October 4, 2026

42 सांसद, 8 मंत्री…फिर भी बिहार हाथ खाली क्यों: 466 गांव डूबे, एक पैसा नहीं मिला; गुजरात को ₹1,278 करोड़, 'पाली' का सेंटर फॉर एक्सीलेंस ओडिशा में - Bihar News

केंद्र सरकार क्या बिहार के साथ नाइंसाफी कर रही? हालिया दो बड़े फैसलों ने इस सवाल को बल दिया है।

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दोनों फैसले क्या हैं, क्या वाकई बिहार की हकमारी हो रही, सांसद-मंत्री क्या कर रहे, जानेंगे; बूझे की नाही में…।

फैसला-1ः 466 गांव डूबे, फूटी कौड़ी नहीं मिली, गुजरात को 1,277 करोड़

नेपाल में मूसलाधार बारिश के बाद बिहार की गंडक उफना गई हैं। इससे कई जगह तटबंध, जमींदारी बांध और सुरक्षात्मक तटबंध टूट गए हैं। नासा ने सैलेटाइल तस्वीरों और रिपोर्ट में भी विकराल बाढ़ की पुष्टि की है।

  • बिहार सरकार के जल संसाधन विभाग के मुताबिक, सबसे ज्यादा पश्चिम चंपारण, गोपालगंज, सारण और मुजफ्फरपुर समेत 6 जिलों के 466 गांवों में पानी घुस गया है।
  • सारण में स्थिति गंभीर है। यहां 75,286 परिवारों की करीब 3,55,100 आबादी बाढ़ से प्रभावित है। इनमें से 43,400 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है। 92,730 लोग बेघर हो गए हैं।
  • नासा की रिपोर्ट के मुताबिक, 24 से 27 सितंबर के बीच नेपाल के लुंबिनी और गंडकी एरिया में भीषण बारिश हुई। इससे कई भूस्खलन हुए और गंडक (नारायणी) नदी में पानी का बहाव ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया।

नासा ने 20 सितंबर और 29 सितंबर 2026 को ली गई सैटेलाइट तस्वीरों के अध्ययन से बाढ़ के विस्तार का स्पष्ट वैज्ञानिक प्रमाण मिला है।

इन सबके बावजूद केंद्र सरकार ने 4 अक्टूबर तक बिहार के लिए किसी राहत पैकेज का ऐलान नहीं किया है। यहां तक कि केंद्र ने SDRF (राज्य आपदा मोचन निधि) के तहत अलॉट अपने हिस्से के 1971 करोड़ रुपए में से एक रुपए भी बिहार को नहीं दिया है।

16 सितंबर 2026 को केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान बाढ़ का मुआयना करने आए। गए। लेकिन केंद्र ने अब तक आर्थिक मदद नहीं की है।

जबकि…

PIB की प्रेस रिलीज के मुताबिक, केंद्र सरकार ने 1 अगस्त 2026 को अरुणाचल प्रदेश को वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए SDRF के केंद्रीय हिस्से की पहली किस्त 44.55 करोड़, असम को 379.35 करोड़ और गुजरात को 500 करोड़ रुपए जारी किए। महाराष्ट्र को 500 करोड़ और ओडिशा को दूसरी किस्त के दौर पर 500 करोड़ देने का ऐलान किया।

  • इससे पहले 13 मार्च 20226 को गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता वाली समिति ने 2025 में बाढ़, आकस्मिक बाढ़, बादल फटने, चक्रवात 'मोंथा' और भूस्खलन से प्रभावित आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, नागालैंड तथा जम्मू-कश्मीर को 1,912.99 करोड़ रुपए अलग से राहत पैकेज देने को मंजूरी दी।
  • इसमें गुजरात के लिए 778.67 करोड़ रुपए देने की बातें कही गई। इसके अलावा आंध्र प्रदेश को 341.48 करोड़ रुपए, छत्तीसगढ़ को 15.70 करोड़ रुपए आदि राज्य शामिल थे।
  • मने 5 महीने के अंदर गुजरात को 1,278 करोड़ रुपए केंद्र सरकार ने दिए। जबकि, 29 जुलाई 2026 को लोकसभा में एक सवाल के जवाब में केंद्र सरकार ने बताया कि SDRF के तहत अलॉट पैसे को बिहार को नहीं दिया है।

फैसला-2ः बिहार की ‘पाली’ भाषा, ओडिशा में सेंटर फॉर एक्सीलेंस खुलेगा

1 अक्टूबर 2026 को भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने पांच शास्त्रीय भाषाओं- असमिया, बंगाली, पाली, मराठी और प्राकृत के संरक्षण के लिए 'सेंटर फॉर एक्सीलेंस' बनाने की मंजूरी दी। इसका मकसद इसका संरक्षण, रिसर्च और डिजिटलीकरण को बढ़ावा देना।

मंत्रालय के नोटिफिकेशन के मुताबिक, असम की तेजपुर यूनिवर्सिटी में असमिया, बंगाल के विश्व भारती विश्वविद्यालय में बंगाली, ओडिशा सेंट्रल यूनिवर्सिटी में पाली, गुजरात सेंट्रल यूनिवर्सिटी में प्राकृत और महाराष्ट्र के पुणे स्थित डेक्कन कॉलेज पोस्ट ग्रेजुएट एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट में मराठी भाषा का सेंटर फॉर एक्सीलेंस खुलेगा।

केंद्र सरकार ने 1 अक्टूबर 2026 को जारी किया सेंटर फॉर एक्सीलेंस बनाने का नोटिफिकेशन।

केंद्र सरकार ने 1 अक्टूबर 2026 को जारी किया सेंटर फॉर एक्सीलेंस बनाने का नोटिफिकेशन।

जबकि…

सर्वविदित है कि भगवान बुद्ध बिहार के बोधगया से पाली भाषा में उपदेश देते थे। पाली भाषा की उत्पत्ति बिहार के मगध से मानी जाती है। इसका उल्लेख इतिहास की किताबों के साथ-साथ भारत सरकार के डॉक्यूमेंट में भी है।

मोदी सरकार ने 3 अक्टूबर 2024 में मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बंगाली को शास्त्रीय भाषा की मान्यता दी। 4 अक्टूबर 2024 को भारत सरकार के जारी डॉक्यूमेंट और प्रेस रिलीज में कहा है...

  • पाली शब्द का इस्तेमाल काफी बाद में शुरू हुआ और इसकी शुरुआत कहां से हुई, इस पर विद्वानों में आज भी बहस जारी है। छठी या सातवीं सदी तक 'पाली' नाम से किसी अलग भाषा की पहचान नहीं थी। इस शब्द का सबसे पहला जिक्र बौद्ध विद्वान बुद्धघोष की रचनाओं में मिलता है। पाली की शुरुआत कैसे हुई, इसे लेकर अलग-अलग राय हैं।
  • जर्मन भाषाविद् मैक्स वालेसर का मानना है कि पाली शब्द 'पाताल' या 'पडाली' से बना है, जो शायद पाटलिपुत्र में बोली जाने वाली भाषा की तरफ इशारा करता है।
  • ब्रिटिश विद्वान आरसी चाइल्डर्स का मानना था कि पाली उस दौर के आम लोगों की बोलचाल वाली भाषा थी।
  • श्रीलंकाई नेता व विद्वान जेम्स अल्विस के मुताबिक यह भगवान बुद्ध के दौर की मगध की भाषा (मगधी) थी। अल्विस का कहना था कि पाली का असली नाम मगधी ही था और सम्राट अशोक के समय तक इसका काफी इस्तेमाल होता था।
  • प्राचीन भारत के इतिहास को गहराई से समझने के लिए पाली भाषा को जानना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि इसका साहित्य पुरानी जानकारियों और खजाने से भरा पड़ा है।
  • हालांकि, इसकी कई अहम पांडुलिपियां आज भी ऐसी जगहों पर मौजूद हैं जहां तक पहुंचना आसान नहीं है।
  • श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड, चटगांव, जापान, कोरिया, तिब्बत, चीन और मंगोलिया जैसे बौद्ध आबादी वाले देशों और इलाकों में आज भी पाली भाषा का अध्ययन किया जा रहा है।

3 अक्टूबर 2024 को जारी भारत सरकार के प्रेस रिलीज में साफ कहा गया है कि बिहार सरकार ने पाली को शास्त्रीय भाषा का दर्जा देने का प्रस्ताव दिया था। इस मांग को लेकर कमेटी बनाई गई थी।

  • शास्त्रीय भाषा का दर्जा देने के लिए भाषा विज्ञान विशेषज्ञ समिति ने 25 जुलाई 2024 को बैठक कर कुछ मापदंड तय किए। इसमें कहा गया कि कमेटी भाषा के इतिहास, ग्रंथ, साहित्य, विरासत, कविता, पुरालेखीय और शिलालेखीय सबूत जुटाएगी। उसके प्रभाव एरिया को देखेगी और अपनी रिपोर्ट देगी।
  • समिति ने अपनी रिपोर्ट में साफ लिखा कि पाली को शास्त्रीय भाषा के रूप में शामिल करने से शैक्षणिक और रिसर्च एरिया में रोजगार के अवसर पैदा होंगे। इसका लाभ बिहार को होगा। समिति ने पाली के प्रभाव एरिया में एक बार भी ओडिशा का जिक्र नहीं किया है।
  • हालांकि, समिति की रिपोर्ट के 2 साल बाद 1 अक्टूबर 2026 को भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने पाली का सेंटर फॉर एक्सीलेंस ओडिशा में बनाने का ऐलान कर दिया।
बिहार सरकार ने 10 दिसबंर 2025 को प्राकृत और पाली अकादमियां स्थापित करने का ऐलान किया। तब नीतीश कुमार राज्य के मुख्यमंत्री थे।

बिहार सरकार ने 10 दिसबंर 2025 को प्राकृत और पाली अकादमियां स्थापित करने का ऐलान किया। तब नीतीश कुमार राज्य के मुख्यमंत्री थे।

42 सांसद, 8 मंत्री, फिर कर क्या रहे हैं?

इस वक्त केंद्र की मोदी सरकार में बिहार के 42 सांसद (30 लोकसभा, 12 राज्यसभा) और 8 मंत्री शामिल हैं। 14 सांसद (10 लोकसभा, 4 राज्यसभा) विपक्ष में हैं। इसके बावजूद बिहार में अब तक कोई बड़ा निवेश नहीं आया है। इसके 2 बड़े कारण हैं…

1. ना विजन, ना एरिया में खास पकड़, सिर्फ सामाजिक समीकरण

पॉलिटिकल एनालिस्ट संजय सिंह कहते हैं, ‘बिहार के सांसदों में विजन की साफ कमी झलकती है। यहां के सांसद दिल्ली में अपने राज्य के लिए लॉबी नहीं कर पाते हैं। जबकि, साउथ के सांसद दिल्ली-नोएडा में डेरा डाले रहते हैं। वह किसी ना किसी तरह अपने एरिया में बड़ा प्रोजेक्ट ले जाने की कोशिश करते हैं।’

  • यहां के सांसद चाहे दिल्ली रहे या बिहार, दिनभर सामाजिक समीकरण की चिंता करते रहते हैं। ऐसा नहीं है कि साउथ के राज्यों में सामाजिक समीकरण के नाम पर वोट नहीं पड़ता। वहां भी पड़ता है, लेकिन वहां के सांसद प्रोजेक्ट को लेकर भी सीरियस रहते हैं।’
  • संजय सिंह कहते हैं, 'कई रिपोर्ट्स और आंकड़े बताते हैं कि यहां के सांसद अपनी MPLAD निधि का इस्तेमाल बड़े, दूरदर्शी प्रोजेक्ट्स के बजाय मुख्यतः छोटी नालियों, सामुदायिक भवनों, ढलाई सड़कों या पीसीसी रोड बनाने में ही खर्च कर देते हैं। ट्रेन का स्टॉपेज दिलाना ही बड़ा काम समझते हैं।'

ताजा उदाहरण ही देख लीजिए, सितंबर में दिल्ली में सेमीकंडक्टर 2.0 मिशन शुरू हुआ। इसमें साउथ के सांसदों ने जमकर लॉबिंग की। अपने यहां प्रोजेक्ट लेकर गए। बिहार के सांसद बयानबाजी और जातीय समीकरण साधने में रह गए।

2. अधिकतर सांसद अपने अधिकार को ही नहीं जानते

PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार के 80% से अधिक सांसद अपने पूरे 5 साल के कार्यकाल में एक भी प्राइवेट मेंबर बिल पेश नहीं करते। अधिकतर सांसद या तो इसकी जटिल प्रक्रिया/ड्राफ्टिंग की जानकारी न होने के कारण बिल पेश नहीं कर पाते, या इसे अपनी प्राथमिकता में शामिल ही नहीं करते। केवल 2-3 अपवाद सांसद (जैसे नालंदा या नवादा के सांसद) ही ऐसे रहे हैं जिन्होंने कई बिल पेश किए।

  • रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार के मंत्रालयों के खर्च, योजनाओं और बड़े नीतिगत सुधारों की जांच संसदीय कमेटियों (जैसे रक्षा, वित्त, रेल समिति) की महत्वपूर्ण बहसों में गहराई से रिसर्च करके सुझाव नहीं देते। कई सांसद केवल उपस्थिति दर्ज कराने तक सीमित रहते हैं या बैठकों से गायब हो जाते हैं।
  • PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च की रिपोर्ट मानें तो बीते 2 सालों में बिहार के सांसदों ने सबसे ज्यादा सवाल रेलवे से पूछे हैं। जिसमें नए रेल रूट, लंबित प्रोजेक्ट्स (जैसे पुल और ओवरब्रिज), और विशेष ट्रेनों के परिचालन को लेकर थे।

पॉलिटिकल एनालिस्ट केके लाल कहते हैं, ‘हकीकत तो है कि यहां के सांसदों को अपने पूरे अधिकार का पता ही नहीं है। उनको हॉस्पिटलों में मरीज को एडमिट करा देना, रेलवे टिकट कंफर्म करा देना, पर्व-त्योहार में स्पेशल ट्रेन चलवा देना बड़ा काम लगता है।’