जम्मू-कश्मीर के विकास और देश के स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों के लिए एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित होने वाली सावलकॉट जलविद्युत परियोजना (SawalKote Hydroelectric Project) अब चार दशक पुराने गतिरोध से बाहर निकलकर पूर्ण रूप से रफ्तार पकड़ने जा रही है। 1980 के दशक में पहली बार परिकल्पित यह 1,850 मेगावाट (MW) की विशाल रन-ऑफ-द-रिवर परियोजना विभिन्न प्रशासनिक अड़चनों, भू-राजनीतिक संवेदनशीलता और पर्यावरणीय आपत्तियों के चलते लगभग 40 वर्षों तक फाइलों में दबी रही।
केंद्र सरकार के ऊर्जा मंत्रालय और देश की सबसे बड़ी पनबिजली उत्पादक कंपनी एनएचपीसी (NHPC) ने अब इस परियोजना को 'फास्ट-ट्रैक मिशन' के तहत पूरा करने के लिए ₹31,000 करोड़ से अधिक का व्यापक मास्टरप्लान तैयार किया है। इस बांध के निर्माण से न केवल उत्तरी ग्रिड को भारी मात्रा में हरित ऊर्जा मिलेगी, बल्कि जम्मू-कश्मीर सीधे तौर पर बिजली सरप्लस केंद्र के रूप में उभरेगा।
परियोजना का भूगोल और इंजीनियरिंग: 193 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रैविटी डैम
सावलकॉट परियोजना का निर्माण केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के रामबन और उधमपुर/रियासी जिलों के बीच चिनाब (Chenab) नदी पर किया जाना है।
-
परियोजना की क्षमता: कुल 1,850 मेगावाट (जिसमें 225 MW की 6 मुख्य टरबाइन यूनिट्स और अन्य सहायक इकाइयां शामिल हैं)।
-
डैम की संरचना: चिनाब नदी पर लगभग 193 मीटर ऊंचा रोलर कॉम्पेक्टेड कंक्रीट (RCC) ग्रैविटी बांध बनाया जाएगा।
-
बिजली उत्पादन क्षमता: परियोजना पूरी होने के बाद यह हर साल लगभग 7,500 से 8,000 मिलियन यूनिट (MU) सस्ती और प्रदूषण-मुक्त बिजली ग्रिड को सप्लाई करेगी।
-
समय-सीमा और निवेश: ₹31,200 करोड़ की अनुमानित लागत वाले इस प्रोजेक्ट को सिविल वर्क शुरू होने के बाद लगभग 7 से 8 वर्षों के भीतर पूरी तरह ग्रिड से सिंक्रोनाइज करने का लक्ष्य रखा गया है।
सिंधु जल समझौता (IWT) और रणनीतिक बढ़त
भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से सावलकॉट डैम भारत के लिए अत्यंत रणनीतिक महत्व रखता है:
-
पश्चिमी नदियों के पानी का पूर्ण उपयोग: 1960 के सिंधु जल समझौते (Indus Waters Treaty) के तहत चिनाब, झेलम और सिंधु नदियों को 'पश्चिमी नदियां' माना गया है, जिस पर पाकिस्तान को पानी का बड़ा अधिकार दिया गया था।
-
हालांकि, समझौते के तकनीकी प्रावधानों के तहत भारत को इन नदियों पर बिना पानी की दिशा मोड़े और बिना नदी के प्राकृतिक प्रवाह को रोके 'रन-ऑफ-द-रिवर' (Run-of-the-river) जलविद्युत संयंत्र बनाने का पूरा अधिकार प्राप्त है।
-
सावलकॉट प्रोजेक्ट के जरिए भारत अपने आवंटित हिस्से के जल संसाधनों का पूर्ण उपयोग सुनिश्चित करेगा, जिससे सीमा पार बिना उपयोग के बह जाने वाले पानी का प्रभावी संचयन और प्रबंधन देश की ऊर्जा सुरक्षा के हित में हो सकेगा।
जम्मू-कश्मीर को क्या-क्या होगा सीधा फायदा?
सावलकॉट परियोजना केवल बिजली पैदा करने का जरिया नहीं है, बल्कि यह केंद्र शासित प्रदेश के सामाजिक और आर्थिक परिदृश्य को बदलने की ताकत रखती है:
-
12% मुफ्त बिजली: समझौते के तहत जम्मू-कश्मीर प्रशासन को परियोजना से उत्पन्न कुल बिजली का 12% हिस्सा पूरी तरह मुफ्त मिलेगा, साथ ही 1% अतिरिक्त लोकल एरिया डेवलपमेंट फंड (LADF) में जाएगा। इससे प्रदेश का सालाना हजारों करोड़ रुपये का पावर डेफिसिट हमेशा के लिए खत्म होगा।
-
हजारों रोजगार और कौशल विकास: बांध, टनलिंग, रोड इंफ्रास्ट्रक्चर और पावरहाउस निर्माण के दौरान स्थानीय युवाओं को प्रत्यक्ष रूप से 10,000 से अधिक नौकरियां और अप्रत्यक्ष रोजगार के बड़े अवसर मिलेंगे।
-
सड़क और कनेक्टिविटी का कायाकल्प: प्रोजेक्ट साइट तक भारी मशीनरी पहुंचाने के लिए रामबन, रियासी और आसपास के दूरदराज पहाड़ी इलाकों में ऑल-वेदर सड़कों और पुलों का नेटवर्क तैयार किया जाएगा।
-
औद्योगिक निवेश को बढ़ावा: चौबीसों घंटे सस्ती बिजली की उपलब्धता से घाटी और जम्मू संभाग में नए उद्योगों, कोल्ड स्टोरेज चेन और डेटा सेंटर्स की स्थापना को मजबूती मिलेगी।
चिनाब बेसिन बना देश का 'हाइड्रो हब'
सावलकॉट के पुनरुद्धार के साथ ही चिनाब नदी अब देश के सबसे बड़े हाइड्रोइलेक्ट्रिक क्लस्टर में तब्दील हो रही है। चिनाब घाटी में पहले से चल रही या निर्माणाधीन प्रमुख परियोजनाओं—जैसे पकल दुल (1000 MW), कीरू (624 MW), क्वार (540 MW), रातले (850 MW) और दुलहस्ती—के साथ मिलकर यह पूरा रीजन 6,000 मेगावाट से अधिक की संयुक्त क्षमता पैदा करेगा, जो भारत को 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता हासिल करने के संकल्प में निर्णायक भूमिका निभाएगा।