Aug 12, 2026 05:44 pm ISTलाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
जांच समिति ने कहा कि जस्टिस वर्मा के जवाब में स्पष्टता, पारदर्शिता और संस्थागत जिम्मेदारी का भाव नहीं दिखा। समिति ने यह भी कहा कि घटनास्थल से संबंधित महत्वपूर्ण साक्ष्य सुरक्षित या संरक्षित नहीं किए गए और स्टोर रूम में कुछ फेरबदल किया गया था।

जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े कैश कांड केस में संसदीय जांच समिति की रिपोर्ट सामने आ गई है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश रहे जस्टिस यशवंत वर्मा के आधिकारिक आवास से नकदी बरामद होने के मामले में लोकसभा द्वारा गठित जांच समिति ने उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों को सही पाया है और कहा कि वह संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सके। समिति की रिपोर्ट बुधवार को संसद के दोनों सदनों, लोकसभा और राज्यसभा में पेश की गई। जस्टिस वर्मा के आधिकारिक आवास से कथित तौर पर नोटों की अधजली गड्डियां मिलने के मामले में उन्हें पद से हटाने की कार्यवाही शुरू की गई थी।
समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जस्टिस वर्मा अपने आवास के स्टोर रूम में मिली 500-500 रुपये के नकदी और उसके स्वामित्व को लेकर संतोषजनक स्पष्टीकरण देने में विफल रहे। तीन सदस्यीय समिति ने जांच के दौरान जस्टिस वर्मा से पूछा था कि उनके घर के स्टोर रूम में पाई गई नकदी कहां से आई थी और किसके थे? जांच समिति के अनुसार, जस्टिस वर्मा ने इस सवाल का संतोषजनक जवाब नहीं दिया और उनका रवैया' टालमटोल वाला और असंतोषजनक' रहा।
जस्टिस वर्मा के जवाब असंतोषजनक
समिति ने कहा कि जस्टिस वर्मा के स्पष्टीकरण में स्पष्टता, पारदर्शिता और संस्थागत जिम्मेदारी का भाव नहीं दिखा। समिति ने यह भी कहा कि घटनास्थल से संबंधित महत्वपूर्ण साक्ष्य सुरक्षित या संरक्षित नहीं किए गए और आवास के स्टोर रूम में कुछ फेरबदल किया गया था। रिपोर्ट में कहा गया है, "ठोस सबूतों को ठीक से सुरक्षित या संरक्षित नहीं किया गया। कानूनी तौर पर सील करने और जांच-पड़ताल से पहले ही स्टोररूम में मौजूद सबूतों की स्थिति से छेड़छाड़ की गई थी।" संसदीय पैनल ने यह भी कहा है कि "बाद में करेंसी नोटों के गायब होने या न मिलने की कोई वजह नहीं बताई गई है।"
दो सवाल रहे अनसुलझे
रिपोर्ट में ठोस सबूतों के नुकसान के लिए "सबूतों को सुरक्षित न रख पाने" और "परिसर में तैनात स्टाफ द्वारा स्टोररूम में छेड़छाड़ होने देने" को जिम्मेदार ठहराया गया है। इस तीन सदस्यीय जांच समिति ने मई में अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंपी थी। लोकसभा अध्यक्ष बिरला ने 12 अगस्त 2025 को, न्यायमूर्ति वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास से कथित तौर पर बड़ी मात्रा में नकदी मिलने के मामले की जांच के लिए इस समिति का गठन किया था। हालांकि, इस मामले में कुछ सवाल अनसुलझे रह गए हैं। उनमें सबसेअहम सवाल कि आखिर मौके पर कितनी नकदी मौजूद थी? समिति भी अपनी जांच में करेंसी नोटों की सटीक रकम निर्धारित नहीं कर सकी। इसके अलावा घटना के दिन रात दो बजे स्टाफ से क्या बात हुई थी? इसका भी जवाब नहीं मिल सका।
क्या है पूरा मामला?
बता दें कि जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास में 14 मार्च 2025 की रात आग लग गई थी। आग बुझाने पहुंचे दमकलकर्मियों को कथित तौर पर एक स्टोर रूम में नोटों की अधजली गड्डियां मिली थीं। विवाद के बाद जस्टिस वर्मा को उनके मूल न्यायालय इलाहाबाद उच्च न्यायालय भेज दिया गया था जो घटना के समय दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे। तत्कालीन CJI संजीव खन्ना द्वारा गठित आंतरिक समिति इस निष्कर्ष पर पहुंची थी कि जस्टिस वर्मा का उस विशेष स्टोर रूम पर ''सक्रिय या मौन नियंत्रण'' था, जहां कथित तौर पर नकदी रखी गई थी।
जुलाई 2025 में 200 से अधिक सांसदों ने न्यायमूर्ति वर्मा को पद से हटाने के लिए उनपर महाभियोग चलाने के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद, अगस्त में बिरला ने आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय न्यायाधीश जांच समिति का गठन किया था। हालांकि, संसद द्वारा पद से हटाए जाने की आशंका के मद्देनजर जस्टिस वर्मा ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद से इस्तीफा दे दिया, जिससे उनके खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही निष्प्रभावी हो गई।
