‘मेरी बुआ की बेटी को बेहद कम उम्र में गुटखे के कारण कैंसर हो गया था। इस घटना ने मुझे भीतर तक झकझोर कर रख दिया था। मुझे अहसास हुआ कि अज्ञानता और नशा किस तरह हंसते-खेलते परिवारों को तबाह कर देता है।’
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उसी दिन मैंने संकल्प लिया कि मैं डॉक्टर बनूंगा ताकि बीमारियों का इलाज करने के साथ-साथ अपनी नई पीढ़ी को नशा मुक्त जीवन और शिक्षा के प्रति जागरूक कर सकूं।
ये कहना है- नीट परीक्षा में 564 अंक और ऑल इंडिया रैंक 27157 व एससी कैटेगरी में 684 रैंक हासिल करने वाले सागर का। सागर कोटा के पास कैथून कस्बे के छोटे से गांव गोदल्याहेड़ी के रहने वाले हैं।
इनके पिता घर-घर जाकर कबाड़ बीनने का काम करते है। परिवार में पैसों की तंगी है। महज दो कमरों के छोटे से मकान में 5 लोगों का परिवार रहता है। इन सब चुनौतियों के बाद भी सागर ने नीट की परीक्षा पास की और अब अपना डॉक्टर का सपना पूरा करने जा रहा है।

सागर अपने माता-पिता के साथ। परिवार में आर्थिक तंगी होने के बाद भी सागर ने अपनी पढ़ाई जारी रखी और नीट में सिलेक्शन हुआ।
दो कमरों का मकान, कबाड़ छंटाई में बीतता बचपन
सागर के पिता मुरली दिनभर गांव-गांव घूमकर कबाड़ जुटाते हैं। मां घर पर उस कबाड़ से स्क्रैप अलग करने में उनकी मदद करती हैं। पिता मुरली रेगर ने बताया कि सागर का सपना डॉक्टर बनने का था, लेकिन कबाड़ बेचकर हम इतना पैसा नहीं जुटा सकते थे कि प्राइवेट कोचिंग का खर्च उठा सकें। हमने उसे सरकारी स्कूल में पढ़ाया। पैसे न होने के कारण हम बेबस थे, लेकिन सागर की लगन कभी कम नहीं हुई।

सागर के पिता मुरली कबाड लाने का काम करते हैं वही मां राममूर्ति स्क्रैप अलग करने का काम करती है
शिक्षा संबल ने दी सपनों को उड़ान
सागर के 10वीं में 76% और 12वीं में 92 प्रतिशत नंबर लाने के बावजूद नीट की तैयारी के लिए पैसे नहीं थे। हालात ऐसे थे कि अगर समय पर मदद न मिलती तो सागर को बीएससी में दाखिला लेना पड़ता। इस मुश्किल मोड पर कैथून के सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल सागर के मार्गदर्शक बने। उन्होंने सागर को शिक्षा संबल योजना के बारे में बताया और प्रवेश परीक्षा देने के लिए प्रेरित किया।

सागर की छोटी बहन भी डॉक्टर बनना चाहती है और इसके लिए तैयारी कर रही है
परीक्षा में सिलेक्शन होने के बाद कोटा में नीट की मुफ्त कोचिंग के साथ-साथ एलएन माहेश्वरी परमार्थ न्यास की ओर से निशुल्क रहने और खाने की व्यवस्था की गई।
सागर का कहना है कि इसी सपोर्ट के कारण वह बिना किसी वित्तीय तनाव के सालभर मन लगाकर पढ़ाई कर सका। सागर के घर में अब उम्मीदों का नया सवेरा है। उनकी छोटी बहन मानसी भी 12वीं में बायोलॉजी से पढ़ाई कर रही है और अपने भाई के कदमों पर चलने को तैयार है।