October 5, 2026

मप्र के विदिशा में 2021 से शुरू हुआ भक्तिग्राम: न बिजली, न मोबाइल; गुरुकुल में बच्चे, 60 लोगों ने चुनी वैदिक जिंदगी, खुद उगा रहे अपना अनाज - Bhopal News

भोपाल/विदिशा27 मिनट पहलेलेखक: राहुल शर्मा

  • कॉपी लिंक

हर रोज जब सूरज डूबता है, तब मध्य प्रदेश के विदिशा के गंजबासौदा से 28 किमी दूर, बड़वासा गांव के पास बसे भक्तिग्राम के घरों में दीये जल उठते हैं... किसी घर में लालटेन टिमटिमाने लगती है।

मिट्टी-खपरैल के 12 घरों में रहने वाले करीब 60 लोगों की इस दुनिया में न बिजली है, न मोबाइल। पूरे गांव में सिर्फ दो साधारण की-पैड फोन हैं, वह भी बाहर के उन लोगों के लिए जो गांव से संपर्क करना चाहें। कई डॉक्टर-इंजीनियर अपनी भागदौड़ भरी जिंदगी छोड़कर यहां आ बसे हैं।

गांव में ज्यादातर निर्माण लोग खुद करते हैं भक्तिग्राम का उद्घाटन 2021 में भक्ति विकास स्वामी महाराज ने किया था। यह प्रोजेक्ट इस्कॉन मंदिर से जुड़ा है। इसके लिए अलग से भक्तिग्राम ट्रस्ट बनाया गया। शुरुआत में जमीन और निर्माण सामग्री पर हुआ पूरा खर्च ट्रस्ट ने उठाया।

निर्माण जहां तक संभव हुआ गांव वालों ने खुद किया। अब गांव धीरे-धीरे आत्मनिर्भर बन रहा है। रोजमर्रा की ज्यादातर चीजें खुद तैयार करता है और बाजार पर जो थोड़ी-बहुत निर्भरता बची है, उसका खर्च भी ट्रस्ट ही उठाता है।

शहरों की भागदौड़ भरी जिंदगी छोड़ यहां आ बसे लोग: गांव में बसे ज्यादातर परिवार अलग-अलग राज्यों से आए हैं। वे आम शहरी लोगों जैसी भागदौड़ भरी, कमाऊ जिंदगी जी रहे थे। लेकिन भक्ति की राह पर चलते हुए इन्होंने अपनी डिग्री और करियर की सुविधाओं को पीछे छोड़ दिया और बिना बिजली-मोबाइल वाली जिंदगी को अपनी मर्जी से चुना। भक्तिग्राम में रहने वाले नर्मदापुरम के नर्मदादास पेशे से डॉक्टर हैं, तो उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के रहने वाले राजकुमार यादव पहले टेक्सटाइल टेक्नोलॉजी इंजीनियर थे।

3 साल की उम्र से धोती-कुर्ता, फर्राटे से श्लोक बोलते हैं बच्चे: धोती-कुर्ता पहने छोटे-छोटे बच्चे फर्राटे से संस्कृत के श्लोक बोलते नजर आते हैं। गांव में घुसते ही सबसे पहला नजारा यही होता है। गांव में 12 साल से कम उम्र के करीब एक दर्जन बच्चे हैं, जिनमें से 7 साल की उम्र पार करते ही बच्चे गुरुकुल जाने लगते हैं। फिलहाल यहां 8 से 10 बच्चे पढ़ रहे हैं, जहां किताब-कॉपी से ज्यादा जोर सुनकर और दोहराकर याद करने की पुरानी परंपरा पर है। संस्कृत और वेद की शिक्षा के साथ हिंदी-अंग्रेजी जैसी बुनियादी पढ़ाई भी होती है।

महिलाएं आज भी हाथ से पीसती हैं मसाला: भक्तिग्राम की रसोई में आज भी मिक्सर-ग्राइंडर या गैस चूल्हे की जगह नहीं है। महिलाएं लकड़ी और कंडों से जलते चूल्हे पर खाना बनाती हैं। मसाले सिल-बट्टे पर पीसे जाते हैं। आटा हाथ की चक्की पर पीसा जाता है। गांव में बैल से चलने वाले पारंपरिक कोल्हू-घानी में तेल निकाला जाता है।

अनाज और सब्जियां भी गांव के खेतों में जैविक तरीके से ही उगाई जाती हैं, बिना किसी रासायनिक खाद या कीटनाशक के। यानी थाली में जो कुछ भी पहुंचता है, वह गांव के भीतर ही, गांव के हाथों बनता है।

भक्तिग्राम को लेकर मन में उठ रहे सवालों के जवाब

बीमार पड़ने पर क्या करते हैं? गांव की जड़ी-बूटियों से ठीक न होने पर ही बाजार से आयुर्वेदिक या एलोपैथिक दवा ली जाती है। नजदीकी अस्पताल करीब 10 किमी दूर उदयपुर में है।

पैसों का इंतजाम कैसे होता है? भक्तिग्राम ट्रस्ट एक इस्कॉन मंदिर ट्रस्ट से जुड़ा है और गांव में बाहर से दान देने का विकल्प भी है।

पशुपालन का क्या इंतजाम है? गुजरात की पुरानी देसी नस्ल की करीब एक दर्जन गायें हैं। दूध बेचा नहीं जाता, सिर्फ जरूरत भर निकाला जाता है, बाकी बछड़ों के लिए छोड़ दिया जाता है।

बसने के लिए 7 माह की परीक्षा

यहां हर परिवार को घर अलॉट होते हैं। परिवार पहले एक दिन गांव देखते हैं। फिर एक महीने बाद 6 दिन के लिए गांव आते हैं। उसके बाद अपने पूरे परिवार के साथ 6 महीने रहना होता है। फिर चाहे तो जिंदगी भर यहां रह सकते हैं।

जीवन में पहले से ज्यादा सुकून है

भक्तिग्राम में बिजली और मोबाइल दोनों का इस्तेमाल नहीं होता। जिंदगी पहले से कहीं ज्यादा सुकून भरी है। अपने और अपनों दोनों के लिए यहां भरपूर समय है। -नर्मदादास, निवासी भक्तिग्राम

.