ज्यों-ज्यों तटबंध बढ़े, बिहार में बाढ़ का दायरा भी बढ़ा:तटबंध कम थे तो 25 लाख हेक्टेअर में होती थी बाढ़, अब बढ़े तो 68.8 लाख हेक्टेअर
पटना51 मिनट पहले
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राज्य में तटबंधों की लंबाई साल दर साल बढ़ती गई। लंबाई इसलिए बढ़ी कि तटबंध बनेंगे तो बाढ़ नहीं आएगी। हुआ ठीक उलटा। विडंबना है कि तटबंध बढ़े तो बाढ़ का इलाका भी बढ़ता गया।
1954 में बिहार में 160 किमी लंबा तटबंध था। तब 25 लाख हेक्टेअर इलाका बाढ़ प्रभावित होता था। आज तटबंधों की लंबाई 3430 किमी है और बाढ़ का इलाका 68.8 लाख हे. हो गया है। यह जल संसाधन विभाग का ही आंकड़ा है। 1950 के दशक में उत्तर बिहार की नदियों की बाढ़ से बचाव के लिए तटबंध बनाने की शुरूआत हुई।
कमला, बागमती, बूढ़ी-गंडक, अधवारा समूह और महानंदा किनारे भी तटबंध बने। जल संसाधन विभाग के इंजीनियर तो दबी जुबान स्वीकार करते हैं कि बागमती किनारे तटबंध बनाना भूल थी। तटबंधों के बनने के बाद आज बिहार सालाना 1200 करोड़ इन्हें बचाने व रखरखाव पर खर्च कर रहा है और 1300 करोड़ से अधिक राशि राहत कार्यों पर खर्च कर रहा है। तटबंधों के बाहर जलजमाव आम है। नदी का पानी उतरता है, स्लूइस गेट खोले जाते हैं तब पानी उतरता है। कोसी तटबंधों के बीच बसे 338 गांव हर साल बाढ़ की त्रासदी झेलते हैं।
यहां बेटी की शादी से पहले संपत्ति नहीं घर में नाव पूछते हैं पानी वाले इलाके में तो लोग बाढ़ के साथ जीना सीख गए हैं। कटिहार जिले के अमदाबाद प्रखंड में आज नाव ही शादी-ब्याह का पैमाना है। यहां बेटी का रिश्ता तय करते समय लड़के की संपत्ति या नौकरी के बजाय घर में नाव है कि नहीं सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न होता है। प्रखंड से गंगा और महानंदा नदियां गुजरती हैं। हरदेव टोला, चौक चामा, भगवान टोला, मेघु टोला सहित 14 गांव साल के चार महीने बाढ़ से घिरे रहते हैं। आवागमन का एकमात्र सहारा नाव ही होती है। ग्रामीणों के अनुसार, सुरक्षा के लिहाज से लड़की पक्ष पहले जांचता है कि लड़के के पास लकड़ी या टीन की नाव है या नहीं। मेघु टोला के भोला सिंह के मुताबिक, नाव न होने पर उनके पोते का तय रिश्ता टूट गया था। भगवान टोला के रतन सिंह बताते हैं कि लड़का पसंद आने पर वधू पक्ष ने खुद नाव उपहार में देकर शादी कराई।
1955 में कोसी पर ये तटबंध बनने शुरू हुए आजाद भारत में 1955 में कोसी नदी पर इन्हीं तटबंधों का निर्माण शुरू हुआ। उसके पहले 17 से 24 अक्टूबर, 1954 के बीच डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को कोसी तटबंध के शिलान्यास के ठीक पहले बुलाया गया। 14 जनवरी, 1955 के दिन पूर्वी कोसी तटबंध का शिलान्यास हुआ और पश्चिमी तटबंध का शिलान्यास स्वयं डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने 22 मार्च, 1955 को किया।
तटबंधों के बनाए जाने से लाभ हुआ है या कि नुकसान इसके बारे में चिंता करना जरूरी बाढ़ पर बिहार में 1937 के पटना सम्मेलन पहली चर्चा 10 से 12 नवंबर के बीच हुई थी। इसमें डॉ राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि निर्मित तटबंधों व छोटे बांधो का जो निर्माण बाढ़ से बचाव के लिए किया गया है। जब बाढ़ के लिए तटबंधों को जिम्मेदार ठहराया जाता है और अक्सर सलाह दी जाती है कि उनको हटा देना चाहिए तब शुरुआत रेलवे तटबंधों व जिला बोर्ड की सड़कों से किया जाना चाहिए। यह सुझाव निराशाजनक लग सकता है लेकिन इंजीनियरों के पास वह क्षमता जरूर होनी चाहिए जिससे वह इस स्थिति से निपटने के समाधान सुझा सकें। - दिनेश मिश्रा बाढ़ एवं नदियों से जुड़े विशेषज्ञ
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