राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर ने नेशनल हाईवे-168 (NH-168) सिरोही बाइपास मामले में केंद्र और राज्य सरकार से जवाब मांगा है। यह याचिका पूर्व विधायक संयम लोढ़ा की ओर से एडवोकेट राजेश शाह ने दायर की थी। मामले की अगली सुनवाई 6 अगस्त को होगी।
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जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी और प्रवीर भटनागर की खंडपीठ जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है। याचिका में कहा गया है कि सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय द्वारा NH-168 के सिरोही बाइपास के लिए जिस एलाइनमेंट (विकल्प-4) को मंजूरी दी गई है, वह जनहित में नहीं है।

ये बाइपास जिसे लेकर याचिका दायर की गई है। इसमें मास्टर प्लान और एनएचआई द्वारा प्रस्तावित दोनों बाइपास के बारे में बताया गया है।
याचिकाकर्तमा का दावा- जिसे स्वीकृत किया, वह आबादी से गुजरता है
याचिकाकर्ता का दावा है कि राज्य सरकार द्वारा स्वीकृत सिरोही मास्टर प्लान-2031 में प्रस्तावित एलाइनमेंट (विकल्प-5) तकनीकी रूप से अधिक सही, सुरक्षित और कम लागत वाला है। याचिका में यह भी बताया कि स्वीकृत एलाइनमेंट आबादी वाले आवासीय और व्यावसायिक क्षेत्रों से होकर गुजरता है, जिससे भविष्य में दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ सकती है।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि विकल्प-5 न केवल कम लागत वाला है, बल्कि इससे प्रभावित होने वाले लोगों की संख्या भी कम होगी। इस संबंध में विभागीय अधिकारियों और केंद्रीय मंत्री को भी पहले वास्तविक तथ्यों से अवगत कराया गया था।
अधिकारियों द्वारा तैयार की गई तुलनात्मक रिपोर्ट में भी विकल्प-5 को बेहतर बताया गया था।
इसके बावजूद, मंत्रालय ने विकल्प-4 पर काम शुरू कर दिया है। इस पर बाइपास निर्माण पर 158 करोड़ रुपए और पूरे प्रोजेक्ट पर 303 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। जबकि विकल्प-5 में बाइपास पर केवल 83 करोड़ रुपए और पूरे प्रोजेक्ट पर 249 करोड़ रुपए की लागत आएगी।
6 अगस्त को होगी अगली सुनवाई
जनहित याचिका में राष्ट्रीय राजमार्ग मंत्रालय की एलाइनमेंट अप्रूवल कमेटी, राजस्थान के अतिरिक्त मुख्य सचिव (पीडब्ल्यूडी), जिला कलेक्टर सिरोही, प्रोजेक्ट डायरेक्टर नेशनल हाईवे, अधिशासी अभियंता (नेशनल हाईवे डिवीजन) पीडब्ल्यूडी पाली, उपखंड अधिकारी सिरोही और उपखंड अधिकारी रेवदर को पक्षकार बनाया गया है।
याचिका में कहा गया कि मास्टर प्लान केवल प्रशासनिक मार्गदर्शिका नहीं, बल्कि बाध्यकारी आधिकारिक दस्तावेज है। इसका पालन किया जाना आवश्यक है।