनता क्यों है? वोटिंग किस तरह होती है? क्यों वोट रद्द हो जाते हैं? 7 सवालों के जवाब में विधान परिषद चुनाव की सभी जरूरी बातें जानिए…

सवाल 1- MLC चुनाव के लिए उदासनीता क्यों है? जवाब: लोगों में विधान परिषद चुनाव को लेकर जानकारी की कमी है। बहुत सारे लोगों को पता नहीं कि शिक्षक, स्नातक, स्थानीय निकायों जैसी अलग-अलग निर्वाचन कैटेगरी के लिए अलग-अलग मतदाता सूची हो सकती है।

इसमें ज्यादतर वोटर प्रत्याशी द्वारा या कहें जागरुक नेताओं द्वारा बनवाए जा रहे हैं। ऑनलाइन भी वोटर बनने की सुविधा है। जब-जब चुनाव होता है तब-तब वोटर बनने का आवेदन भरना होता है। एक बार वोटर बनने से आप हमेशा के लिए वोटर नहीं रह पाते हैं।

विधानसभा चुनाव में वोटर लिस्ट के आधार पर वोट दिए जाते हैं। दूसरी तरफ एमएलसी चुनाव में अलग-अलग कैटेगरी के लिए अलग-अलग पात्रता और रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया होती है।

विधानसभा चुनाव में लोगों को लगता है कि वे अपना विधायक अपने वोट से चुनने निकले हैं। इसमें 18 वर्ष से ऊपर के सभी लोग वोटर बनते हैं। विधायकों की संख्या बल के हिसाब से मुख्यमंत्री चुने जाते हैं।

यानी लोगों के दिमाग में पार्टी, विधायक और मुख्यमंत्री सब एक साथ होता है। लेकिन एमएलसी चुनाव में लोग तय ही नहीं कर पाते कि वोट देने से उन्हें क्या फायदा होगा। शिक्षक निर्वाचन में तो शिक्षक अपना हित देखते हैं, लेकिन स्नातक चुनाव में लोगों को अपना लाभ नहीं दिखता।

सवाल 2- MLC चुनाव के लिए वोटिंग कैसे होती है?

जवाब: विधानसभा या लोकसभा चुनाव की तरह MLC चुनाव में EVM से वोट नहीं डाले जाते। वोटिंग बैलेट पेपर से होती है। वोटर को बैलेट पेपर पर अपने पसंद के उम्मीदवार के लिए प्राथमिकता क्रमांक लिखना होता है।

बैलेट पेपर पर उम्मादवारों के नाम होते हैं। इसमें से जो उम्मीदवार आपको सबसे ज्यादा पसंद हो उसके सामने 1 लिखते हैं। आगे आप चाहें तो दूसरे उम्मीदवारों के सामने 2 और तीसरे उम्मीदवार के सामने 3 लिख सकते हैं। सिर्फ 1 लिखना भी मान्य होगा।

सवाल-3ः वोट रद्द क्यों होते हैं?

जवाब: आप प्राथमिकता में जिसको वोट देना चाहते हैं इसके आगे अंक में (1) लिखना है। आपने शब्द में (एक) लिख दिया तो वोट रद्द हो जाएगा।

प्राथमिकता में अंक की जगह प्रत्याशी का नाम लिख दिया तो वोट रद्द हो जाएगा।

प्रिंगर प्रिंट लगा दिया तो वोट रद्द हो जाएगा।

प्राथमिकता में एक ही प्राथमिकता वाला नंबर जैसे कि 1 किसी और प्रत्याशी के आगे भी लिख दिया तो वोट रद्द हो जाएगा। एक ही प्रीफरेंस आपने दूसरे अन्य को भी दे दिया तो वोट रद्द हो जाएगा।

सवाल-4ः MLC चुनाव में वोटर कौन होते हैं?

जवाब: सिलसिलेवार तरीक से जानिए…

  • स्नातक निर्वाचन क्षेत्र: वोटर का स्नातक पास होना जरूरी है। एपीयरिंग स्नातक उम्मीदवार वोटर नहीं होंगे। तीन वर्ष पहले स्नातक पास किया हो तभी वोटर होंगे।
  • शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र: वोटर का शिक्षक होना जरूरी है।
  • स्थानीय प्राधिकार निर्वाचन क्षेत्र: वोटर का नगर निकाय या स्थानीय प्राधिकों से निर्वाचित सदस्य होना जरूरी है। जैसे कि वार्ड पार्षद, मुखिया, सरपंच, जिला परिषद सदस्य आदि।
  • विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र: राज्य के विधायक वोट दे सकते हैं।
  • राज्यपाल से मनोनीत: लोग वोट नहीं देते, राज्यपाल विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े 12 लोगों को मनोनीत करते हैं।

सवाल 5- किस कोटे से कितने MLC चुने जाते हैं?

जवाब: बिहार विधान परिषद में कुल 75 सदस्य होते हैं। इन्हें 5 तरह से चुना जाता है।

सवाल 6- MLC चुनाव के नतीजे कैसे आते हैं?

जवाब: एक वोटर एक से अधिक उम्मीदवार को पहली, दूसरी, तीसरी वरीयता का वोट दे सकते हैं। पहली वरीयता के एक वोट को एक वोट गिना जाता है। दूसरी वरीयता के दो वोट को एक गिना जाता है।

विजेता की घोषणा तब होती है जब किसी उम्मीदवार को डाले गए वोटों में से 50% से अधिक वोट मिल जाए। पहले पहली वरीयता के वोटों की गिनती होती है। एक उम्मीदवार को 50 फीसदी से एक वोट ज्यादा मिल जाए तो उसे विजयी घोषित कर दिया जाता है।

अगर किसी उम्मीदवार को 50 फीसदी से अधिक पहली वरीयता के वोट नहीं मिले तो एलिमिनेशन राउंड शुरू किया जाता है। इसमें सबसे कम पहली वरीयता वोट पाने वाले उम्मीदवार को गणना से बाहर किया जाता है। उसे मिले वोट पर दूसरी वरीयता के मतों को गिनकर उसकी वैल्यू निकाली जाती है। उसे बचे हुए कैंडिडेट में जोड़ा जाता है।

अगर दूसरी वरीयता के वोटों की गितनी में एक उम्मीदवार को 50% से अधिक वोट नहीं मिले तो तीसरी वरीयता के वोटों की गिनती होती है। यह प्रक्रिया तब तक चलायी जाती है जब तक किसी एक उम्मीदवार को 50 परसेंट प्लस वन न मिल जाए। जिसे इतने वोट मिलते हैं उसे विजेता घोषित किया जाता है।

जैसे- अगर किसी सीट पर A, B, C और D प्रत्याशी हैं। इनमें से अगर किसी एक प्रत्याशी को प्रथम वरीयता के 50 फीसदी से ज्यादा वोट नहीं आए तो दूसरी वरीयता के वोटों की गिनती होगी।

इसमें प्रथम वरीयता के सबसे कम वोट लाने वाले प्रत्याशी को रेस से बाहर कर दिया जाएगा। उसे मिले दूसरी वरीयता के वोट को बाकी बचे प्रत्याशियों में बांट दिया जाएगा। यह प्रक्रिया तब तक चलेगी जबतक जीत के लिए जरूरी वोट किसी को न मिल जाए। आखिर में बचे दो प्रत्याशियों में भी यदि किसी को जरूरी वोट नहीं मिले तो चुनाव आयोग ज्यादा वोट लाने वाले को विजेता घोषित कर देगा।

सभी पार्टियां MLC चुनाव के प्रचार में जुट गई है। तस्वीर 10 अक्टूबर की है। निशांत कुमार और संजय झा दरभंगा में अपने प्रत्याशी के समर्थन में सभा कर रहे हैं।

सभी पार्टियां MLC चुनाव के प्रचार में जुट गई है। तस्वीर 10 अक्टूबर की है। निशांत कुमार और संजय झा दरभंगा में अपने प्रत्याशी के समर्थन में सभा कर रहे हैं।

सवाल 7- MLA और MLC में क्या अंतर है?

जवाब: MLA विधानसभा के सदस्य होते हैं। वहीं, MLC विधान परिषद के सदस्य होते हैं।

विधायक को आम जनता द्वारा सीधे मतदान के माध्यम से चुना जाता है। विधान परिषद सदस्य का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से होता है।

MLA बनने के लिए कम से कम 25 साल उम्र होनी चाहिए। विधान परिषद सदस्य बनने के लिए 30 साल का होना जरूरी है।

विधायक का कार्यकाल 5 साल का होता है। विधानसभा भंग हो सकती है। इसके साथ ही विधायक का कार्यकाल खत्म हो जाता है। MLC का कार्यकाल 6 साल का होता है। यह भंग नहीं होता। इसके लगभग एक-तिहाई सदस्य का कार्यकाल हर 2 साल में पूरा होता है। इनके लिए चुनाव कराए जाते हैं।

वित्त विधेयक और सरकार बनाने में विधायकों की निर्णायक भूमिका होती है। विधान परिषद की भूमिका मुख्य रूप से समीक्षात्मक और सलाहकार वाली होती है।

हाल में किन दो युवा नेताओं की वजह से MLC होना चर्चा में रहा

बिहार विधान परिषद बिहार की राजनीति के दो बड़े नेताओं नीतीश कुमार और उपेंद्र कुशवाहा के परिवादवाद और राजनीतिक लोभ-लाभ का गवाह बना। नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार और उपेंद्र कुशवाहा के पुत्र दीपक प्रकाश को पहले मंत्री बनाया गया और उसके बाद एमएलसी।

जेडीयू ने 2026 के द्विवार्षिक चुनाव में निशांत कुमार को पटना सीट से उम्मीदवार बनाया। वह निर्विरोध निर्वाचित हुए। दीपक प्रकाश के लिए बीजेपी के एमएलसी देवेश कुमार ने इस्तीफा दिया। देवेश को बिहार राज्य योजना पर्षद में उपाध्यक्ष नियुक्त कर एडजस्ट किया गया।

राजनेताओं की शरण स्थली है विधान परिषद

  • पॉलिटिकल एक्सपर्ट प्रवीण बागी कहते हैं कि विधान परिषद नेताओं की शरण स्थली है। नीतीश कुमार जैसे नेता वर्षों तक इसके सदस्य रहे। अभी विधान परिषद का चुनाव हो रहा है। इसमें चुनाव आयोग पहल करके वोटर नहीं बनाता। उम्मीदवार ही एक्टिव होकर वोटर बनवाते हैं।
  • उन्होंने कहा, ‘MLC को सुख- सुविधाएं, वेतन-भत्ता, पेंशन विधायक की तरह मिलते हैं। इस चुनाव के लिए पार्टी का सिंबल नहीं मिलता है। ऐसा इसलिए कि MLC दलीय प्रतिबद्धता से ऊपर उठकर काम करें।’