July 23, 2026

भारत या चीन, जेनेरिक दवा के बाजार का असली बादशाह कौन? दवाओं पर 200% लगेगा टैरिफ

भारत या चीन, जेनेरिक दवा के बाजार का असली बादशाह कौन? दवाओं पर 200% लगेगा टैरिफ

अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका और एशिया के करोड़ों मरीज जेनेर‍िक दवाओं पर निर्भर हैं.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ताजी धमकी से दवा बाजार में हलचल है. उन्होंने दो साल बाद जेनेरिक दवाओं पर दो सौ फीसदी टैरिफ का ऐलान किया है. घोषणा के मुताबिक साल 2028 तक कोई टैरिफ नहीं लगेगा. उसके बाद एक साल के लिए सौ फीसदी तथा साल 2029 के बाद या साल 2030 से दो सौ फीसदी टैरिफ लगेगा. मतलब, दो साल तक कोई संकट नहीं है. यह दबाव की रणनीति भी लगती है. क्योंकि जब दो सौ फीसदी टैरिफ लगाने का समय आएगा, तब ट्रम्प राष्ट्रपति नहीं रहेंगे.आइए, ट्रम्प की ताजी घोषणा के संदर्भ में समझते हैं कि जेनेरिक दवा बाजार का असली बादशाह कौन है? भारत या चीन? ट्रम्प की धमकी का कितना होगा असर?

जेनेरिक दवाएं वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ हैं. ये ब्रांडेड दवाओं जैसी ही सक्रिय सामग्री वाली दवाएं होती हैं, लेकिन इनकी कीमत कम रहती है. अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका और एशिया के करोड़ों मरीज इन पर निर्भर हैं. इस बाजार में भारत और चीन दोनों बड़े खिलाड़ी हैं. मगर दोनों की ताकत अलग-अलग है. भारत तैयार जेनेरिक दवाओं के मामले में मजबूत है. चीन कच्चे माल और दवा बनाने वाले रसायनों में आगे है. इसलिए दोनों की अपनी-अपनी ताकत है. बात निर्भरता से आगे की है.

भारत में तैयार दवाओं की दुनिया में ताकत

भारत को अक्सर फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड कहा जाता है. इसकी बड़ी वजह सस्ती और भरोसेमंद जेनेरिक दवाओं का विशाल उत्पादन है. भारतीय कंपनियां टैबलेट, कैप्सूल, इंजेक्शन, सिरप और कई जटिल दवाएं बनाकर दुनिया भर में भेजती हैं. अमेरिका भारत का सबसे बड़ा विदेशी बाजार है. ताजी रिपोर्ट्स के मुताबिक वर्ष 2025 में अमेरिका को भारत का फार्मा निर्यात करीब 9.7 अरब डॉलर रहा. यह भारत के कुल वैश्विक दवा निर्यात का लगभग 38 प्रतिशत है. अमेरिकी बाजार में उपयोग होने वाली जेनेरिक दवाओं में भारतीय कंपनियों की हिस्सेदारी बहुत बड़ी है.

India Pharmacy Of The World

एक अनुमान के मुताबिक यह लगभग 47 प्रतिशत तक है. भारतीय कंपनियों के पास अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन की मंजूरी वाले बहुत से प्लांट और उत्पाद हैं. यह मंजूरी पाना आसान नहीं होता. गुणवत्ता, रिकॉर्ड और उत्पादन प्रक्रिया की कड़ी जांच होती है. सन फार्मा, डॉ. रेड्डीज, सिप्ला, ल्यूपिन, अरबिंदो फार्मा और जाइडस जैसी कंपनियां अमेरिकी बाजार में लंबे समय से मौजूद हैं. इनमें से कई कंपनियों के अमेरिका में भी उत्पादन केंद्र भी है. यह बात आगे चलकर बहुत अहम हो सकती है.

चीन की असली ताकत है कच्चा माल

चीन तैयार जेनेरिक दवाओं के बाजार में भारत जितना प्रभावी नहीं है, लेकिन दवा उद्योग की मूल सप्लाई चेन में उसकी पकड़ बेहद मजबूत है. दवा बनाने के लिए जिन सक्रिय रासायनिक तत्वों की जरूरत होती है, वहाँ चीन बेहद मजबूत है. इन तत्वों को एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स कहा जाता है. भारत की बहुत-सी दवा कंपनियां एपीआई और दूसरे रासायनिक इनपुट चीन से खरीदती हैं. रिपोर्ट्स में तो दावा किया जाता है कि भारत की रासायनिक एपीआई जरूरत का करीब 70 प्रतिशत हिस्सा चीन से जुड़ा है. यही चीन की सबसे बड़ी ताकत है.

भारत अंतिम दवा बनाता है. चीन उसके कई जरूरी कच्चे पदार्थ उपलब्ध कराता है. यदि चीन से सप्लाई बाधित होती है, तो भारत में उत्पादन लागत बढ़ सकती है. इसलिए चीन को केवल भारत का प्रतिद्वंद्वी मानना अधूरी समझ होगी. चीन कई मायनों में भारतीय दवा उद्योग का प्रमुख सप्लायर भी है.

Jinping Trump

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंपऔर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग,

फिर असली बादशाह कौन?

अगर सवाल तैयार जेनेरिक दवा का है, तो भारत की बढ़त साफ दिखती है. भारत कम लागत में बड़ी मात्रा में दवाएं बना सकता है. भारतीय कंपनियां अमेरिकी और यूरोपीय नियमों वाले बाजारों तक पहुंच रखती हैं. उनकी फाइलिंग, गुणवत्ता नियंत्रण और निर्यात नेटवर्क मजबूत हैं, लेकिन अगर सवाल दवा उद्योग की बुनियाद का है, तो चीन की भूमिका बड़ी है. एपीआई, रसायन और मध्यवर्ती उत्पादों में चीन की क्षमता भारत के लिए रणनीतिक चुनौती है. सीधी भाषा में कहें तो भारत दवा बनाने और बेचने में आगे है तो चीन दवा का जरूरी कच्चा माल देने में मजबूत है. भारत मरीज तक पहुंचता है. चीन उत्पादन की जड़ में बैठा है. इस मुकाबले में भारत को तैयार दवा बाजार का बादशाह कहा जा सकता है, लेकिन वह अपनी आपूर्ति श्रृंखला में अभी पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं है.

ट्रंप की नई टैरिफ धमकी का भारत पर क्या होगा असर?

ट्रम्प की धमकी का भारत पर तुरंत बहुत असर नहीं पड़ेगा. दो वर्ष तक तो निर्यात चलेगा. उसके बाद तस्वीर बदल सकती है. क्योंकि प्रस्तावित टैरिफ बहुत ऊंचा है. अमेरिकी योजना के मुताबिक, 1 अगस्त 2026 से अगले दो साल तक जेनेरिक दवाओं पर शून्य टैरिफ रहेगा. इसके बाद एक वर्ष के लिए 100 प्रतिशत शुल्क लगाया जाएगा. फिर इसे बढ़ाकर 200 प्रतिशत किया जा सकता है. इस प्रस्ताव का उद्देश्य दवा उत्पादन को अमेरिका के भीतर लाना है. अमेरिकी प्रशासन चाहता है कि विदेशी कंपनियां अमेरिका में प्लांट लगाएं और वहीं उत्पादन करें. यह फिलहाल चरणबद्ध योजना है.

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ट्रम्प की धमकी का भारत पर तुरंत बहुत असर नहीं पड़ेगा.

इस धमकी का चीन पर क्या असर पड़ेगा?

चीन भी इस नीति से प्रभावित हो सकता है, लेकिन चीन का असर भारत से अलग होगा. चीन तैयार दवा के बजाय एपीआई और रसायनों की सप्लाई में ज्यादा महत्वपूर्ण है. यदि अमेरिकी कंपनियां दवा उत्पादन अमेरिका में बढ़ाती हैं, तो उन्हें भी एपीआई की जरूरत होगी. ऐसे में चीन की सप्लाई चेन भूमिका बनी रह सकती है. हां, अमेरिका और भारत दोनों चीन पर निर्भरता कम करने की कोशिश तेज कर सकते हैं.

भारत के सामने अवसर और चुनौती

  • भारत के लिए यह एक अवसर भी है. भारत एपीआई उत्पादन बढ़ाकर चीन से आने वाले कच्चे माल का विकल्प बना सकता है. इससे घरेलू उद्योग मजबूत होगा. भारत को अगले दो साल केवल इंतजार में नहीं बिताने चाहिए. उसे कई मोर्चे पर तेजी से काम करना होगा.
  • पहला: अमेरिका में उत्पादन और पैकेजिंग क्षमता बढ़ानी होगी.
  • दूसरा: एपीआई के लिए चीन पर निर्भरता घटानी होगी.
  • तीसरा: यूरोप, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया में नए बाजार बढ़ाने होंगे.
  • चौथा: जटिल जेनेरिक दवाओं और बायोसिमिलर जैसे उच्च मूल्य वाले उत्पादों पर ध्यान देना होगा.

भारत की ताकत कम लागत और बड़ी उत्पादन क्षमता है, लेकिन भविष्य में केवल सस्ती दवा काफी नहीं होगी. सप्लाई चेन की मजबूती, कच्चे माल में आत्मनिर्भरता और नए बाजारों तक पहुंच भी जरूरी होगी.

सरल शब्दों में कहें तो जेनेरिक दवाओं के तैयार बाजार में भारत का दबदबा है. चीन कच्चे माल की सप्लाई में मजबूत है. इसलिए इस उद्योग का असली बादशाह अभी भारत है, लेकिन उसकी गद्दी के नीचे चीन की सप्लाई चेन का सहारा भी मौजूद है. ट्रंप की टैरिफ धमकी भारत के लिए तत्काल संकट नहीं है. दो साल का समय एक बड़ी राहत है. मगर 100 और 200 प्रतिशत टैरिफ लागू हुए, तो भारतीय कंपनियों को अमेरिकी बाजार के लिए नई रणनीति बनानी पड़ेगी.

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अंकित गुप्ता

अंकित गुप्ता

नवाबों के शहर लखनऊ में जन्‍मा. डीएवी कॉलेज से ग्रेजुएशन किया और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से MBA. लिखने की चाहत और खबरों से आगे की कहानी जानने का जुनून पत्रकारिता में लाया. 2008 में लखनऊ के पहले हिन्‍दी टेबलॉयड ‘लखनऊ लीड’ से करियर से शुरुआत की. फीचर सेक्‍शन में हाथ आजमाया. फ‍िर बाबा गोरखनाथ के नगरी गोरखपुर से दैनिक जागरण के आइनेक्‍स्‍ट से जुड़ा. शहर की खबरों और हेल्‍थ मैगजीन में रिपोर्टिंग के लिए 2013 में राजस्‍थान पत्र‍िका के जयपुर हेडऑफ‍िस से जुड़ा. यहां करीब 5 साल बिताने के बाद डिजिटल की दुनिया में नई शुरुआत के लिए 2018 में दैनिक भास्‍कर के भोपाल हेड ऑफ‍िस पहुंचा. रिसर्च, एक्‍सप्‍लेनर, डाटा स्‍टोरी और इंफोग्राफ‍िक पर पकड़ बनाई. हेल्‍थ और साइंस की जटिल से जटिल खबरों को आसान शब्‍दों में समझाया. 2021 में दैनिक भास्‍कर को अलविदा कहकर TV9 ग्रुप के डिजिटल विंग से जुड़ा. फ‍िलहाल TV9 में रहते हुए बतौर असिस्‍टेंट न्‍यूज एडिटर ‘नॉलेज’ सेक्‍शन की कमान संभाल रहा हूं. एक्‍सप्‍लेनर, डाटा और रिसर्च स्‍टोरीज पर फोकस भी है और दिलचस्‍पी भी.

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