August 20, 2026

वंदे मातरम् के दो छंदों पर क्यों अड़ी कांग्रेस? 1937 के प्रस्ताव में गांधी, नेहरू, पटेल और टैगोर की क्या भूमिका थी? – Sanjeevni Today

वंदे मातरम् के गायन को लेकर कांग्रेस और बीजेपी के बीच एक बार फिर राजनीतिक बहस तेज है। कांग्रेस कार्यसमिति ने हाल में अपने कार्यक्रमों में गीत के शुरुआती दो छंद गाने के 1937 के फैसले पर कायम रहने की बात कही है। कांग्रेस का तर्क है कि यह कोई नया फैसला नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में लिया गया ऐतिहासिक निर्णय है।

1937 में क्या हुआ था?

1937 में कांग्रेस के सामने सवाल था कि सार्वजनिक और राष्ट्रीय आयोजनों में वंदे मातरम् के किस हिस्से का गायन किया जाए। गीत के शुरुआती दो छंदों में मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता और उसके प्रति श्रद्धा का वर्णन है, जबकि बाद के हिस्सों में हिंदू देवी-देवताओं के स्पष्ट संदर्भ आते हैं। इसी वजह से कांग्रेस नेतृत्व ने शुरुआती दो छंदों को सार्वजनिक राष्ट्रीय आयोजनों के लिए उपयुक्त माना।

यह फैसला किसी गुप्त समझौते के तौर पर नहीं, बल्कि कांग्रेस कार्यसमिति के औपचारिक विचार-विमर्श के बाद लिया गया था। जवाहरलाल नेहरू के दस्तावेजों में भी 1937 के निर्णय का उल्लेख मिलता है।

गांधी की क्या भूमिका थी?

महात्मा गांधी वंदे मातरम् के महत्व को स्वीकार करते थे, लेकिन राष्ट्रीय प्रतीकों के मामले में सभी समुदायों की भावनाओं को साथ लेकर चलने के पक्षधर थे। 1937 की चर्चा में गांधी ने भी शुरुआती दो छंदों को सार्वजनिक रूप से गाए जाने का समर्थन किया था।

यानी गांधी का रुख गीत को खारिज करने का नहीं, बल्कि ऐसे हिस्से को राष्ट्रीय आयोजनों के लिए चुनने का था जिस पर व्यापक सहमति बन सके।

नेहरू की क्या भूमिका थी?

जवाहरलाल नेहरू उस समय कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में थे और वंदे मातरम् के राष्ट्रीय इस्तेमाल को लेकर चर्चा में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। उन्होंने माना कि गीत का स्वतंत्रता आंदोलन में ऐतिहासिक महत्व है, लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि राष्ट्रीय गीत ऐसा हो जिसे देश के विभिन्न समुदाय स्वीकार कर सकें।

नेहरू ने इसी संदर्भ में रवींद्रनाथ टैगोर की राय भी मांगी थी।

टैगोर ने क्या सलाह दी?

रवींद्रनाथ टैगोर का वंदे मातरम् से पुराना संबंध था। उन्होंने 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में इसे गाया था। 1937 में उन्होंने शुरुआती दो छंदों को राष्ट्रीय उपयोग के लिए उपयुक्त माना। उनका विचार था कि इन हिस्सों में मातृभूमि की सुंदरता और प्रकृति का वर्णन है, इसलिए इन्हें अलग करके राष्ट्रीय गीत के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

पटेल की भूमिका क्या थी?

सरदार वल्लभभाई पटेल भी 1937 की कांग्रेस कार्यसमिति की चर्चा में शामिल प्रमुख नेताओं में थे। ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार उस समय की कार्यसमिति में नेहरू, पटेल, राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आजाद और अन्य वरिष्ठ नेता मौजूद थे। उपलब्ध विवरणों के मुताबिक प्रस्ताव को व्यापक सहमति के साथ आगे बढ़ाया गया था।

इसलिए यह कहना कि 1937 में केवल किसी एक नेता ने वंदे मातरम् के दो छंद तय किए थे, पूरे घटनाक्रम को बहुत सरल बना देना होगा।

अब फिर क्यों उठा विवाद?

2026 में केंद्र सरकार की ओर से वंदे मातरम् के पूरे स्वरूप और उसके ऐतिहासिक महत्व को लेकर चर्चा तेज होने के बाद कांग्रेस ने अपने पुराने रुख को दोहराया है। पार्टी का कहना है कि 1937 में तय की गई परंपरा के अनुसार उसके कार्यक्रमों में शुरुआती दो छंद ही गाए जाएंगे।

वहीं बीजेपी कांग्रेस के इस फैसले की आलोचना कर रही है और इसे राष्ट्रगीत के प्रति पार्टी के रवैये से जोड़ रही है। इससे वंदे मातरम् अब सिर्फ सांस्कृतिक मुद्दा नहीं, बल्कि एक बार फिर राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है।

1950 में क्या स्थिति बनी?

आजादी के बाद 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने वंदे मातरम् के ऐतिहासिक महत्व को स्वीकार करते हुए इसे जन गण मन के साथ समान सम्मान दिए जाने की बात कही थी। इस तरह वंदे मातरम् को स्वतंत्रता आंदोलन की ऐतिहासिक विरासत के रूप में विशेष स्थान मिला।

यानी 1937 का फैसला वंदे मातरम् को खारिज करने का फैसला नहीं था। यह राष्ट्रीय आयोजनों में उसके शुरुआती दो छंदों के इस्तेमाल पर सहमति का फैसला था—जिसमें गांधी, नेहरू, पटेल, टैगोर और कांग्रेस के कई अन्य नेताओं की भूमिका रही। आज इसी ऐतिहासिक फैसले को लेकर राजनीतिक बहस फिर तेज हो गई है।