नई दिल्ली। 29 जुलाई को भारत के तीन चुनाव आयुक्तों में से दो ने एक असामान्य कदम उठाया। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को पत्र न लिखकर सीधे कैबिनेट सचिव को पत्र लिखा।
इंडिया टुडे द्वारा प्राप्त एक आरटीआई (RTI) जवाब से यह खुलासा हुआ है कि ‘सेवा तीर्थ’ (वह परिसर जहाँ प्रधानमंत्री कार्यालय, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय और कैबिनेट सचिवालय स्थित हैं) के भीतर उन पत्रों पर क्या कार्रवाई हुई।
19 अक्टूबर के इस आरटीआई जवाब में यह पुष्टि की गई है कि सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी द्वारा 29 जुलाई को लिखे गए पत्र कैबिनेट सचिवालय पहुँचे थे।
कागजी कार्रवाई की समयसीमा (पेपर ट्रेल)
आरटीआई के अनुसार, दोनों पत्रों को 30 जुलाई को दर्ज किया गया था और 5 अगस्त तक कैबिनेट सचिव ने इन्हें कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के अधिकारियों और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के कार्यालय को भेज दिया था।
हालांकि, पत्रों की मूल सामग्री का अभी खुलासा नहीं किया गया है। सचिवालय ने 14 पन्नों के सभी दस्तावेजों (जिसमें आयुक्तों के 10 पन्नों के पत्र, 2 पन्नों के जवाब और 2 पन्नों की फाइल नोटिंग्स शामिल हैं) को ₹28 का शुल्क भुगतान न किए जाने तक रोके रखा है।
चुनाव आयुक्तों ने पत्र क्यों लिखा?
इस पूरे विवाद की वजह 28 जुलाई का एक कार्य-आबंटन (work-allocation) आदेश था। एक समाचार पत्र की रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आयुक्तों ने नियमों के उल्लंघन का हवाला देते हुए इस आदेश पर आपत्ति जताई थी और कैबिनेट सचिव को पत्र लिखा था। बाद में इस नए कार्य-आबंटन को रद्द कर दिया गया था।
रिपोर्ट के मुताबिक, इस बदलाव से मतदाता सूची (electoral rolls) के आईटी बैकबोन (IT backbone) पर निगरानी की एक परत खत्म हो गई थी। आयुक्तों ने स्पष्ट किया था कि यह बदलाव उनकी जानकारी के बिना किए गए थे।
दूसरी ओर, एक अन्य समाचार पत्र ने सूत्र के हवाले से रिपोर्ट दी थी कि यह पत्र एक वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त (DEC) से संबंधित था, न कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से।
चुनाव आयोग (ECI) ने 26 सितंबर को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा था:
“कैबिनेट सचिव को लिखा गया पत्र आयोग के किसी नीतिगत मामले या आईटी प्रभाग से संबंधित नहीं था, बल्कि यह प्रतिनियुक्ति पर आए एक अधिकारी के कामकाज से जुड़ा था। संबंधित अधिकारी द्वारा जारी किए गए कार्य-पुनर्वितरण आदेश दोनों आयुक्तों के आदेश के बाद लागू नहीं किए गए थे और उप चुनाव आयुक्त द्वारा आईटी प्रभाग पर निगरानी को वास्तव में कभी वापस नहीं लिया गया था।”
आरटीआई से क्या सिद्ध होता है?
आरटीआई यह तो नहीं बताती कि पत्रों में क्या लिखा था, लेकिन अब तक लीक और प्रेस नोट के आधार पर चल रहे इस विवाद में यह पहला आधिकारिक दस्तावेज है। इससे यह पुष्टि होती है कि पत्र वास्तव में लिखे गए थे, वे कब पहुँचे और कैबिनेट सचिव का जवाब कहाँ भेजा गया।
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