October 10, 2026

तमिलनाडु में मिला 3200 साल पुराना कटोरा, सिंधु घाटी सभ्यता और प्राचीन लिपि के खुल सकते हैं कई रहस्य - old bowl found in tamil nadu could unlock many secrets of the indus valley civilization and ancient scripts

तमिलनाडु के मेट्टूर बांध के पास तेलुंगनूर में खुदाई के दौरान 3200 साल से भी पुराना एक प्राचीन कटोरा मिला है, जिस पर पांच ग्राफिती चिह्न अंकित हैं।

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डिजिटल डेस्क, चेन्नई। तमिलनाडु में सेलम के पास मेट्टूर बांध के जलमग्न क्षेत्र तेलुंगनूर में खुदाई के दौरान काले और लाल रंग की एक साबुत प्राचीन कटोरा मिला है। इसके साथ ही लोहे के हथियार, तांबे की वस्तुएं और एक संभावित स्टील की तलवार भी निकला है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह खोज 3200 साल से भी अधिक पुरानी लेखन प्रणाली या लिपि से जुड़े महत्वपूर्ण सुराग दे सकती है। तमिलनाडु पुरातत्व विभाग द्वारा खोजी गई इस कटोरी पर बाएं से दाएं पांच ग्राफिती अंकित हैं। राज्य में अब तक मिली कलाकृतियों पर दर्ज निशानों में यह सबसे लंबी श्रृंखला है।

पुरातत्वविदों का मानना है कि यह लिपि का कोई शुरुआती रूप हो सकता है, क्योंकि एक अन्य कटोरी पर भी यही पांचों चिह्न अलग क्रम में मिले हैं। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि यह छठी शताब्दी ईसा पूर्व की तमिल-ब्राह्मी लिपि का शुरुआती रूप हो सकता है।

सिंधु घाटी सभ्यता से गहरा संबंध

सेलम के पास स्थित तेलुंगनूर और मांगाडू लौह युग के दो जुड़वां स्थल हैं, जिनका समय 1600 ईसा पूर्व से 1200 ईसा पूर्व के बीच का माना गया है। यह कालखंड सिंधु घाटी सभ्यता का अंतिम दौर था।

तमिलनाडु पुरातत्व विभाग के सलाहकार के. राजन ने बताया कि 1960 के दशक में भारतीय पुरातत्व विभाग को चेंगलपट्टू के पास सानूर में अलग-अलग क्रम में तीन ग्राफिती चिह्न मिले थे। अब दो अलग-अलग क्रमों में पांच-पांच चिह्न मिले हैं, जिनका अर्थ समझना अभी बाकी है।

तमिलनाडु में अब तक कई स्थलों से करीब 16000 ग्राफिती वाले मिट्टी के बर्तन के टुकड़े मिल चुके हैं। एक हालिया अध्ययन के अनुसार, कोडुमनाल, कीलाडी, थुलुक्कड़पट्टी और किलनामंडी जैसे तमिलनाडु के स्थलों और सिंधु घाटी सभ्यता के स्थलों पर मिले चिह्नों में 90 प्रतिशत तक समानता है।

सिंधु घाटी सभ्यता का अस्तित्व 3300 ईसा पूर्व से 1300 ईसा पूर्व के बीच माना जाता है। इसके अलावा, तमिल-ब्राह्मी शिलालेखों और बर्तनों पर अक्षरों के अंत में बने चिह्न भी प्राचीन संचार व्यवस्था की ओर इशारा करते हैं।

कई दुर्लभ और प्राचीन हथियार भी मिली

इस स्थान से केवल मिट्टी के बर्तन ही नहीं, बल्कि कई दुर्लभ और प्राचीन हथियार भी मिली हैं। उत्खनन निदेशक एस. परनथामन के अनुसार, यहां से 1.9 मीटर लंबा लोहे का भाला मिला है।

इसके अलावा तीर के अग्रभाग, कुल्हाड़ियां, तलवारें, कटार, चाकू और लोहे की कीलें भी मिली हैं। विशेषज्ञों को यहां एक बेहद प्राचीन स्टील की तलवार मिलने का भी संदेह है।

यह स्थल पहले भी काफी चर्चा में रहा है, जब यहां से मिली एक स्टील की तलवार की कार्बन डेटिंग 1200 ईसा पूर्व तय की गई थी। इसे दुनिया की सबसे पुरानी स्टील की तलवारों में से एक माना जाता है।

लौह युग के कंकाल और चार प्रकार की दफनाने की प्रथाएं

उत्खनन के दौरान पुरातत्वविदों को यहां लौह युग के दो इंसानों के पूरे कंकाल भी मिले हैं। इसके अलावा, इस एक ही स्थल पर दफनाने की चार अलग-अलग पद्धतियां गड्ढा/पिट, पाषाण पेटिका/सिट, अस्थि कलश/अर्न और शव-मंजूषा/सरकोफैगस देखने को मिली हैं।

निदेशक परनथामन का कहना है कि एक ही जगह पर चार प्रकार की दफन प्रणालियों का मिलना यह दर्शाता है कि यहां एक विविधतापूर्ण समाज निवास करता था। यह इस बात का भी प्रमाण है कि यह स्थान शुरुआती लौह युग से विकसित होकर उत्तर लौह युग तक निरंतर समृद्ध रहा।