हिमाचल प्रदेश में सतलुज बेसिन में ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहे हैं। यह खुलासा हिमाचल प्रदेश काउंसिल फॉर साइंस, टेक्नोलॉजी एंड एनवायरनमेंट (HIMCOSTE) के स्टेट सेंटर ऑन क्लाइमेट चेंज (SCCC) की ताजा रिपोर्ट में हुआ है। स्टडी के अनुसार- पिछले 20 सालों में
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ग्लेशियरों का सिकुड़ना भविष्य के लिए खतरे की घंटी हो सकता है। इससे भविष्य में बिजली उत्पादन पर संकट मंडरा सकता है। खासकर भाखड़ा, नाथपा झाकड़ी और करछम वांगतू जैसी बड़े जलाशय वाली प्रोजेक्ट को नुकसान हो सकता है।
इसी तरह पिघलते ग्लेशियरों से ऊंचे पहाड़ों पर जगह जगह झीलें बन सकती है, ऐसी झीलों के टूटने पर नेपाल जैसी तबाही हो सकती है। इसका असर डाउनस्ट्रीम में सड़क, पुल, बिजली प्रोजेक्ट और दूसरे इनफ्रॉस्ट्रक्चर पर पड़ सकता है।

6.6% घटा ग्लेशियरों का क्षेत्रफल
रिपोर्ट के अनुसार- सतलुज बेसिन पर साल 20 सालों में ग्लेशियरों का कुल क्षेत्रफल 1481.75 वर्ग किलोमीटर से घटकर 1384.16 वर्ग किलोमीटर रह गया है। ग्लेशियर के क्षेत्रफल में लगभग 6.6% की कमी आई है।
78 फीसदी ग्लेशियर का मास बैलेंस नेगेटिव
स्टडी बताती है कि 1120 ग्लेशियरों के मास बैलेंस (ग्लेशियर में बर्फ की जितनी वृद्धि हुई, उससे ज्यादा बर्फ पिघल गई) में अंतर दिखाया गया है। साल 2020 में 875 ग्लेशियरों का मास बैलेंस निगेटिव पाया गया। इसका मतलब है कि इन ग्लेशियरों में बर्फ जितनी जमा हो रही है, उससे ज्यादा बर्फ पिघल रही है। यानी करीब 78% ग्लेशियर लगातार बर्फ खो रहे हैं।

कहां-कहां हो रहा ग्लेशियरों का नुकसान
SCCC के अनुसार- यह स्टडी सतलुज बेसिन पर स्पीति, बस्पा, अपर सतलुज और लोअर सतलुज पर की गई है। रिपोर्ट के अनुसार- चारों क्षेत्रों में ग्लेशियरों के क्षेत्रफल में कमी और सिकुड़ने वाली स्थिति सामने आई है। 20 साल में 1005 ग्लेशियर और ग्लेशियरलेट (छोटे ग्लेशियर) कम हुए है।
इनमें 800 ग्लेशियर का आकार 10 मीटर कम हुआ, जबकि 155 का क्षेत्रफल 10 से 20 मीटर, 44 ग्लेशियर का 20 से 40 मीटर और 6 का आकार 40 मीटर से ज्यादा कम हुआ है। कुछ ग्लेशियरों के सिकुड़ने की रफ्तार काफी ज्यादा मिली। स्पीति में एक ग्लेशियर के सिकुड़ने की दर 73.7 मीटर सालाना तक दर्ज की गई।
ग्लेशियरों की संख्या बढ़ी तो इसका मतलब ग्लेशियर बढ़े नहीं
रिपोर्ट में एक अहम बात यह भी सामने आई है कि कुछ जगह ग्लेशियरों की संख्या में इजाफा हुआ है। इसका मतलब यह नहीं कि नए ग्लेशियर बन रहे हैं, बल्कि बड़े ग्लेशियरों के छोटे-छोटे हिस्सों में टूटने और अलग होने से इनकी संख्या बढ़ी है।