विदिशा/पथरिया27 मिनट पहले
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आम तौर पर भारतीय समाज में शादी के बाद बेटियां अपना घर छोड़कर ससुराल जाती हैं, लेकिन मध्य प्रदेश के विदिशा जिले का एक छोटा सा गांव इस पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था को सीधी चुनौती दे रहा है। सिरोंज जनपद से महज 8 किलोमीटर दूर स्थित भटौली गांव आज पूरे क्षेत्र में एक अनोखी परंपरा पेश कर रहा है।
करीब 650 की आबादी और 100 परिवारों वाले इस गांव को यदि “घर जमाइयों का गांव” कहा जाए, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। यहां के लगभग 80 प्रतिशत घरों की कमान दामादों के हाथों में है। दिलचस्प बात यह है कि यह कोई हाल-फिलहाल का बदलाव नहीं है, बल्कि कुछ परिवारों में तो घर जमाई बनने का यह सिलसिला लगातार तीन-तीन पीढ़ियों से बेधड़क चला आ रहा है।
पीढ़ियों से कायम है दामाद राज: बेटों की कमी और खेती की देखभाल बनी वजह
1. एक ही छत के नीचे तीन पीढ़ियों से दामादों का कब्जा गांव में ‘घर जमाई’ बनने की शुरुआत इकलोद (सिरोंज) निवासी बुद्धा चौकीदार से हुई थी। इसके बाद उनकी बेटी सुमित्रा बाई का विवाह गोविंदी (बासौदा) के गडरू से हुआ, वे भी यहीं बस गए। बात यहीं खत्म नहीं हुई; गडरू की बेटी केराबाई की शादी हीरालाल से हुई और वे भी भटौली में ही घर जमाई बन गए। इस तरह एक ही परिवार में लगातार 3 पीढ़ियों से दामाद ही घर-गृहस्थी सँभाल रहे हैं।
2. एक ही घर में दो-दो दामाद बने ‘घर जमाई’ नोघई (बासौदा) के मुंशीलाल रघुवंशी शादी के बाद भटौली आकर बस गए। उनकी दो बेटियां हुईं- रामश्री और आधार बाई। रामश्री का विवाह दीपनाखेड़ी के ओमकार सिंह से और आधार बाई का विवाह इकौदिया के लाल सिंह से हुआ। आज ये दोनों दामाद भी भटौली में ही एक साथ घर जमाई बनकर रह रहे हैं।
3. पूजा से लेकर खेती तक दामादों के हवाले:
थानरपुर के प्रभुलाल शर्मा दामाद बनकर भटौली आए थे। उनके दामाद रामबाबू शर्मा (पीकलोन, बासौदा) भी यहीं बस गए और वर्तमान में वे गांव के मुख्य मंदिर में पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों का जिम्मा संभाल रहे हैं।
4. जाति-समाज से परे, हर वर्ग में यही प्रथा
- सुलतानपुर से बीना तक: सुलतानपुर के भगवानसिंह भटौली में बसे, फिर उनकी बेटी का विवाह खिरिया (बीना) के गुलाब सिंह से हुआ और वे भी यहीं बस गए।
- कुशवाह परिवार: वीरपुर के रामचंद्र कुशवाह के बाद उनकी बेटी मेवा बाई से शादी कर परमलाल भी यहीं जमाई बन गए।
- आदिवासी परिवार: फूलसिंह आदिवासी के बाद उनके दामाद नारायण सिंह आदिवासी (सुगनिया) भी इसी गाँव की माटी में रच-बस गए।
- रघुवंशी परिवार: इकौदिया के श्यामलाल रघुवंशी भटौली में जमाई बने। उनके बेटे नारायण सिंह की चार बेटियों का विवाह छीपनी, सांकलखेड़ा, हिनोतिया और फतेहपुर जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में हुआ है।
क्यों बना भटौली ‘घर जमाइयों’ की पहली पसंद
स्थानीय बुजुर्गों का कहना है कि शुरुआती दौर में जिन परिवारों में बेटे नहीं थे, उन्होंने पैतृक संपत्ति, खेती-किसानी और बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल के लिए दामादों को गाँव में ही बसाने का फैसला लिया। धीरे-धीरे आपसी सहयोग की यह प्रथा इतनी सहज और सम्माननीय हो गई कि जमाइयों ने भी इसे खुशी-खुशी स्वीकार किया। आज भटौली अपनी इस अनूठी सामाजिक समरसता के लिए दूर-दूर तक पहचाना जाता है।
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