August 6, 2026

209 किलो वजन, गले में पाइप लगाकर लेनी पड़ती थी सांस... AIIMS के डॉक्टरों ने ऐसे बदल दी मरीज की जिंदगी

दिल्ली AIIMS के डॉक्टरों ने एक 209 किलो के मरीज को नई जिंदगी दी है. 32 साल के विवेक को सुपर-सुपर ओबेसिटी के साथ स्लीप एपनिया की बीमारी थी. इस कारण उसकी सांस बार-बार रुकती थी. इस समस्या के कारण हर रात में CPAP मशीन की मदद से सांस लेनी पड़ती थी. ऐसे में डॉक्टरों ने पहले ट्रेकियोस्टॉमी (सर्जरी करके गले में छेद करके सांस की नली डालना) की, और उसके बाद वजन कम करने के लिए बेरिएट्रिक सर्जरी की गई. अब आज 14 ही दिनों में विवेक का वजन करीब 49 किलो घटकर 160 किलोग्राम हो गया है. इसके साथ ही सांस लेने वाली समस्या भी दूर हो गई है. विवेक को एम्स से छुट्टी दे दी गई है. 

एम्स दिल्ली के सर्जरी विभाग में मेटाबॉलिक, बैरिएट्रिक और किडनी ट्रांसप्लांट सर्जरी विशेषज्ञ प्रोफेसर डॉ. मंजूनाथ मारूति पोल ने इस बारे में आजतक.इन को बताया है.

32 साल की उम्र में ही 209 किलो हो गया था वजन

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डॉ. मंजूनाथ ने बताया कि यह केस 32 साल के एक लड़के का है, जिसका वजन 209 किलो था, उसका BMI 74 kg/m² था. इस मरीज को हाई ब्लड प्रेशर, प्री-डायबिटीज, कोलेस्ट्रॉल की समस्या, एसिड रिफ्लक्स, डिप्रेशन, घुटनों में दर्द और सबसे गंभीर रूप में ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया (OSA) था, रात में सोते समय उसकी सांस बार-बार रुकती थी, जिससे शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा खतरनाक स्तर तक गिर जाती थी. यह मरीज इलाज के लिए दिल्ली एम्स आया था. उसकी गंभीर हालात देखकर पहले मरीज को भर्ती किया गया. 

अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान मरीज का वजन बढ़ रहा था और सांस लेने की क्षमता तेजी से खराब होने लग रही थी, CPAP मशीन भी पर्याप्त साबित नहीं हुई, इसलिए डॉक्टरों को पहले इंट्यूबेशन और फिर इमरजेंसी ट्रेकियोस्टॉमी करनी पड़ी. मरीज का पेट इतना बड़ा था कि उसे सामान्य ऑपरेशन टेबल पर सुरक्षित तरीके से लिटाना भी संभव नहीं था. इसलिए ट्रेकियोस्टॉमी उसके बेड पर ही करनी पड़ी. इसके बाद वह लगातार 32 दिनों तक ट्रेकियोस्टॉमी के जरिए CPAP सपोर्ट पर रहा. इस दौरान उसे वेंटिलेटर से जुड़े संक्रमण का भी खतरा हुआ, जिसके लिए एंटीबायोटिक इलाज देना पड़ा.

डॉ मंजूनाथ बताते हैं कि जब किसी व्यक्ति का वजन बहुत ज्यादा बढ़ जाता है तो शरीर का लगभग हर अंग प्रभावित होने लगता है. इससे हड्डियों, जोड़ों पर प्रेशर पड़ता है. दिल पर दबाव बढ़ता है, फेफड़े ठीक से काम नहीं कर पाते, चलने-फिरने में परेशानी होती है और नींद के दौरान सांस रुकने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.

हर रात मशीन के सहारे आती थी नींद

विवेक को गंभीर ऑब्स्ट्रक्टिव स्लीप एपनिया था. इस बीमारी में सोते समय गले का रास्ता बार-बार बंद हो जाता है और कुछ सेकंड के लिए सांस रुक जाती है. अगर यह समस्या बार-बार हो तो शरीर में ऑक्सीजन कम होने लगती है और हार्ट पर भी असर पड़ सकता है. ऐसे उसको रात में CPAP मशीन का इस्तेमाल करना पड़ता है. यह मशीन दबाव के साथ हवा पहुंचाकर सांस की नली को खुला रखती है, लेकिन जब बीमारी बहुत ज्यादा बढ़ जाए तो कुछ मरीजों में गले में ट्रेकियोस्टॉमी करनी पड़ती है, इससे हवा सीधे फेफड़ों तक पहुंच जाती है.

सर्जरी से पहले 32 दिनों तक चली खास तैयारी

सर्जरी से पहले 32 दिनों तक डॉक्टरों ने खास तैयारी की थी. इसके लिए सर्जन, एनेस्थीसिया विशेषज्ञ, फिजिशियन, डाइटिशियन, फिजियोथेरेपिस्ट और अन्य विशेषज्ञों की टीम बनाई गई. मरीज को 32 दिनों तक वेरी लो कैलोरी डाइट (VLCD) पर रखा गया. साथ ही सांस की एक्सरसाइज, संक्रमण का इलाज, ब्लड प्रेशर कंट्रोल और लगातार निगरानी की गई. 

इस पूरी तैयारी का बड़ा फायदा मिला. इसके बाद डॉक्टरों ने बैरिएट्रिक सर्जरी करने का फैसला किया. जिससे विवेक का वजन 209 किलो से घटकर अब 160 किलो हो गया है. 24 जुलाई को सर्जरी हुई थी और आज 6 अगस्त को जब अस्पताल से छुट्टी मिली तो उसका वजन 49 किलो कम हो गया है. यानी, करीब 14 दिनों में ही इतना वजन घट गया. 

डॉ. मंजूनाथ ने बताया कि सर्जरी के समय विवेक के पेट का घेरा 198 सेंटीमीटर से घटकर 178 रह गया और सर्जरी के 14 दिन बाद अब वह 155 सेंटीमीटर हो गया है.  मरीज को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है. अब वह स्वस्थ है और लगातार उसका फॉलो अप किया जाएगा. 

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बेरिएट्रिक सर्जरी क्या होती है?

डॉ मंजुनाथ बताते हैं कि इस मरीज की वन एनास्टोमोसिस गैस्ट्रिक बाईपास (OAGB) सर्जरी की गई है. इसको बेरिएट्रिक सर्जरी  भी कहते हैं. यह वजन कम करने के लिए की जाती है. हालांकि  इस सर्जरी का मकसद सिर्फ वजन कम करना नहीं होता, बल्कि मोटापे की वजह से होने वाली दूसरी गंभीर बीमारियों का खतरा भी कम करना होता है. वजन कम होने पर कई मरीजों में डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, फैटी लिवर और स्लीप एपनिया जैसी समस्याओं में भी सुधार देखने को मिलता है.

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पूरी टीम ने मिलकर बचाई जान

AIIMS के मुताबिक इस मरीज का इलाज सिर्फ सर्जरी से संभव नहीं था. इसके लिए कई विभागों के डॉक्टरों ने मिलकर काम किया. सर्जरी की जिम्मेदारी सर्जिकल टीम ने संभाली. ऑपरेशन के दौरान एनेस्थीसिया विशेषज्ञ लगातार मरीज की सांस और दिल की धड़कन पर नजर रखते रहे. मेडिसिन विशेषज्ञों में डॉ नवल विक्रम ने दूसरी बीमारियों और संक्रमण के खतरे को संभाला. वहीं डाइटीशियन ने ऑपरेशन से पहले और बाद का पूरा खान-पान तय किया.

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