September 13, 2026

जय हो दिल्ली, अब बीजिंग में मिलेंगे... 18वें BRICS समिट में भारतीय कूटनीति का डंका - indias diplomacy triumphs at 18th brics summit delhi declaration

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Published: Mon, 14 Sep 2026 12:00 AM (IST)Updated: Mon, 14 Sep 2026 02:06 AM (IST)

भारत ने 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में अपनी कूटनीतिक क्षमता का प्रदर्शन करते हुए 'नई दिल्ली घोषणा पत्र 2026' पर सर्वसम्मति प्राप्त की।

भारत ने 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में 'नई दिल्ली घोषणा' पर सहमति बनाई

भारत ने 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में 'नई दिल्ली घोषणा' पर सहमति बनाई

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जयप्रकाश रंजन, नई दिल्ली। दुनिया जब पश्चिम एशिया के घमासान, चौथे वर्ष में प्रवेश कर चुके रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिका की लगातार बदलती टैरिफ नीतियों से पैदा हुई अनिश्चितता से जूझ रही है, तब नई दिल्ली ने कूटनीति की एक अलग राह दिखाई है।

वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनाव और ब्रिक्स के भीतर मौजूद मतभेदों के बीच भारत की अध्यक्षता में आयोजित 18वें शिखर सम्मेलन में सभी सदस्य देशों को ‘नई दिल्ली घोषणा पत्र 2026’ पर सर्वसम्मति के लिए साथ लाना साधारण उपलब्धि नहीं है।

भारत ने यह दिखाया कि जब दुनिया में संवाद के बजाय टकराव बढ़ रहा हो, तब भी धैर्य, संतुलन और निरंतर बातचीत के जरिये साझा सहमति की जमीन तैयार की जा सकती है।

BRICS समिट में भारत का डंका

दो दिवसीय सम्मेलन का रविवार को समापन हुआ। भारतीय कूटनीति का यही संतुलन वर्ष 2023 में जी-20 के आयोजन के दौरान भी दिखाई दिया था, जब गंभीर वैश्विक विभाजन के बावजूद नई दिल्ली घोषणा पर सहमति बनी थी।

ब्रिक्स में भी भारत ने उसी अनुभव को आगे बढ़ाते हुए अलग-अलग हितों और मतभेदों के बीच संवाद का सिलसिला बनाए रखा।
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भारतीय टीम को आतिथ्य तथा सफल आयोजन के लिए धन्यवाद दिया।

चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान समेत अन्य नेताओं ने भी भारत के नेतृत्व में सम्मेलन के सुचारू और परिणाममूलक आयोजन की सराहना की। चीन के समाचार पत्रों में भी भारत की भूमिका और आयोजन की तारीफ हुई।

ईरान-यूएई के मतभेदों के बीच सहमति की राह

यह सफलता महज औपचारिक सहमति नहीं थी। मई में ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच पश्चिम एशिया युद्ध को लेकर भाषा पर इतना गहरा मतभेद था कि संयुक्त वक्तव्य तक नहीं निकल सका था। सम्मेलन से पहले और उसके दौरान भारत ने दोनों पक्षों के बीच लगातार पुल का काम किया।

एक ओर विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने दोनों देशों के नेतृत्व से संपर्क बनाए रखा, वहीं दूसरी ओर वार्ता करने वाले अधिकारियों, शेरपाओं और मसौदा तैयार करने वाली टीमों के बीच रातभर बातचीत चलती रही। कई रातों तक वार्ताओं का दौर चला। आखिरकार घोषणा पत्र में ऐसी भाषा पर सहमति बनी, जो सभी पक्षों को स्वीकार्य थी।

इसमें पश्चिम एशिया में तनाव पर गहरी चिंता, अधिकतम संयम बरतने, नागरिकों और नागरिक बुनियादी ढांचे की सुरक्षा, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान तथा संवाद और कूटनीति के जरिये स्थायी शांति का आह्वान किया गया।

जिन देशों को भाषा को लेकर ज्यादा आपत्ति थी, उनके बीच सहमति बनाने के लिए यह रास्ता निकाला गया कि घोषणा पत्र में किसी भी देश का नाम नहीं लिया जाएगा।

ईरान का खास तौर पर ख्याल रखा गया। राष्ट्रपति पेजेश्कियान और अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद के बीच सीधे संवाद का अवसर दिया गया, जिससे सहमति की राह काफी आसान हुई।

वैश्विक व्यवस्था से लेकर स्थानीय मुद्रा तक

नेताओं ने संयुक्त राष्ट्र समेत वैश्विक संस्थानों में सुधार और भारत तथा ब्राजील की सुरक्षा परिषद में बड़ी भूमिका का समर्थन किया। एकतरफा व्यापार प्रतिबंधों और जबरदस्ती के उपायों का विरोध तथा स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने पर भी सहमति बनी।

गाजा में मानवीय सहायता, संघर्ष विराम और दो-देशीय समाधान का उल्लेख किया गया। नागरिक परमाणु सुविधाओं पर हमलों और परमाणु जोखिम बढ़ने पर चिंता जताई गई।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के वैश्विक शासन, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, महत्वपूर्ण खनिजों की विश्वसनीय आपूर्ति शृंखला और विकास सहयोग जैसे भारत द्वारा आगे बढ़ाए गए एजेंडे को भी घोषणा पत्र में जगह मिली।

भारत ने अपने हितों से जुड़े मुद्दों को भी साफ तौर पर आगे बढ़ाया। आतंकवाद के सभी रूपों, खासकर पहलगाम आतंकी हमले की कड़ी निंदा का उल्लेख एक बार फिर ब्रिक्स की घोषणा में किया गया।

ग्लोबल साउथ को लेकर मोदी का स्पष्ट संदेश

चीन की 2027 की अध्यक्षता और अगले शिखर सम्मेलन का समर्थन करके समूह ने निरंतरता का भी संदेश दिया। इस तरह दस्तावेज केवल विवादों को टालने वाला दस्तावेज नहीं रहा, बल्कि ग्लोबल साउथ के हितों को संस्थागत रूप देने की दिशा में आगे बढ़ा।

पीएम मोदी ने सम्मेलन के दोनों सत्रों में ग्लोबल साउथ के हितों को सबसे ऊपर रखा। उन्होंने कहा कि विकासशील देश वैश्विक संकटों की अग्रिम पंक्ति में खड़े हैं, लेकिन निर्णय लेने की प्रक्रिया में पिछली कतार में बैठे हैं।

उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि विकासशील देशों को केवल आदेश मानने वालों की भूमिका से आगे बढ़कर नियम बनाने वालों की भूमिका में आना चाहिए।वैश्विक मंचों पर विकासशील देशों की आवाज को इतनी मजबूती से उठाने का यह प्रयास भारतीय कूटनीति की प्रमुख पहलों में गिना जा सकता है।

भारत के लिए ब्रिक्स सम्मेलन का हासिल कूटनीतिक क्षमता

गंभीर मतभेदों के बावजूद सभी सदस्य देशों को एक साझा घोषणा पत्र पर सहमत कर भारत ने अपनी संवाद और सहमति बनाने की क्षमता दिखाई।

ईरान-यूएई संवाद: पश्चिम एशिया के संवेदनशील मुद्दे पर ईरान और यूएई के बीच संवाद का रास्ता बनाने में भारत ने पुल की भूमिका निभाई।

आतंकवाद: आतंकवाद के सभी रूपों की निंदा के साथ पहलगाम आतंकी हमले का उल्लेख भारत के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि। ग्लोबल साउथ: विकासशील देशों को वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अधिक भूमिका देने का भारत का एजेंडा प्रमुखता से सामने आया।

संयुक्त राष्ट्र: यूएन में सुधार और सुरक्षा परिषद में भारत तथा ब्राजील की बड़ी भूमिका के समर्थन को घोषणा पत्र में जगह मिली।

दुर्लभ खनिज: इसे एजेंडे में शामिल कर भारत ने अपनी आर्थिक और औद्योगिक जरूरतों से जुड़े मुद्दे को प्रमुखता दी।

लोकल करेंसी: स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने पर सहमति भारत की दीर्घकालिक आर्थिक प्राथमिकताओं के अनुरूप है।

चीन संवाद: चीन की 2027 की अध्यक्षता और अगले शिखर सम्मेलन के समर्थन ने मतभेदों के बावजूद संवाद और समूह की निरंतरता को बनाए रखने का संकेत दिया।