October 2, 2026

सिर्फ 14% लोग ही UPI पर चार्ज देने को तैयार, सर्वे में चौंकाने वाला खुलासा

नई दिल्ली (उत्तम हिन्दू न्यूज): डिजिटल इंडिया के दौर में सब्जी के ठेले से लेकर बड़े शॉपिंग मॉल तक स्मार्टफोन से यूपीआई (UPI) स्कैन करना आम भारतीय की दिनचर्या बन चुका है। पर्स में नकद पैसे रखने की आदत लगभग छूट चुकी है, लेकिन अब बड़े डिजिटल लेन-देन को लेकर बड़ा बदलाव होने जा रहा है। 15 अक्टूबर 2026 से ₹2,000 से अधिक के पी2एम (P2M यानी पर्सन टू मर्चेंट) यूपीआई भुगतानों पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू होने की तैयारी है। इस फैसले ने आम उपभोक्ताओं और व्यापारियों दोनों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। हाल ही में हुए एक बड़े देशव्यापी सर्वे में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि यदि ग्राहकों की जेब से एक भी अतिरिक्त पैसा कटा, तो वे यूपीआई का इस्तेमाल छोड़कर पुराने विकल्पों की तरफ लौट जाएंगे।

76% ग्राहक एक्स्ट्रा चार्ज देने को तैयार नहीं, सर्वे में सामने आया रुख
कम्युनिटी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘लोकलसर्किल्स’ (LocalCircles) ने देश के 291 जिलों में 67 हजार से अधिक यूपीआई उपयोगकर्ताओं के बीच एक व्यापक सर्वे किया। सर्वे के नतीजों के मुताबिक, 76 प्रतिशत उपभोक्ताओं ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि वे ₹2,000 से ऊपर के भुगतान पर किसी भी तरह का अतिरिक्त शुल्क कतई नहीं देंगे। यदि उन पर यह चार्ज थोपने की कोशिश की गई, तो वे तुरंत भुगतान का माध्यम बदल लेंगे। पूरे देश में केवल 14 प्रतिशत उपयोगकर्ता ही ऐसे मिले जो अतिरिक्त शुल्क कटने के बावजूद यूपीआई सुविधा का इस्तेमाल जारी रखने के पक्ष में दिखे, जबकि बाकी सभी ने वैकल्पिक रास्तों पर जाने का मन बना लिया है।

फिर लौटेगा कैश का दौर, क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड बनेंगे बैकअप प्लान
यदि बड़े यूपीआई पेमेंट्स पर शुल्क का बोझ पड़ा, तो भारतीय बाजार दोबारा नकदी की तरफ मुड़ सकता है। सर्वे के आंकड़ों के अनुसार, 27 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे डिजिटल लेन-देन बंद कर वापस नकद (कैश) में भुगतान करना शुरू कर देंगे। वहीं 26 प्रतिशत उपभोक्ता क्रेडिट कार्ड और 14 प्रतिशत लोग डेबिट कार्ड के जरिए स्वाइप करने का विकल्प चुनेंगे। इसके अलावा 4 प्रतिशत यूजर्स ने एनईएफटी या आईएमपीएस (NEFT/IMPS) जैसे पारंपरिक बैंक ट्रांसफर और 9 प्रतिशत लोगों ने अन्य निशुल्क माध्यमों की ओर रुख करने की बात कही है। सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि 2 प्रतिशत लोगों ने साफ कहा कि यदि अतिरिक्त शुल्क लगा तो वे अपनी खरीदारी ही टाल देंगे।

दुकानदारों में भी भारी असमंजस, 41% व्यापारी खुद नहीं सहेंगे एमडीआर का घाटा
यह घबराहट केवल ग्राहकों तक सीमित नहीं है, बल्कि छोटे और बड़े व्यापारी भी भारी तनाव में हैं। नियम के मुताबिक, 0.4 प्रतिशत एमडीआर लागू होने पर यदि कोई ग्राहक ₹5,000 का सामान खरीदता है, तो दुकानदार के खाते से ₹20 कट जाएंगे। वहीं ₹50,000 के बड़े बिल पर दुकानदार को सीधे ₹200 का नुकसान उठाना पड़ेगा। लोकलसर्किल्स द्वारा 32 हजार से अधिक व्यापारियों से की गई बातचीत में 41 प्रतिशत कारोबारियों ने दो टूक कह दिया कि वे अपनी जेब से कोई एमडीआर नहीं भरेंगे। केवल 17 प्रतिशत दुकानदार ही इस खर्च को खुद वहन करने के लिए सहमत दिखे, जबकि 9 प्रतिशत व्यापारियों ने बताया कि वे पहले से ही यूपीआई स्वीकार नहीं करते हैं।

वित्त मंत्रालय की दो टूक: ग्राहकों पर न पड़े बोझ, पर नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई अस्पष्ट
इस पूरे विवाद के बीच वित्त मंत्रालय ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि एमडीआर न तो सरकार का कोई टैक्स है और न ही इसे एनपीसीआई (NPCI) अपने लिए वसूल रहा है। केंद्र सरकार ने साफ निर्देश दिए हैं कि मर्चेंट डिस्काउंट रेट का बोझ किसी भी सूरत में आम उपभोक्ताओं की जेब पर नहीं डाला जा सकता और बैंक यह सुनिश्चित करें कि ग्राहकों से कोई अतिरिक्त राशि न काटी जाए। 15 अक्टूबर से इस पूरे व्यवस्था की निगरानी की जाएगी।

हालांकि रिपोर्ट में इस बात को लेकर गंभीर चिंता जताई गई है कि यदि कोई दुकानदार बिल में एमडीआर जोड़कर चोरी-छिपे ग्राहक से पैसे वसूल लेता है, तो उस पर क्या दंडात्मक कार्रवाई होगी और पीड़ित ग्राहक को उसका पैसा कैसे वापस मिलेगा, इसका कोई स्पष्ट तंत्र अभी सामने नहीं आया है। बाजार जानकारों का मानना है कि यदि इस भ्रम को समय रहते दूर नहीं किया गया, तो बड़े यूपीआई लेन-देन का एक बड़ा हिस्सा दोबारा नकद अर्थव्यवस्था में तब्दील हो सकता है।

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