September 6, 2026

नगर निकाय चुनाव चक्र: निर्दलीय बन सकते हैं गेमचेंजर, कुल प्रत्याशियों के 48 फीसदी; मेयर-चेयरमैन यही तय करेंगे - Jaipur News

पिछली बार 1615 निर्दलीयों ने जीत हासिल कर कई निकायों की कुर्सियां तय कीं, इस बार भी असरदार

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निर्दलीयों को लेकर यूं ही दोनों पार्टियां चिंतित नहीं हैं। इसके पीछे बड़ी सियासी वजह है। पिछले रिकॉर्ड खंगालें तो स्पष्ट होता है कि मेयर से लेकर चेयरमैन बनाने तक में निर्दलीयों की बड़ी भूमिका रही है। पिछली बार 7 हजार से अधिक वार्डों में 1615 निर्दलीयों ने जीत हासिल कर फिर लोहा मनवाया था।

इस बार चूंकि भाजपा और कांग्रेस के कुल प्रत्याशियों से भी ​निर्दलीयों की संख्या अधिक है, इसलिए इनकी ताकत और बढ़ गई है। इस निकाय चुनाव में प्रदेश के 10230 वार्डों में कुल 38889 प्रत्याशी हैं। इनमें से 18732 निर्दलीय हैं, जो कुल उम्मीदवारों का 48.16% (लगभग आधा) हिस्सा हैं। दूसरी तरफ, बीजेपी के 9290 और विपक्षी दल कांग्रेस के 9027 प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं। दोनों बड़ी पार्टियों के कुल उम्मीदवारों की तुलना में 415 ज्यादा निर्दलीय प्रत्याशी मैदान में डटे हुए हैं।

दल / पार्टीकुल उम्मीदवार
निर्दलीय18,732
बीजेपी9,290
कांग्रेस9,027
आरएलपी948
बसपा298
पार्टीमहिला उम्मीदवार (%)
कांग्रेस39.1%
बीजेपी38.7%
निर्दलीय36.0%

आंकड़ों से समझिए निर्दलीयों की ताकत... हर वार्ड में औसत 4 ​निर्दलीय

नगर पालिकाजिलाकुल वार्डनिर्दलीयविश्लेषण
राजगढ़अलवर402344 गुना से ज्यादा निर्दलीय मैदान में हैं।
गोविंदगढ़अलवर25107स्थानीय चेहरे पार्टियों पर हावी दिख रहे हैं।
घड़सानाश्रीगंगानगर2536पार्टी प्रत्याशियों से ज्यादा निर्दलीय मैदान में हैं।
मालपुराटोंक4080बड़े दलों के बराबर अकेले निर्दलीय खड़े हैं।
अनूपगढ़श्रीगंगानगर3475छोटे कस्बों में स्थानीय जुड़ाव असर दिखा रहा है।

छोटे वार्डों में पार्टियों के लिए सबसे ज्यादा खतरा निर्दलीयों से गौरतलब है कि छोटे कस्बों या नगर पालिकाओं में वार्ड का दायरा बहुत छोटा है। इसमें 500 से एक हजार के बीच वोटर हैं। यहां मतदाता उम्मीदवार को व्यक्तिगत रूप से जानता है। स्थानीय नेता का चेहरा जयपुर या दिल्ली से तय होने वाले ‘पार्टी सिंबल’ पर कई जगह भारी पड़ने का खतरा है। इसलिए वे पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार को कड़ी टक्कर दे रहे हैं।

वोटिंग के तुरंत बाद बाड़ाबंदी में भी इनकी पूछ सबसे ज्यादा प्रदेश में 309 निकाय हैं। ऐसे में अधिकांश जगहों पर चुनाव के बाद पालिका अध्यक्ष बनाने की चाबी स्थानीय चेहरों और निर्दलीयों के हाथ में होगी। नतीजतन, नतीजों के तुरंत बाद पार्षदों की ‘बाड़ाबंदी’ और जोड़-तोड़ की राजनीति कस्बों में सबसे ज्यादा देखने को मिलेगी।

  • कारण और असर क्या

कस्बों में बगावत हावी है छोटी नगर पालिकाओं में निर्दलीयों की इतनी बड़ी फौज यह साफ इशारा करती है कि बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही पार्टियां स्थानीय स्तर पर अपने कार्यकर्ताओं के असंतोष को थामने में नाकाम रही हैं। टिकट न मिलने पर नेताओं ने बिना झिझक के निर्दलीय पर्चा भर दिया है।

व्यक्तिगत रसूख बनाम पार्टी सिंबल कस्बों और छोटे शहरों के वार्ड बहुत छोटे होते हैं, जहां हर मतदाता उम्मीदवार को व्यक्तिगत रूप से जानता है। इसलिए छोटे कस्बों में मतदाता पार्टी के बजाय इस बात पर वोट देता है कि सुख-दुख में कौन सा पड़ोसी या स्थानीय नेता काम आएगा।

छोटे निकायों में किंगमेकर की भूमिका में निर्दलीय इस ट्रेंड से यह साफ है कि बड़े नगर निगमों (जयपुर, कोटा) में भले ही स्पष्ट बहुमत से बोर्ड बन जाए, लेकिन दर्जनों नगर पालिकाओं में बोर्ड बनाने की चाबी पार्टियों के पास नहीं, बल्कि निर्दलीय ‘किंगमेकर्स’ के हाथ में होगी।