August 16, 2026

48 सालों से प्रेमिका के दिल का हाल बयां कर रहा Ravindra Jain का कल्ट गाना, Hemlata की आवाज में बन गया सदाबहार - ravindra jain song ankhiyon ke jharokhon se becomes cult since 48 years sung by hemlata

48 साल पुराना गाना हिंदी सिनेमा के Cult सॉन्ग्स में से एक है इसे रविंद्र जैन ने लिखा और कंपोज किया था।

4 दशकों से सदाबहार बना हुआ है गाना

4 दशकों से सदाबहार बना हुआ है गाना

HighLights

  1. 4 दशकों से सदाबहार बना हुआ है गाना

  2. हेमलता ने दी थी कल्ट गाने को आवाज

  3. रविंद्र जैन का गीत आज भी गुनगुनाते हैं लोग

एंटरटेनमेंट डेस्क, नई दिल्ली। रविंद्र जैन, भारतीय सिनेमा के एक ऐसे संगीतकार जिन्होंने नेत्रहीन होने के बावजूद ऐसे गीत इंडस्ट्री को दिए जो अमर हो गए और दशकों बाद आज भी सदाबहार हैं। उन्होंने कई सदाबहार गाने और भजन लिखे और कंपोज किए। लेकिन जिसकी बात आज हम करने जा रहे हैं वो उनके सबसे बेहतरीन गीतों में से एक है।

48 साल बाद भी गाने को गुनगुनाते हैं लोग

रविंद्र जैन (Ravindra Jain) ने ये गीत 48 साल पहले बनाया था, उस वक्त तो दर्शकों ने इसे खूब सराहना दी ही साथ ही यह आज 4 दशकों बाद म्यूजिक लवर्स का पसंदीदा बना हुआ है। हर पीढ़ी बड़े चाव से इस गाने को सुनती है और गुनगुनाती है।

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इस गाने की खास बात है इसका ठहराव और मेलोडी जो हर प्रेमिका की आवाज बन चुकी है। जिस गीत की हम बात कर रहे हैं वह 1978 में रिलीज हुई अंखियों के झरोखों से का टाइटल गीत है। जिसके लिरिक्स हैं- अंखियों के झरोखों से, मैंने देखा जो सांवरे(Ankhiyon Ke Jharokhon Se)।

कल्ट गीत (Cult Song) अंखियों के झरोखों को सचिन पिलगांवकर और रंजीता कौर पर फिल्माया गया था। इस गाने को रविंद्र जैन ने लिखा और कंपोज किया था। वहीं हेमलता (Hemlata) ने इस गाने को आवाज दी थी जो उनके करियर का सिग्नेचर गीत बन गया।

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फिल्म के बारे में

'अंखियों के झरोखों से' 1978 में बनी एक ड्रामा फिल्म है, जिसमें रंजीता और सचिन (Sachin Pilgaonkar) ने मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं और इसका निर्देशन हिरेन नाग ने किया है। इसे राजश्री प्रोडक्शंस ने प्रोड्यूस और डिस्ट्रीब्यूट किया था और इसमें संगीत रवींद्र जैन का है। यह फिल्म एरिक सेगल के 1970 के उपन्यास 'लव स्टोरी' से प्रेरित है।

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रविंद्र जैन के बारे में

रवींद्र जैन एक भारतीय संगीतकार, गीतकार और प्लेबैक सिंगर थे। उन्होंने 1970 के दशक की शुरुआत में कई हिट फिल्मों के लिए संगीत देकर अपने करियर की शुरुआत की और दृष्टिहीनता की चुनौतियों के बावजूद बेहतरीन काम किया।

उन्होंने 'चोर मचाये शोर' (1974), 'गीत गाता चल' (1975), 'चितचोर' (1976), 'अंखियों के झरोखों से' (1978), 'नदिया के पार' (1982), 'राम तेरी गंगा मैली' (1985) और 'विवाह' (2006) जैसी फिल्मों में शानदार और यादगार म्यूजिक दिया। उन्होंने रामानंद सागर की रामायण का भी संगीत दिया था। उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।