Maa Dewri Temple Jharkhand: बिहार, उत्तरप्रदेश, ओडिशा और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से घिरे झारखंड की पहचान यहां के जंगल और पहाड़ हैं. प्रकृति से इसे अपने हाथों से संवारा है. जिधर भी नजर धुमाइए, यहां के हसीन मंजर आपके मन मोह लेंगे. यहां की आदिवासी लोक संस्कृति और लोक कलाएं इसे और विशिष्ट बनाती हैं. झारखंड हिन्दू धर्म पर्यटन स्थलों के लिए भी जाना जाता है. यहां अनेक ऐसे मंदिर हैं, जिनका पौराणिक महत्व है. ऐसी रोचक कथाएं इन मंदिरों से जुड़ी हैं, जिन्हें सुनकर आप दंग रह जाएंगे. ऐसा ही एक मंदिर है- दिऊड़ी मंदिर.
झारखंड में मां दुर्गा का यह मंदिर हर किसी की जुबान पर रहता है. मौका मिलते ही लोग इस मंदिर में जाकर पूजा-अर्चना करना नहीं भूलते हैं. कई क्रिकेटर, बॉलीवुड के सितारे भी समय-समय पर इस मंदिर में पूजा करने पहुंचते हैं. ऐसी मान्यता है कि यहां हर मानोकामनाएं पूरी होती हैं. यही वजह है कि झारखंड के अलावा अन्य प्रदेशों से भी लोग यहां दर्शन-पूजन के लिए समय-समय पर आते रहते हैं. यह मंदिर झारखंड विशेषकर रांची की पहचान बन चुका. यहां 16 भुजाओं वाली मां दुर्गा की करीब साढ़े तीन फुट ऊंची प्रतिमा है. जबकि अन्य मंदिरों में इतनी भुजाओं वाली प्रतिमा नहीं होती है. आठ या दस भुजाओं वाली प्रतिमा ही होती है.
रांची-टाटा राजमार्ग तमाड़ में स्थित मां दिऊड़ी मंदिर
रांची-टाटा राजमार्ग तमाड़ में स्थित मां दिऊड़ी मंदिर रांची जिले के अलावा पूरे झारखंड और देश के हर कोने से श्रद्धालु पूजा करने आते हैं. प्राचीन मंदिर का मुख्य आकर्षण मां देवी दुर्गा की 16 भुजाओं वाली 700 साल पुरानी मूर्ति है. इसे ‘सोलहभुजी देवी’ के नाम से जाना जाता है. मंदिर में भक्त की मनोकामना पूर्ण होने पर खीर या खिचड़ी का भोग लगाते है. हर दिन दोपहर बारह बजे माता रानी को भोग में खीर या खिचड़ी चढ़ाया जाता है. उसके बाद पुजारियों द्वारा महाआरती किया जाता है.
10 वीं से 12वीं शताब्दी के दौरान हुआ था मंदिर का निर्माण
मंदिर में प्रतिदिन सुबह पांच बजे, दोपहर बारह बजे, शाम छह बजे प्रतिदिन आरती किया जाता है. मंदिर में प्रतिदिन पण्डा, पाहन पुजारी मिलकर मां का अनुष्ठान, पूजा करते है. कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 10 वीं से 12वीं शताब्दी के दौरान हुआ था. कहा जाता है कि दिऊड़ी मंदिर तमाड़ राजा की कुलदेवी है. ऐसा माना जाता है कि मंदिर की दीवार और खंभे बलुआ पत्थर से बने हैं. पुराने मंदिर के ऊपर एक नई संरचना का निर्माण किया गया है. जिसमें कुछ गुंबद शामिल हैं जिन पर देवी-देवताओं की रंगीन छवियां उकेरी गई हैं. मंदिर प्रतिदिन सुबह 5 बजे से रात 8 बजे तक खुला रहता है. मां दिऊड़ी मंदिर रांची से लगभग 60 किमी दूर है और राष्ट्रीय राजमार्ग 33 पर स्थित है. मां दिऊड़ी मंदिर आने के लिए बसें और कैब उपलब्ध हैं.
महेंद्र सिंह धोनी अक्सर पहुंचते हैं मां के दरबार में
क्रिकेट के दुनिया के सबसे चमकते सितारे ‘माही’ यानी महेंद्र सिंह धोनी के रांची जाने पर यह माना जाता है कि वह मां दिऊड़ी के दर्शन अवश्य करते हैं. इसके अलावा, जब भी वह किसी क्रिकेट सीरीज के लिए निकलते थे, तो सोलहभुजी देवी मां के दरबार में अपनी हाजिरी लगाना नहीं भूलते थे. वर्ष 2011 में जब धोनी ने भारत को वर्ल्ड कप जितवाया, तब उन्होंने खेलने से पहले मां के दरबार में प्रार्थना की थी. जीतने के बाद जब वह रांची लौटे, तो सबसे पहले मां के दरबार में जाकर सिर झुकाया.
मंदिर को लेकर दो तरह की कहानियां प्रचलित
मंदिर को लेकर कई रोचक कहानियां प्रचलित हैं. दावा किया जाता है कि यह मंदिर करीब 700 वर्ष प्राचीन है. इसका निर्माण 10वीं से 12वीं शताब्दी के बीच का बताया जाता है. कहा जाता है कि इस मंदिर को निर्माण होते किसी ने नहीं देखा है. मंदिर के पुजारी की मानें तो एक रात एक भक्त को सपना आया. सुबह उठकर उसने जंगलों में मंदिर की खोज शुरू कर दी. काफी मेंहनत के बाद उसे घने जंगल के बीच एक मंदिर नजर आया. वह देखकर दंग रह गया. इसके बाद उसने ग्रामीणों को इस मंदिर की जानकारी दी.
इस मंदिर को लेकर एक दूसरी कथा भी प्रचलित है. कहा जाता है कि तब एक राजा हुआ करते थे. नाम था- केरा. वह युद्ध में हार कर घर लौट रहे थे. देवी उनके स्वपन में आईं. उन्होंने राजा से कहा-मेरा मंदिर निर्माण कराओ. इसके बाद राजा ने अपने कर्मचारियों को मंदिर निर्माण कराने का आदेश दिया. जब उन्होंने मंदिर का निर्माण कराया तो उनका राज्य दोबारा मिल गया.
ये भी पढ़ें: झारखंड के 100 सीएम स्कूलों को CBSE की मान्यता दिलाने की तैयारी तेज, DC को जारी कराने होंगे 5 सर्टिफिकेट